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आज फिर से वो ख्वाब में नजर आये है 

कुछ निशां पुराने जख्मो के उभर आये है,
आज फिर से वो ख्वाब में नजर आये है,
मैं बुझ चूका हूँ जलते-जलते इक उम्र से,
आये तो है लौटकर वो देर से मगर आये है,
गौतम कुमार
कुछ निशां पुराने जख्मो के उभर आये है,
आज फिर से वो ख्वाब में नजर आये है,
आ जाते जो हक़ीक़त में जी लेते थोडा-सा,
फ़ायदा भी क्या है बंद आँखों में अगर आये है,
कुछ निशां पुराने जख्मो के उभर आये है,
आज फिर से वो ख्वाब में नजर आये है,
सोच रहा हूँ कह दूँ की ले आये तूफां नया,
हम बिखरने को उनसे फिर से संवर आये है,
कुछ निशां पुराने जख्मो के उभर आये है,
आज फिर से वो ख्वाब में नजर आये है,
उलझन में हूँ की क्यूँ आये है वो ख्वाब में,
रहम आया है दिल पे मेरे या देखने उजड़ा शहर आये है,
कुछ निशां पुराने जख्मो के उभर आये है,
आज फिर से वो ख्वाब में नजर आये है, 
खामोश सा पड़ा था उनके जाने से दरिया ख्यालो का,
तोड़ने चुप्पी इसकी बनकर वो कोई लहर आये है,
कुछ निशां पुराने जख्मो के उभर आये है,
आज फिर से वो ख्वाब में नजर आये है...



यह रचना गौतम कुमार जी द्वारा लिखी गयी है . आप अभी विद्यार्थी के रूप में अध्यनरत हैं . संपर्क सूत्र - ईमेल पता - Gautamkauri@gmail.com , फेसबुक पता - http://www.facebook.com/TheGautamKumar

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