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               मुखाग्नि

हमारे संभाग में अरुण कुमार नये कमिश्नर बन कर आये थे। मैं उनसे मिलने उनके बंगले पर गया। बड़ा सरकारी बंगला था जिसके प्रवेश  द्वार की भव्यता कुछ क्षण कदमों को आगे बढ़ने से रोक देती थी। अंदर पैर रखते ही दरबान को बहुत सारी जानकारी देनी होती थी। उसके बाद वह अपने केबिन में जाकर फोन से बात करता और तब कहीं वो आपको अंदर जाने की अनुमति देता। यह एक प्रक्रिया है जो हमारे स्वतंत्र भारत को अंग्रेजों से विरासत में मिली है। मैं सोचता हूँ कि मैं भी एक विभागाध्यक्ष हूँ पर फिर क्यूँ मैं इस प्रक्रिया से कोसों दूर रहता हूँ। लोग मेरे इस व्यवहार को मूर्खता कहते हैं। उनका मत है कि इस कारण ही मैं ऊँचे पद पर रहकर भी आम आदमी से बड़ा नहीं हो पाया हूँ। लोग बिना झिझक के मुझसे मिलते हैं और मुझसे कुछ भी कहने में हिचक नहीं करते। पर मैं अपने को नहीं बदलने दे रहा हूँ। मेरा ख्याल है कि भगवान भी यदि मंदिर में बंद बैठे रहने के
चित्र साभार - flickr.com
बजाय मेरी तरह बाहर आकर आम आदमी से मिलता रहता तो कितना अच्छा होता। धर्म मंदिर की चार-दिवारी में संकुचित होकर नहीं रहता और हम पर यह लाँछन नहीं लगता कि हम सिर्फ दुख की घड़ी में भगवान को याद करने का स्वाँग रचाने मंदिर की तरफ दौड़ पड़ते हैं।
खैर, उस दिन मैं साहब से मिलने गया तो दरबान ने फोन पर बात करने के पहले मेरे पद को ध्यान में रखते हुए मुझे रोका नहीं और बंगले के सामने लगे शानदार बाग तक जाने दिया। मेरी नजर सबसे पहले पोर्च पर खड़ी सरकारी गाड़ी पर गई। मैं निश्चिंत हो गया कि साहब घर पर ही थे। बाग की ओर बढ़ते ही मैंने देखा कि मेरे बाँये तरफ गैराज था जिसमें उनकी चमचमाती कार रखी थी। इसी गैराज से सटा एक आऊट हाऊस था --- एक कमरे का छः फूट बाय छः फुट का। इसके सामने एक रस्सी की खाट पड़ी थी। खाट इतनी जर्जर थी जैसे उसे किसी गाँव के गरीब किसान की झोपड़ी से उठाकर लाया गया हो। मैंने उस खाट को बारीकी से देखा। रस्सी ढ़ीली होकर करिबन जमीन को चूमने का प्रयास कर रही थी, इस खाट पर लेटे एक वृद्ध के कारण। वृद्ध  फटी धोती और असंख्य छिद्रों से युक्त बनयान पहने हुआ था। चहरे पर सफेद बालों की झाड़ियाँ बिखरी हुई थी जैसे किसी बंगले की बाड़ी पर लगी झाड़ियाँ को बकरियाँ खींच-खाँचकर चबाकर छोड़ गईं हों। मेरे कदम उस वृद्ध  की ओर खिंच गये। उसने अपनी झुर्रियों पर बल दिया और सामने मुझे देख एक हल्की-सी पर मधुर मुस्कान को खिलाता हुआ बोला, ‘मेरे बेटे से मिलने आये हो?’
‘जी’, मैंने कहा।
‘तुम्हारा काम बन जावेगा। वो मेरा लड़का है। बहुत सयाना है। हर बात को ध्यान से सुनता है। न्याय करता है।’
‘जी’, बस ये शब्द ही मेरे अधरों पर पिघलकर रह गये। कमिश्नर साहब के पिताजी टूटी रस्सी की झूलती खाट पर ! मेरे सिर शर्म से नीचे झुक गया। मैं सोचने लगा कि पीढ़ी दर पीढ़ी का अंतर, सोच का बदलाव, व्यक्तिगत अहंकार और अहं से उपजी असहिष्णुता, हर पल कचोटता तिरस्कार तथा हर साँस में घुटन का अहसास क्या बस यही धरोहर बच जाती है बुढ़ापे में मनुष्य के पास।
मैं तुरंत पोर्च की तरफ चल पड़ा। पोर्च के सामने दो सीढ़ी ऊपर खुला बरामदा था और उस पर कुछ कुर्सियाँ पड़ी थीं। बीच में रखी मेज पर एक गुलदस्ता सजा हुआ रखा था --ताजे फूलों का जो शायद सामने के बगीचे से चुने फूलों का तरीके से सजा हुआ लगता था। एक कुर्सी पर पहले से ही एक महिला बैठी थी। मैं दो कुर्सी छोड़ दूर जा बैठा। महिला के हाथ में कुछ कागज थे। मेरे पहुँचते ही उसने वे कागज बीच में रखी मेज पर रखे और जब वह मुझे अभिवादन करने खड़ी हुई तो मैं उसे पहचान गया। वह शहर की समाज सेविका थी। इस पहचान के बावजूद मैं कुछ बोला नहीं और न ही उसने कुछ कहा। हम स्वतंत्र भारत के लोग दो ठूँठ वृक्ष की तरह बने रहना पसंद करते हैं जो हवा के झोंकों में पत्तियाँ न होने के कारण पत्तियाँ तक हिलाकर बातें नहीं कर सकते हैं। 
कुछ देर बाद साहब अपने गाऊन की बैल्ट बाँधते बाहर आये। शायद वे उसी समय सोकर उठे थे। उन्होंने इशारे से हमें बैठे रहने कहा। अभिवादन स्वीकारते हुए वे सामने पड़ी कुर्सी पर बैठ गये। उन्होंने पहले मेरी तरफ देखा और मैंने भी बिना वक्त खराब किये अपने आने की वजह बताते हुए वह सब कह डाला जिसके लिये मैं आया था।
भूपेन्द्र कुमार दवे
‘ठीक है,’ उन्होंने संक्षिप्त उत्तर दिया और तब वे उस महिला की तरफ देखने लगे। मैंने उड़ती नजर से उस महिला की तरफ देखा। उसके चेहरे पर पसीने की बूँदें उभर आयीं थीं। शायद सारा बदन पसीने में डूब जाना चाह रहा था। मैं उठा और जानबूझकर दो कदम आगे रखता हुआ उस महिला की कुर्सी के ठीक पीछे जाकर ठिठक गया। यहाँ से मैं सहाब को सामने से देख सकता था। वे पैर फैलाये बैठे थे जिससे मालूम हुआ कि वे गाऊन के नीचे कुछ नहीं पहने हुए थे। मैं महिला की स्थिति को समझ गया और शीघ्र सीढ़ी से उतर कर पोर्च पर आ गया। 
बाहर वह वृद्ध अभी भी खाट पर कुड़मुड़ बैठा था। 
    इसी बंगले में मुझे एक बार और आना पड़ा था। शहर में गृह मंत्रीजी आये हुए थे और साहब ने उनके आगमन पर एक पार्टी अपने बंगले पर रखी थी। सभी विभाग के उच्चाधिकारी आमंत्रित थे। इसी वजह से मुझे वहाँ जाना पड़ा था।
फरवरी माह उस समय शीत लहर के चपेट में था फिर भी पार्टी बंगले के सामने फैले बगीचे में रखी गई थी। यह तो मुझे बाद में मालूम हुआ कि ड्रिंक के बाद ड्राईंग रूम में डिनर के लिये जाना था।
बगीचे में पैर अंदर रखते ही एक विस्तृत दूब के कालीन का अहसास पैरों को मिला और वे कुछ ठिठक से गये। हर कदम एक लचक के साथ आगे बढ़ता और तब गुदगुदी-सी झन्नाती हुई मस्तिष्क तक पहुँच जाती थी। जगह जगह अलाव के रूप में लोहे की सिगड़ियाँ रखी हुई थीं। लोग उन्हें ही घेरे खड़े रहना चाह रहे थे। पर खिंचाव उन टेबुलों की ओर भी था जहाँ गिलास भरे जाने के इंतिजार में खामोश  खड़े थे। एक कामयाब पार्टी वही होती है जिसमें ड्रिंकस् कामयाबी से चल जाये और चुस्कियों के बीच वार्तालाप की रौ बढ़े तथा गिलास भरने का दौर अनवरत चलता रहे बिना किसी रुकावट के, बिना किसी अड़चन के व बिना किसी हिचक के। यह दौर लगभग साढ़े सात बजे प्रारंभ हुआ और साढ़े ग्यारह बजे तक चलता रहा। वक्त गुजरने का पता चलता भी कैसे, व्हिस्की की सप्लाई ठिठक जाती तब ना। सभी की नजरें मंत्रीजी की तरफ थी। मैंने देखा कि वहाँ वह समाज सेविका भी थी पर उसके चेहरे पर पसीने की बूँदें नहीं थीं। मैंने सुना था कि महिलाओं के लिये व्हिस्की ठीक नहीं होती पर वह महिला तो स्वयं व्हिस्की की पसंद बनी हुई लड़खड़ा रही थी।
खैर, वहाँ और कुछ भी देखने को था। बगीचे की सजावट के तो कहने ही क्या थे ! पर आगंतुकों के कारण तो वह बगिचा थिरक उठा था। संगीत की धीमी मधुर लय फूलों से लदी डालियों के साथ हिचकोले खा रही थी। झाड़ियों के पीछे भी कुछ जोड़े मस्ती करने जा पहुँचे थे। पर मेरी नजरें आऊट हाऊस पर टिकीं थीं। खाट पर मुझे कोई नहीं दिखा था। मैं सोचने लगा कि आऊट हाऊस के अस्बेस्टास् के नीचे कितनी कड़ाके की ठंड होगी और वह वृद्ध  बिना अलाव के ठिठुर गया होगा। मैं उस ओर ताकता ही रहा। वहाँ मुझे शून्यता के सिवा कुछ नजर नहीं आया। खाट भी निर्जीव सी पड़ी हुई थी। और जब आखरी घूँट पिलाकर गिलास लुढ़कने लगे तो मेरी तंत्रा अचानक भंग हुई। मैंने देखा कि मंत्रीजी के पीछे लोग बंगले की तरफ बढ़े चले जा रहे थे। डिनर अंदर रखी गई थी। एक जुलूस था जो खामोशी से आगे खिसकता जा रहा था जैसे किसी मैयत को लिये खामोशी चलती है -- बिना खुसुर-फुसुर के -- मरी हुई आत्माओं का लबादा ओढ़े हुए।
मैं पीछे था और आगे बढ़ने की चाहत को त्यागकर भीड़ का आखरी आदमी होना चाह रहा था। मैंने दो कदम बाँयीं ओर रखकर खाट की तरफ निहारा। वह सूनी थी। तभी नजर बंगले के सहारे किनारे पर चलते बरामदे पर गयी। मैं उस बरामदे की ओर बढ़ा और बंगले के पीछे जा पहुँचा। पीछे ऊँची दीवार के बीच एक दरवाजा था। मैंने पास जाकर अंदर झाँका। वह वृद्ध  ठिठुराता दीवार के सहारे जमीन पर बैठा था। उसका बदन बुरी तरह कँप रहा था। फिर भी मुझे देख उसने कुछ कहने की कोशिश  की। शब्द उसके ओठों की झुर्रियों के बीच से बाहर आने का प्रयास कर रहे थे। मैंने नीचे झुककर सुनना चाहा। वह जानना चाहता था कि पार्टी खत्म हुई या नहीं।
मैं उस प्रश्न का जवाब दिये बगैर तुरंत बाहर आ गया। पहले सोचा कि उस वृद्ध  को उठा कर सीधे बंगले के भीतर ले जाऊँ जहाँ डिनर हो रही थी। पर सोचा कि उससे उस वृद्ध  का क्या भला होगा। लाँन से उठाकर एक कुर्सी मैंने खाट के पास रखी और उसके दोनों ओर दो अलाव लाकर रख दिये। वैसे वे अलाव काफी शांत हो चुके थे पर उनमें कुछ गर्माहट शेष  थी। मैंने उस वृद्ध को उठाकर कुर्सी पर बिठाया। वह अपने दोनों पाँव खींचकर कुर्सी पर उखडूँ बैठ गया। कुछ हिम्मत बटोरकर उसने पुनः जानना चाहा कि पार्टी खत्म हुई या नहीं।
‘नहीं,’ मैंने संक्षिप्त उत्तर दिया और मेरे पाँव मुझे ठकेलते हुए बंगले की तरफ ले चले जहाँ पार्टी चल रही थी। ठहाकों के रंगीन गुब्बारों के बीच बातचीत की गेंदें टप्पे खाती हुई इधर-उधर उछल रहीं थीं। डिनर की गरिमा को बनाये रखने के प्रयास में सभी लड़खड़ाते हुए पैर अपने आप को संभालने की कोशिश  में थे। हर पैर जमीन से पकड़ जम जाने के बाद ही खिसकने का साहस कर रहे थे। मैं दरवाजे के कुछ अंदर जाकर नजारे देखता खड़ा रहा। लोग जिस तरह से डोनों पर झूम पड़े थे उससे प्रतीत होता था कि डिनर के बाद कुछ भी बच न पावेगा। मुझे उस वृद्ध  का ख्याल आया। बेचारा पार्टी के खत्म होने की प्रतीक्षा में था ताकि उसे भी पेट में कुछ भरने मिल जावे। उसके हिस्से में कोई कुछ बचा सकता था तो वह मैं था, यही सोच मैंने खाने के लिये प्लेट तक नहीं उठायी। पर इस बात को मंत्रीजी ने न जाने कैसे भाँप लिया। डिनर के बाद बाहर निकलते हुए उन्होंने मुझसे पूछा, ‘आपने कुछ पिया भी नहीं और खाना भी नहीं खाया।’
‘जी, आज गुरूवार जो है,’ न जाने कैसे यह उत्तर मेरी जीभ पर खिल उठा।
‘पर उपवास के दिन पीने से तो कोई परहेज नहीं करता,’ वे बोले।
‘आप मजाक अच्छी कर लेते हैं,’ पास में खड़े आचार्य जी ने मंत्रीजी को मक्खन लगाने की द्दष्टि से कहा।
कमिश्नर साहब और मंत्रीजी बाहर चल पड़े और उनके पीछे अन्य महमान। साहब ने दाँयी ओर घूमकर देखा तो वृद्ध को कुर्सी पर उखडूँ बैठा देखकर उनका नशा यकायक हिरण बन गायब हो गया। उनका पारा चढ़ने लगा। मंत्रीजी के भी पैर ठिठक गये और उन्होंने पूछा, ‘ये कौन है?’ उनके इस प्रश्न में अदब की झलक थी। शायद इसलिये कि उस वृद्ध  की कुर्सी के दोनों ओर अलाव रखे थे जो कि उसे बड़े अफसर के नजदीकी रिस्तेदार होने की बात कह रहे थे। 
कमिश्नर उस प्रश्न से बिचके नहीं और बड़ी गंभीरता से बोले, ‘ये एक किसान है। मुझे गाँव के दौरे पर मिला था। उसकी उम्र को देखकर और आगे पीछे कोई परिवारजन न देखकर मैं उसे अपने साथ ले आया हूँ। अब ये इसी बंगले में रहता है। चूकिं उसे बागवानी का शौक है इसलिये कभी-कभार पेड़-पौधों की सेवा भी कर लिया करता है।’
‘यह तो तुमने जनकल्याण का काम किया है,’ मंत्रीजी ने कहा। पर उनकी नजर पैनी थी। उन्होंने पलटकर अपने पार्टी के कार्यकर्ता को देखा और कहा,‘ मेरी तरफ से कुर्ता और दो धोती इस किसान के लिये भिजवा देना।’ इतना कहकर मंत्रीजी वृद्ध के करीब जा पहुँचे। लेकिन वह वृद्ध तो एकटक उन्हें देखता हुआ कुर्सी पर पूर्ववत बैठा रहा। मंत्रीजी ने पुनः उस कार्यकर्ता से कहा,‘एक शाल भी भिजवा देना।’
मैंने देखा कि कमिश्नर साहब के चहरे पर क्रोध की रेखायें उभर आयीं थी क्योंकि वह वृद्ध  उस समय भी अशिष्टता के साथ पूर्ववत बैठा हुआ मंत्रीजी को घूर रहा था। उन्होंने चाहा कि वे उसे धक्का देकर उठा दें। पर ऐसा करना उचित नहीं लगा। उन्होंने पास जाकर जाकर वृद्ध को बस छुआ और तभी उस वृद्ध का सिर एक ओर ढुलक गया। वृद्ध चल बसा था।
एक अजीब-सा सन्नाटा फैल गया। सभी के मुख पर बस ये ही शब्द निकल सका, ‘बेचारा किसान !’ वृद्ध को तुरंत उठाकर बंगले के बरामदे पर पहुँचाया गया। 
‘कुमार साहब आपने इसके लिये इतना सब किया पर ---’ मंत्रीजी इसके आगे कुछ न कह सके। आगे कोई और कुछ कहता, उसके पहले कमिश्नर साहब बोल पड़े, ‘इसे मुखाग्नि मैं दूँगा। आखिर यह मेरे पिताजी की ही उम्र का था।’
मंत्रीजी ने कमिश्नर की पीठ पर हाथ रखा ओर बोले, ‘यू आर ग्रेट।’
और मैं मूक दर्शक-सा बना रह गया जब झूठ की सूली पर सत्य को चढ़ाया जा रहा था।    
                                                                                                      
 यह कहानी भूपेंद्र कुमार दवे जी द्वारा लिखी गयी है आप मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल से सम्बद्ध रहे हैं आपकी कुछ कहानियाँ व कवितायें आकाशवाणी से भी प्रसारित हो चुकी है 'बंद दरवाजे और अन्य कहानियाँ''बूंद- बूंद आँसू' आदि आपकी प्रकाशित कृतियाँ हैसंपर्क सूत्र - भूपेन्द्र कुमार दवे,  43, सहकार नगररामपुर,जबलपुरम.प्र। मोबाइल न.  09893060419.      

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