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  गुनाह  

विरेंदर वीर मेहता
"बेटा, कल नमाज-ए-फजर (सूर्य उदय होने से पहले की नमाज) में खुदा से अपनी हर खता के लिये माफी मांग लेना।" उसके बाबा ने 'आखिरी मुलाकात' में दुःखी मन से उसे समझाते हुये कहा।
"बाबाजान। जो मैंने किया जानते बूझते किया और मेरे किये की सजा मिलने जा ही रही है फिर कैसी खता और
कैसी माफी?" उसने सवालियो नजरो से बाबा की ओर देखा।
"बेटा, शायद हमारी ही सीख में कमी रह गयी या तुम्हारी संगत ने ही तुम्हे आज गुनाहो के इस आखिरी मुकाम पर ला खड़ा किया।" बाबा ने अपनी गीली आँखे पोंछते हुये कहा।
"हाँ बाबा, शायद ये मेरी संगत ही थी जो  मेरे गुनाह के दरख़त को कदम दर कदम मजबूत करती गयी मगर बाबाजान...!" वो गहरी नजरो से बाबा की तरफ देखते हुये कहता गया।  ".....इस गुनाह की बुनियाद तो उसी दिन पड़ गयी थी जिस दिन पहली बार मेरी गुलेल से जख्मी परिंदे की तड़प पर मेरी खुशी में शामिल हो आपने मेरी पीठ थपथपाई थी।"


यह रचना विरेंदर वीर मेहता जी द्वारा लिखी गयी है।  आप वर्तमान में फेस बुक के विभिन्न समूहो, विशेषकर "नया लेखन नए दस्तखत" "ओपन बुक्स ऑन लाइन" "लघुकथा - गागर में सागर" आदि समूहो और वेब पत्रिका "रचनकार" "हस्ताक्षर" आदि पर लेखन। आपकी "किरदी जवानी" में पंजाबी में 'अनुवादित' दो लघुकथा प्रकाशित। हिंदी लघुकथा संग्रह "बूँद बूँद सागर" में चार रचनाये सम्मलित। "minni" ( april - june 16 ) में पंजाबी में 'अनुवादित' लघुकथा प्रकाशित।
संपर्क सूत्र - आवास : एफ - ६२, विकास मार्ग, लक्ष्मी नगर, ईस्ट दिल्ली - ११००९२ सम्पर्क : +९१ ९८ १८ ६७ ५२ ०७ . मेल आई डी :  v.mehta67@gmail .com

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