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उथल पुथल कर दो  

उथल पुथल कर दो,अब जग में
गूँज उठे शोर पवन में I
हट जाए सब धुँधला काला
तड़प उठे गद्दार मन में II
              देश घिनौंना करते जाते
अशोक बाबू माहौर 
              वो कैसा इन्साफ करे I
              जिनके मन में भरा न पानी
              छिप छिप कर अब बार करे II
लुटा रहे सब खुशियाँ घर की
बेचते बाप बहनों को I
करके माँ का सौदा पल में
भरते घर में पैसे को II
              ऐसे काले सौदागर को
              दण्ड मिले सब मंथन में I
              उथल पुथल कर दो,अब जग में
              गूँज उठे शोर पवन में II

आगे बढ़कर खलबल कर दो
मिटा दो भ्रष्टाचारों को I
आँधीं भागे देख वीरता
द्रोही काँपें थर-थर को II
             ऐसी क्रांति आये घर में
             दीप जले अब हर मन में I
             निकल जाए वो गद्दार सारे
             छोड़ देश भागे पल में II
अब ऐसा इंसाफ जगा दो
नौका लगे किनारे में I
उथल पुथल कर दो,अब जग में
गूँज उठे शोर पवन में II



यह रचना अशोक बाबू माहौर जी द्वारा लिखी गयी है . आपकी विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी है . आप लेखन की विभिन्न विधाओं में संलग्न हैं . संपर्क सूत्र -ग्राम - कदमन का पुरा, तहसील-अम्बाह ,जिला-मुरैना (म.प्र.)476111 ,  ईमेल-ashokbabu.mahour@gmail.com

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