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फ़र्ज़ करो हम अहले वफ़ा हों

इब्ने इंशा

फ़र्ज़ करो हम अहले वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो दीवाने हों
फ़र्ज़ करो ये दोनों बातें झूठी हों अफ़साने हों

फ़र्ज़ करो ये जी की बिपता, जी से जोड़ सुनाई हो
फ़र्ज़ करो अभी और हो इतनी, आधी हमने छुपाई हो

फ़र्ज़ करो तुम्हें ख़ुश करने के ढूंढे हमने बहाने हों
फ़र्ज़ करो ये नैन तुम्हारे सचमुच के मयख़ाने हों

फ़र्ज़ करो ये रोग हो झूठा, झूठी पीत हमारी हो
फ़र्ज़ करो इस पीत के रोग में सांस भी हम पर भारी हो

फ़र्ज़ करो ये जोग बिजोग का हमने ढोंग रचाया हो
फ़र्ज़ करो बस यही हक़ीक़त बाक़ी सब कुछ माया हो

विडियो के रूप में देखें :-




इब्ने इंशा (शेर मोहम्मद खान ) का जन्म १९२७ में जालंधर में हुआ था . जालंधर विश्वविद्यालय से इन्होने बी.ए की परीक्षा पास की . विभाजन के बाद ये पाकिस्तान चले गए . वहां पर इन्होने विभिन्न पदों पर कार्य किया .इब्ने इंशा को इनके समय का सबसे बेहतर व लोकप्रिय  शायर माना जाता है . इनकी ख्याति कवि,यात्रा लेखक ,स्तंभकार तथा हास्य लेखक के रूप में हैं . कुछ काव्य समीक्षकों का कहना है कि इनकी कविता शैली पर अमीर खुसरों तथा इनके विचारों पर कबीर का जबरदस्त प्रभाव है . इनकी रचनाओं में 'इस बस्ती के एक कूंचे में' ,'चाँद नगर' तथा 'दिले वहशी' आदि है . इनकी  गज़ल 'इंशा जी उठों' ,प्रीत का अलाव गोरी, य़े बातें  झूँठी बातें है ,गोरी मत जाओ,इल्म बड़ी दौलत है आदि बड़ी प्रसिद्ध है . विभिन्न भाषाओं में इनकी पुस्तकों का अनुवाद हो चुका है . 

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