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अपने पराए

भगवान भास्कर के प्रसाद की महिमा भी अनोखी है। गर्मी में जब इसकी देह झुलसाती है तब जीवमात्र बेचैन हो जाता है और जरा सी छाया को तरसता है। बरसात में धूप छाँव का खेल राह चलतों से अधिक घर बैठी महिला
की मुसीबत बन जाता है। घर का सामान धूप में फैलाया नहीं कि मिनटों में काला बादल घिर आया। सामान आधा-अधूरा समेटते तक मोटी-मोटी बूंदे टपकने लगी। अभी पूरा समेट कर साँस भी ठीक से न ले पाई थी कि चटक धूप खिल उठी। ऐसे में धैर्यमयी भी कह देती है- “प्रभु या तो बरस ही लो या दो-चार घंटे धूप की मेहरबानी कर दो।” पर देव कब सुनने वाले हैं। वे तो हर मौसम हर दिन अपनी ही चाल चलते हैं। ठण्ड के मौसम में सूर्यदेव के दर्शन तमाम मानवीय उपकरणों को फीका कर देते हैं। घर हो या ऑफिस मैदान हो या गली जरा सी धूप मिली नहीं कि बदन गर्माने वाले तुरंत दौड़े। ऐसा ही धूप का एहसास कराने वाला माघ मास चल रहा था। मैं खाना खाकर धूप का आनंद ले रही थी। इसी लोभ में एक पड़ौसन भी आ बैठी और कुछ देर बाद लालू कुत्ते ने भी गेट के बाहर पटिया पर पैर फैला दिए। घंटे भर बाद पड़ोसन तो उठकर चली गई पर लालू नहीं। मैं भी अंदर आकर लेट गई। अभी एक झपकी आई थी कि बाहर से विचित्र सी आवाज सुनाई पड़ी। आवाज इन्सानी थी इतना तो समझ में आया पर किस भाषा में कौन किसे पुकार रहा है यह स्पष्ट न हुआ। मैंने भी बाहर निकल कर देखने का प्रयास न किया। मन ने कहा- “अरे दिन भर सड़क चलती है। कोई न कोई आता जाता रहता है। कोई किसी को पुकारता होगा मुझे क्या।” कुछ देर बाद मैं अपना घरेलू काम समेटने लगी। शाम के नाश्ते, खाने की तैयारी, प्रेस और ऐसे ही छोटे-बड़े काम। परन्तु बाहर से विचित्र भाषा में किसी के पुकारने की आवाज बराबर आती रही। मैं कपड़े लेने बाहर आई तो देखा लालू जा चुका था। उसके स्थान पर एक अति कृशकाय बुजुर्ग महिला अपनी छोटी सी पोटली बगल में दबाए लेटी थी। इससे पहले कि मैं उससे कुछ बूझती वह किसी को पुकारने लगी। अब मुझे अनजानी भाषा का रहस्य स्पष्ट हुआ। परन्तु वह क्या बोल रही है यह अब भी समझ में न आया। मैंने बाउंड्री के बाहर दूर तक नजर दौड़ाई-शायद इसका कोई साथी हो। पर उसके साथी जैसा कोई दिखाई न दिया। बूढ़ी ने फिर पुकार लगाई। मैं उसके करीब पहुँच गई। उसकी नजर मुझ पर पड़ी और वह अपनी भाषा में मुझे कुछ समझाने लगी। उसके बोलने और इशारों से इतना तो समझ में आया कि वह किसी मुश्किल में है और किसी का इंतजार कर रही है। पर इसे कौन किसलिए यहाँ छोड़ गया है समझ में न आया। मुझे लगा शायद यह भूखी है। मैंने उसे दाल चावल दिए। उसने हाथ में लिए जरूर पर खाया एक कौर भी नहीं। आहिस्ता से पोटली के पास रख लिए और फिर टेर लगाने लगी। मुझे कौतुहल हो रहा था। मैं समझ नहीं पा रही थी कि वह गुमशुदा है या स्वेच्छा से घर छोड़कर चल पड़ी है। विक्षिप्त है या भिखारिन। वह मुझे समझाने का बार-बार असफल प्रयास करती रही।
संध्या घिरने लगी थी। मुझे लगा इस बुजुर्ग को भी ठण्ड से बचाने के लिए कुछ देना चाहिए। परन्तु अगले ही पल ख्याल आया- “इसने मेरा दिया खाना नहीं खाया पता नहीं कपड़ा भी लेगी या नहीं। शायद इसकी पोटली में शाल या स्वेटर हो।” मैंने उसे हाथ के इशारे से अपने शाल की ओर संकेत करते हुए उससे पोटली से कपड़े निकालने को कहा। परन्तु उसने बड़बड़ाते हुए पोटली को पहले से अधिक मजबूती से पकड़ लिया। इसी बीच एक सम्भ्रात महिला जो संध्या भ्रमण को निकली थीं। उसकी आवाज़ सुनकर रूक गई। वे उससे बातें करने की कोशिश करने लगी। शायद यह महिला उन्हीं के इलाके से थी। बुढ़ापे की अस्पष्टता के बाद भी वे उसकी काफी बातें समझ गई। उनका सार उन्होंने मुझे बताया- “कह रही है- इसके बेटे हैं। उनके बच्चे हैं और इसके घर में बहुत राज है।” उन्होंने उसे डपटते हुए कहा- “राज है तो यहाँ सड़क पर क्यों बैठी है?” उससे हुई बात उन संभ्रात महिला ने पुनः मुझे समझाई। कहती है- “मेरा बेटा आएगा। मुझे ले जायगा।” वे बोली- “बताओ इसको समझ नहीं आ रहा है कि बेटा लेने आता तो छोड़ क्यों जाता?”
“बेटा छोड़ गया, पर क्यों?” मैंने आश्चर्य से बूझा। 
उनके चेहरे पर दुःख का भाव उभर आया। गहरी सांस खींचते हुए आहिस्ता से बोली- “बस जी अधिक गरीबी और अधिक अमीरी इन्सान से जो न करा ले वह थोड़ा। ये दोनों ही इन्सान को इन्सान नहीं रहने देती। हमारे इलाके से कितने ही हर साल अपने बड़े बुजुर्गों को ऐसे ही छोड़ आते हैं।”
“आपके ही इलाके से ऐसा क्यों? गरीबी तो और जगह भी है।”
“नहीं जी, घोर गरीबी क्या होती है। इसे शायद यहाँ के लोग कभी न समझ पाए। पेट भरने को इन्सान क्या कुछ कर गुजरता है इसकी कल्पना भी यहाँ करना मुश्किल है।”
मैं उनके चेहरे पर उभरी गहरी पीड़ा को भांप रही थी। उन्होंने उस वृद्ध महिला को अपने साथ ले जाने का प्रयास किया। पर वह टस से मस न हुई। हर बार अपनी पोटली को और कसकर पकड़ते हुए अपने बेटे को गुहार लगाने लगी। बीच-बीच में वह टके की मांग कर रही थी। हार कर वे संभ्रात महिला उसे बीस का नोट थमा कर चली गई। हल्का सा अंधेरा घिर आया था। मैं भी अंदर आकर खाने की तैयारी में लग गई।
बूढ़ी का पुकारना शांत था। संभवतः लोगों के आवागमन से उसे अपने बेटे के आने की उम्मीद बढ़ गई थी। मैं फोन पर अपने बेटे से बातें कर रही थी। तभी बबीता आण्टी-आण्टी आवाज़ लगाती हुई घर में आई। वह मुझे ढूढ़ती हुई सीधी कमरे में अंदर आ गई। मैंने उसे हाथ के इशारे से कुछ देर शांत रहने को कहा। वह रसोई में दूध गर्म करने लगी। बबीता बचपन से अपनी माँ के साथ मेरे यहाँ आती थी। अब वह वयस्क हो गई थी। उसने कई
अपर्णा शर्मा
घरों का काम सम्भाल लिया था। बबीता सुबह के समय मेरे यहाँ सफाई करने आती थी और शाम को दूध लेकर। इस समय वह फुर्सत में रहती थी। उसकी पसंद का टी.वी. सीरियल इसी समय आता था। उसको देखना, अपनी पसंद का कुछ लेकर खाना और मेरे खाने की तैयारी में थोड़ा हाथ बटा देना उसके काम थे। परन्तु इन सबसे अहम काम था- डॉ. साहब के बाहर चले जाने और मेरे अकेले रह जाने पर मुझे सुरक्षा संबंधी हिदायतें देना। बाहर बूढ़ी को बैठी देखकर बबीता इतनी परेशान हुई कि जैसे ही उसे लगा मैंने फोन रख दिया है, वह तुरंत मेरे पास आकर खड़ी हो गई। अपनी परेशानी को उसने प्रश्नों के रूप में उड़ेल दिया - “आण्टी आज आप बाहर नहीं निकली क्या? आपको मालुम है बाहर कौन जमा बैठा है? आपने अभी तक उसे देखा भी है या नहीं?” बबीता के हाव-भाव देखकर मुझे हल्की हँसी आ गई। इससे वह झुझला गई और मुझे जल्दी बाहर चलकर बूढ़ी को देखने के लिए कहने लगी। मैंने उसे समझाया कि मुझे मालुम है बाहर कौन है?
“तब आपने अभी तक उसे भगाया क्यों नहीं?” बबीता ने मेरी नासमझी पर तरस खाया। 
“खुद चली जायेगी। भगाने की क्या जरूरत है। मैंने सहजता से कहा।”
इतना सुनते ही बबीता में बड़प्पन जाग गया। उसने मुझे ढेरों नसीहतें दे डाली। शहर में हो रही चोरी डकैतियों के कितने ही किस्से सुना दिए। मैं हाँ हूँ करते हुए उसकी बातें सुनती रही। वह अपनी पूरी बुद्धी लगाकर मुझे समझाने का प्रयास कर रही थी कि घर के पास ऐसे लोगों का बैठना या घूमना उचित नहीं है। इन सारी घटनाओं के पीछे ऐसे ही लोगों का हाथ रहता है। परन्तु बबीता की सारी समझदारी मेरी नासमझी को तिलभर भी न हिला पाई। 
मैं उठकर दूसरे कमरे में आ गई। टी.वी. चालू किया और बबीता को उसका पसंदीदा सीरियल देखने को कह दिया। पर उसकी बेचैन निगाहें गेट की ओर लगी थी। हर पाँच-दस मिनट में वह बाहर झाँक आती। उसने टी.वी. देखा पर उतनी तन्मयता से नहीं जैसे रोज देखती थी। आज बबीता के लिए टी.वी. से बड़ा मनोरंजन शायद गेट के बाहर था। जैसे ही सीरियल समाप्त हुआ वह उठ गई और सीधी बाहर लॉन में पहुँच गई। मैं अभी कुछ मिनट के समाचार ही देख पाई थी कि बबीता की जोर-जोर से बूढ़ी को डाँटने की आवाज़ आने लगी। मैं बबीता और बूढ़ी के बीच सुलह कराने में अपना समय लगाना नहीं चाह रही थी। क्योंकि बबीता को मना करने का विशेष लाभ होने वाला नहीं था और दिन भर में बूढ़ी को भी इतना समझ गई थी कि वह बबीता की बातों से हटने वाली नहीं है। अतः मुझे विश्वास था कि कुछ देर में मामला अपने आप सुलझ जायगा। फिर वृद्धा बाहर बैठी रहे इससे मुझे कोई हानी भी नहीं थी। परन्तु अभी मैं कोई काम शुरू करती कि वृद्धा के चिल्लाने की अजीब सी आवाज़ आई। मैं बाहर आई तो देखा कि बबीता गेट के बाहर पानी फेंक रही थी। वृद्धा शायद उससे कुछ भीग गई थी। इसीलिए अजीब आवाज़ निकाल रही थी और अपनी गठरी व मेरे दिए दाल-चावल समेट रही थी। साथ ही बबीता को अपनी भाषा में भला-बुरा कह रही थी। बबीता इससे और उत्तेजित हो रही थी। मैंने बबीता को डाँटकर पानी फेकने से रोकना चाहा। परन्तु उसने मेरे देखते ही देखते पूरी बाल्टी पटिया पर उड़ेल दी। बूढ़ी अपना सामान लेकर बबीता को बददुवाएँ देती हुई सामने वाले घर की पटिया पर जा बैठी। बबीता अपनी शैतानयुक्ति और विजय पर ठहाका लगाकर हँस पड़ी। मैं उसकी मूर्खता पर क्षुब्ध थी। अब उसे डाँटने या समझाने का कोई लाभ नहीं था। मैंने केवल नाराजगी से बबीता को देखा। वह बोली - “आण्टी आप समझ नहीं रही हैं। अंकल भी नहीं हैं। आप अकेली हैं। यहाँ बैठे यह इसको जान जाय और फिर अपने दस-पाँच साथियों को बुला ले। आप तो इसके लिए फटाफट गेट खोल देंगी। इतने में बस हो गया काम।”
मैंने बबीता को चले जाने का इशारा किया। मेरी नाराजगी समझ कर वह चली तो गई पर जाते-जाते मुझे सम्भल कर रहने की हिदायत दे गई। 
करीब एक घंटे बाद मेरा खाने का समय हो गया था। मैं अभी असमंजस में थी कि बाहर उस वृद्धा को खाना दूँ या नहीं। तभी उसके तेज चिल्लाने की आवाज आई। लगा जैसे कोई उससे झगड़ रहा है। मैं यह सोच कर हैरान थी कि समझाने और मना करने के बाद भी यह बबीता बूढ़ी से झगड़ने चली आई है। मैं तेजी से बाहर आई। गेट खोल कर बूढ़ी की ओर बढ़ी तो देखा नजारा कुछ और ही था। इस बार बबीता नहीं लालू अपनी टीम के साथ वृद्धा से भिड़ रहा था। उसका ऐसा करने के कई कारण थे- लालू और उसकी पार्टी इस गली के पहरेदार थे, ये गेट बाहर की पटियाएं, जहाँ वृद्धा आश्रय खोज रही थी रात में इनके विश्राम स्थल थे और इसके अतिरिक्त वृद्धा के पास रखा खाना और उसकी पोटली इनमें लालच पैदा कर रही थी। वृद्धा ने खाना फेंक कर अपनी जान बचाने की कोशिश की। परन्तु लालू का अभी भी उस पर गुर्राना जारी था। इसी बीच सामने के घर से भाभीजी और उनका बेटा राज निकल आए। परिचितों को देखकर और आवाज सुनकर लालू और उसकी टीम पीछे हट गई। राज ने डपटकर उन्हें और दूर भगा दिया। वृद्धा डरी, सहमी सिकुड़कर बैठ गई। हम कुछ देर उसके बारे में बातें करते रहे। ‘यह रात भर यहाँ कैसे रहेगी। रात में और भी जानवर आ सकते हैं। ठण्ड बढ़ेगी तब क्या करेगी?’ ऐसी ही बातें कुछ देर होती रही। तभी राज को एक विचार आया। वह बोला - “मम्मी आप इसे कुछ खाना दे दो। फिर मैं इसे स्टेशन छोड़ आता हूँ। वहाँ तो इसके जैसे बहुत हैं। आराम से इसकी रात कट जाएगी।”
ख्याल ठीक था। हमें भी लगा कि वहाँ कम से कम जानवर तो तंग नहीं करेंगे। अलाव जलते हैं ठण्ड से भी बच जाएगी। शायद आते-जाते कोई पहचान वाला ही टकरा जाय तो अपने घर लौट सकेगी। राज ने स्कूटर बाहर निकाल लिया। भाभीजी ने वृद्धा को खाना दिया। इस बार उसने उसे रखा नहीं तुरंत खाने लगी। 
वृद्धा का खाना खत्म हुआ। राज ने उसे स्कूटर पर बैठने का इशारा किया। हम भी उसे इशारों और बोलकर राज के साथ जाने को समझाने लगे। परन्तु वृद्धा ने ठीक वैसे ही जैसे शाम को उन संभ्रात महिला के साथ जाना नकार दिया था राज के साथ जाने से भी इन्कार कर दिया। वृद्धा की हट के सामने हम सभी हार गए। राज ने स्कूटर वापस रख दिया। भाभीजी और मैं खाना-खाने अपने-अपने घरों में चले गए।
खाना-खाते हुए मैं देर तक टी.वी. देखती रही और फिर घर के गलियारे में टहलने लगी। जब तक मैंने गलियारे में दस बारह चक्कर लगाए मेरा मन हजारों मील का सफर तय कर लौट आया और पुनः वृद्धा पर केन्द्रित हो गया। क्योंकि उसके लिए आज के कौतुहल का सबसे बड़ा केन्द्र वह ही थी। मेरे मन में उसको लेकर ढेरों सवाल उठ रहे थे। जिनमें बहुतों का जवाब मेरी कल्पना शक्ति दे रही थी और कुछ को लेकर मौन थी। इसी बीच मुझे एहसास हुआ कि ठण्ड प्रतिघंटा बढ़ रही है। मेरे पास पर्याप्त कपड़े हैं। इससे पहनने में कपड़ों की मनचाही वृद्धि कर सकती हूँ। पर इस कोहरे में वह कृशकाय? उस पर न छाया है न पूरा बदन ढकने का कोई गर्म कपड़ा। घर में रहकर जब कपड़ों से जरा हाथ बाहर निकालते ही ठिठुरने लगे तो वहाँ उसका क्या हाल होगा? क्यों न मैं उसे बरामदे में आने को कह दूँ। एक पुराना कंबल भी मेरे पास है। जो उसे काफी राहत दे सकता है। स्टोर में कुछ लकड़ी है जो मैं उसे दे सकती हूँ। कुछ देर ताप लेगी तो आराम पा जाएगी। यही सोचकर मैं गलियारा पार कर मुख्य द्वार तक आई। परन्तु बबीता की हिदायतों ने मेरे हाथ को सिटकनी खोलने से रोक दिया। उसका वाक्य मेरे कानों में गूंज गया। “आप तो उसके लिए...।” मैं ठिठक गई। आखिर बबीता की मैं कौन अपनी हूँ। वह बचपन से मेरे पास आती है। कुछ उपहार और दुलार पा जाती है। बस इस नाते ही तो समझा गई है। मुझे अकेले में बहुत बहादुरी नहीं दिखानी चाहिए। न जाने मुसीबत किस रूप में आ जाए। 
अगले ही पल मैं वृद्धा के घर परिवार के विषय में सोचने लगी। यदि यह बिछुड़ गई है तब वे इस समय कितने दुःखी होंगे। छोड़ गए हैं तो कितने निश्चित होकर सोए होंगे। परन्तु बार-बार उन संभ्रात महिला की बातों पर गौर करने के बाद भी मेरा मन यह विश्वास नहीं कर पा रहा था कि कोई अपनों को यूँ ही कैसे छोड़ सकता है। इतना विचारते तक तापमान कुछ डिग्री और गिर गया। मेरी आँखे नींद से बोझिल होने लगी। मन में सुना सुनाया एक बड़ा परिचित सा व्यवहारिक ख्याल आया कि यह संसार है इसमें एक से बढ़कर एक दुःखी इन्सान हैं। किस-किस की चिंता की जाय। अपना भला हो जाय इतना ही बहुत है। इस विचार ने मुझे बड़ा हल्का कर दिया। मैं बिस्तर पर लेट गई। पर एकाकी को विचारों से निजात कहाँ? मन रह-रह कर वहीं अटक जाता है जहाँ से बुद्धि उसे निकालना चाहती है। सो सामने की पटिया पर पोटली बनी बैठी वृद्धा की तस्वीर फिर उभर आई। इस बार मुझे न बबीता पर, न वृद्धा के परिवार वालों पर और न ही असहायों की सहायता के राग अलापने वाली समाज सेवी संस्थाओं एवं प्रशासन पर गुस्सा आया बल्कि स्वयं पर ही क्रोध आया। आखिर इतना भय किसलिए? मैं उठी और कम्बल लेकर इस विचार से गेट तक पहुँच गई कि कुछ अधिक नहीं तो मैं यह कम्बल तो उसे ऊढ़ा ही सकती हूँ। यदि मेरी बात समझकर वह बरामदे में आना चाहे तब भी मुझे कोई डर नहीं है। घर में अन्दर दरवाजे मजबूत हैं। यही सोचकर मैंने सामने पटिया पर नजर दौड़ाई। यह क्या? पटिया तो खाली थी। वृद्धा कहाँ गई? एक पल मन में सुखद विचार आया - “उसके परिवार का कोई उसे ले गया है।” अगले ही पल में सिहर गई। लगा बबीता का सोचना तो सच नहीं? मैंने चारों ओर नजर दौड़ाई वह कहीं दिखाई न दी। मैं सड़क पर देखने लगी। घने कोहरे में धुंधली सी कोई छाया धीरे-धीरे अज्ञात राह पर बढ़ रही थी। निश्चित ही यह वृद्धा थी। उसकी पोटली सिर पर नजर आ रही थी। वह आहिस्ता-आहिस्ता सर्द रात के सूनेपन में लोप हो गई। मैंने जल्दी से दरवाजा बंद किया और एक अनचाहे दायित्व से छुटकारे का एहसास कर मैं लेट गई।  


डॉ. (श्रीमती)  अपर्णा शर्मा ने मेरठ विश्वविद्यालय, मेरठ से एम.फिल. की उपाधि 1984 में, तत्पश्चात् पी-एच.डी. की उपाधि 1991 में प्राप्त की। आप निरंतर लेखन कार्य में रत् हैं। डॉ. शर्मा की एक शोध पुस्तक - भारतीय संवतों का इतिहास (1994), एक कहानी संग्रह खो गया गाँव (2010), एक कविता संग्रह जल धारा बहती रहे (2014), एक बाल उपन्यास चतुर राजकुमार (2014), तीन बाल कविता संग्रह, एक बाल लोक कथा संग्रह आदि दस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। साथ ही इनके शोध पत्र, पुस्तक समीक्षाएं, कविताएं, कहानियाँ, लोक कथाएं एवं समसामयिक विषयों पर लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। आपकी बाल कविताओं, परिचर्चाओं एवं वार्ताओं का प्रसारण आकाशवाणी, इलाहाबाद एवं इलाहाबाद दूरदर्शन से हुआ है। साथ ही कवि सम्मेलनों व काव्यगोष्ठियों में भागेदारी बनी रही है। सम्पर्क -
डॉ. (श्रीमती) अपर्णा शर्मा, “विश्रुत”, 5, एम. आई .जी., गोविंदपुर, निकट अपट्रान चौराहा, इलाहाबाद (उ. प्र.), पिनः 211004, दूरभाषः + 91-0532-2542514 दूरध्वनिः + 91-08005313626 ई-मेलः <draparna85@gmail.com>

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