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धूप में सेक लिए


धूप में
सेक लिए
पर अपने,
गौरैया
नाहकर आई कहाँ से ?
नदी तालाब से
भींगी  है
अभी भी
रुआं अनेकों I
हवा मस्तानी
करती छेड़खानी
मारती धक्के
स्पर्श कर तुझे
साथ अपने ले जाने
कहती बारम्बार
किन्तु है ! गौरैया
बैठी क्यूँ ?
तपते मिटटी के ढेर पर
जहाँ सांसें थकीं
सो जातीं हैं
रेंगते मटमैले कीड़ों की I

यह रचना अशोक बाबू माहौर जी द्वारा लिखी गयी है . आपकी विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी है . आप लेखन की विभिन्न विधाओं में संलग्न हैं . संपर्क सूत्र -ग्राम - कदमन का पुरा, तहसील-अम्बाह ,जिला-मुरैना (म.प्र.)476111 ,  ईमेल-ashokbabu.mahour@gmail.com

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