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जागो मानव जागो...

अब तक तो आप सब ने गौर कर ही लिया होगा कि इस बार सूर्यदेव कुछ ज्यादा ही कुपित हैं. गुस्सा किस पर है यह तो पता नहीं किंतु धरती और उस पर बसे जीव-जंतु व वनस्पति इसका शिकार हो रहे हैं. सूर्यदेव से भिड़ना तो संभव ही नहीं है. इसलिए हमें चाहिए कि शिकार हो रहे प्राणियों की जितनी बन सके सहायता करें ताकि उनका कष्ट कम हो सके.

धरती तप रही है , फट रही है. वनस्पति सूख रहे हैं और मरने की कगार पर हैं. पशु- पक्षी जल के लिए तरस रहे हैं. धरती का जलस्तर भी बुरी तरह प्रभावित होकर घट रहा है. कुएँ तो क्या नलकूपों में भी पानी सूखने लगा है. कई शहरों में तालाब भी सूख गए हैं. 

अब इन सब प्रभावित प्राणियों में मानव ही एकमात्र ऐसा जीव है जो खुद मानव की और साथ ही अन्य जीवों व वनस्पतियों की सहयता कर सकता है. इसलिए अब मानव को चाहिए कि इन साथी मानवों व अन्य जीवों व वनस्पतियों की रक्षा होतु मिलकर कदम बढ़ाएं.
यदि मानव आज अपने कर्तव्य को भलिभाँति नहीं समझेगा और निभाएगा तो धरती पर जीव व वनस्पति की ह्रास प्रारंभ हो जाएगा और एक दिन यह धरती जीव विहीन हो जाएगी. इसलिए इस दुविधा से बचने के लिए हमें तुरंत कदम उठाना चाहिए.

जागो मानव जागो.

नीचे दिए कुछ छोटे छोटे उपाय जिनसे जीव व वनस्पतियों की जान को बख्शा जा सकता है . आप जितना हो सके इन्हें अपनाएं एवं जीव - जंतुओं, पशु - पक्षियों एवं वनस्पति की रक्षा करें.
पक्षियों के लिए तश्तरियों में , गमलों में भरकर बगीचे में, बालकनियों में, छतों पर पानी रखें. पशुओं के लिए हौजों में भरकर खुले में पानी रखें ताकि कुत्ते, बकरी , गाय, सुअर, बैल , भैंस इत्यादि जानवर उसमें से पानी पी सकें. ख्याल रहे कि हौज इतना गहरा न हो कि बछड़े व मेमने उसमें गिर कर जान गँवाँ बैठें. जगह जगह सड़कों पर , चौराहों पर घड़ों में पानी भरकर प्याऊ लगाएं ताकि राहगीरों की प्यास बुझाई जा सके.

इन कार्यों के लिए हो सके तो लोग आपस में तालमेल कर इसे बड़े पैमाने पर भी कर सकते हैं.

इसी तरह वनस्पतियों के लिए कम से कम दिन में एक बार ( संभवतः) सूर्य़ोदय से पूर्व सिंचाई जरूरी है अन्यथा वे सूख कर मर जाएंगे. यदि संभव हो तो दूसरे बार – सूर्यास्त के समय या बाद मैं सिंचाई की जा सकती है.
वैसे तो हर धर्म में प्यासे को पानी पिलाना पुण्य का काम माना जाता है. किंतु गर्मी के दिनों में किसी की भी प्यास बुझाना तो और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है. उस पर इस बरस की गर्मी में इसका महत्व और भी ज्यादा हो जाता है.
इसलिए मेरी सबसे करबद्ध प्रार्थना है कि इस पुण्य कार्य में जितना हो सके, हर संभव प्रयास करे और जीव- जंतुओं, पश - पक्षियों और वनस्पतियों की सूर्य के प्रताप से जितना हो सके, रक्षा करें.
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यह रचना माड़भूषि रंगराज अयंगर जी द्वारा लिखी गयी है . आप स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य में रत है . आप की विभिन्न रचनाओं का प्रकाशन पत्र -पत्रिकाओं में होता रहता है . संपर्क सूत्र - एम.आर.अयंगर.8462021340,वेंकटापुरम,सिकंदराबाद,तेलंगाना-500015  Laxmirangam@gmail.com

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