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अन्तर

काफी दिनों बाद अलका का श्रेया के यहाँ आना हुआ। दोनों सहेलियाँ बैठकर इधर-उधर की बातें करने लगी। थोड़ी देर बाद श्रेया चाय नाश्ता ले आई। बातों का सिलसिला दोबारा शुरू हो गया जो राजनीति से फिसलता हुआ शहर में हो रही चोरी, डकैती और उठाई गिरी की घटनाओं पर दौड़ने लगा। बीच-बीच में बाल-गोपालों की भी
glogster.com से साभार 
चर्चा हो जाती। परन्तु शीघ्र ही दस पाँच दिन पहले इलाके में हुई छुटपुट घटना चर्चा का विषय बन जाती। चाय समाप्त हुई। कुछ देर बाद एक दस बारह साल की बच्ची बर्तन उठाने आई। वह अभी बर्तन लेकर मुड़ भी न पाई थी कि श्रेया ने कड़क अंदाज में उससे सवाल किया- “रोटी खाई?” बच्ची कुछ अपराध-बोध से ग्रस्त सी सिर झुका कर खड़ी हो गई। लग रहा था जैसे रोटी का एक दो निवाला अभी उसके मुँह में दबा है। उसने सहमति में गर्दन हिलाई श्रेया ने कहा- “जाओ।” बच्ची ट्रे उठाकर चली गई। दोनों सहेलियाँ फिर बातों में उलझ गई। 
लगभग आधा घंटे बाद ट्रे ले जाने वाली बच्ची ने दरवाजे में अंदर झाँकते हुए धीमी आवाज में कहा- “आण्टी मैं जाऊँ?”
श्रेया ने रौब से पूछा- “सब काम निबट गया?” हल्की सी हाँ के साथ लड़की ने गर्दन हिला दी। श्रेया बोली- “पाँच मिनट ठहरो।” 
श्रेया उठकर बगल वाले कमरे में चली गई। अलका सोचने लगी- नन्हीं सी लड़की और पूरा काम। घंटे भर काम के बाद भी छुट्टी की अनुमति नहीं और तब भी पेट भरने के लिए रोटी चुराने की मजबूरी। कैसा बचपन है
अपर्णा शर्मा
इनका भी? अलका का मन हुआ कि उठकर बच्ची के सिर पर हाथ रख दे। उसे कुछ पैसा दे दे और घर जाकर खेलने को कह दे। परन्तु वह उठते-उठते बैठ गई। आज के समय में किसी दूसरे के काम वाले से हमदर्दी दिखाने का मतलब है आपसी संबंधों में खटास। तभी श्रेया आती दिखाती दी। उसने बीस का नोट लड़की को थमाते हुए कहा- “ये लो। रास्ते से कॉपी खरीद लेना और सुबह अपनी अम्मा को काम पर भेजना, तुम स्कूल जाना। समझी?”
लड़की के चेहरे पर मुस्कान आ गई। नोट लेकर वह तेजी से चली गई। श्रेया आकर अलका के पास बैठ गई। 
अलका आश्चर्य से श्रेया को देखने लगी। उसे अपनी जिज्ञासा रोकना मुश्किल हो गया। वह बोली- “तुम भी गजब हो श्रेया। कुछ देर पहले इसे रोटी खाने को डाँट रही थी और अब यह मेहरबानी।”
श्रेया ठहाका लगाकर हँस पड़ी- “मैं उसे रोटी खाने को नहीं डांट रही थी। वरन् इसलिए डाँट रही थी कि कहीं उसने रोटी घर ले जाने के लिए तो नहीं रख ली है।”
अलका ने प्रश्न किया- “घर ही ले जाय तो इसमें तुम्हें क्या परेशानी है?”
श्रेया ने गहरी साँस लेकर कहा- “घर इसे खाने को नहीं मिलेगी। इसके दो बड़े भाई हैं एकदम आवारा। दिन भर पतंग उड़ाते फिरते हैं। इसकी माँ इससे दिनभर काम करवाती है और सारा खाना अपने उन लाडलों को खिला देती है। इसीलिए मैं हर दिन इसे यहीं रोटी खिलाकर भेजती हूँ। इसके खाने से कुछ बचे तो भले ही घर ले जाय।”

डॉ. (श्रीमती)  अपर्णा शर्मा ने मेरठ विश्वविद्यालय, मेरठ से एम.फिल. की उपाधि 1984 में, तत्पश्चात् पी-एच.डी. की उपाधि 1991 में प्राप्त की। आप निरंतर लेखन कार्य में रत् हैं। डॉ. शर्मा की एक शोध पुस्तक - भारतीय संवतों का इतिहास (1994), एक कहानी संग्रह खो गया गाँव (2010), एक कविता संग्रह जल धारा बहती रहे (2014), एक बाल उपन्यास चतुर राजकुमार (2014), तीन बाल कविता संग्रह, एक बाल लोक कथा संग्रह आदि दस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। साथ ही इनके शोध पत्र, पुस्तक समीक्षाएं, कविताएं, कहानियाँ, लोक कथाएं एवं समसामयिक विषयों पर लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। आपकी बाल कविताओं, परिचर्चाओं एवं वार्ताओं का प्रसारण आकाशवाणी, इलाहाबाद एवं इलाहाबाद दूरदर्शन से हुआ है। साथ ही कवि सम्मेलनों व काव्यगोष्ठियों में भागेदारी बनी रही है। सम्पर्क -
डॉ. (श्रीमती) अपर्णा शर्मा, “विश्रुत”, 5, एम. आई .जी., गोविंदपुर, निकट अपट्रान चौराहा, इलाहाबाद (उ. प्र.), पिनः 211004, दूरभाषः + 91-0532-2542514 दूरध्वनिः + 91-08005313626 ई-मेलः <draparna85@gmail.com>

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