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 जनरल डब्बा

जनरल डब्बे में खचाखच भीड़ थी I पाँव टिकाने के लिए कहीं पर भी जगह नहीं थी फिर भी लोग खड़े पिचके जा रहे I न जाने इतनी भीड़ आज कहाँ से आ टपकी गर्मी के दिन मेरा पसीने से बुरा हाल हुआ जा रहा I प्यास से गला सूख रहा बैग की तरफ देखा उसमे पानी की बोतल भी नहीं I 
    मैं धक्का मुक्की खाते अंदर चला गया पास खड़ी औरत से मेरी कोहनी जा टकराई वह चीखती हुई मेरी तरफ भड़की -"सीधे खड़े रहिये भाई साहब ,मुझे पता है आपकी कोहनी कहाँ चल रही है I "
     मैं उससे माफ़ी माँगते बोल उठा -"बहन जी मैंने जान बूझकर आपको धक्का नहीं मारा, भीड़ इतनी है कि कहीं पर भी ढंग से खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा I "
     मैंने जैसे तैसे उस औरत को समझाया वरना आज तो मेरी खिचाई पक्की थी I शायद मुझे गाली भी सुनने को मिलती I 
     मैं एक पाँव पर खड़ा साँसें गिनकर अंदर बाहर कर अगले स्टेशन आने की प्रतीक्षा में खुद को एक भक्त की तरह तपस्या में लगा रहा ,'हे!भगवान अगले स्टेशन पर कोई सवारी नहीं चढ़े इसमें से दस बीस और उतर जाएँ I 'किन्तु भगवान कहाँ सुनने वाले, उतरने की वजह ढेरों सवारियाँ राशन पानी लेकर और चढ़ गईं I '
     मैं पूरी तरह से भीड़ के चंगुल में फँस चुका था न आराम से खड़ा हो सकता और न हीं बाहर निकल सकता I मेरा चेहरा पसीने से लथपथ I सारे कपडे पूरी तरह भींग चुके थे और मैं रोने की कगार पर खड़ा चेहरा दर चेहरा ताक रहा I 
अशोक बाबू
      मेरे पैर दर्द करने लगे सीट  पर बैठे एक सज्जन से मदद भी माँगी उसने साफ़ इनकार कर दिया 'भाई साहब हम खुद लटके हुए हैं आपकी मदद कैसे कर सकते हैं ई'
      भीड़ से बुरा हाल मैंने पहले कभी नहीं देखा I अभी वह औरत खड़ी आफत की साँस गिन ही रही थी कि ऊपर से किसी का बैग सिर पर गिरा I  एक बार फिर से वह भड़क उठी चिल्लाती गाली गलौच करने लगी -"ये बैग किसका हैं हाय ! राम सिर ही फोड़ दिया I "डब्बा में सबकी आवाज सुन्न सी पड़ गई किसी ने कुछ  नहीं कहा I औरत ने बैग को दो चार लात भी मारी I 
       "हाय ! राम कैसी मुसीबत हैं ,राजू तू मुझे किस नर्क में ले आया यहाँ पर तो न जी सकते हैं और न मर सकते  हैं I " पास खड़े बुजुर्ग ने अपने बेटे से कहा I 
       स्टेशन ज्यादा दूर नहीं था मैं खड़ा भींगे चूहे कि तरह अपने आप को कोस  रहा I स्टेशन पर ट्रैन रुकी ढेर सारी भीड़ धक्का मुक्की करती उतर गईं I मैं पास वाली सीट पर सवार हो गया राहत भरी साँस खींचने लगा I 
       औरत अभी भी खड़ी झल्ला रही I  मैंने इधर उधर देखा शायद उसे सीट नहीं मिल पाई इसलिए खड़ी हैं मुँह बनाए I 
        मैं तुरंत ही सीट से खड़ा हुआ और उस औरत को बिठाया I  वह मुझे धन्यवाद देती प्रसन्नता जाहिर करने लगी -"भाई साहब आप अच्छे इंसान हो जो मुझे सीट दी वरना कौन कहाँ ?"
        मेरी किश्मत में अभी भीड़ थी धक्का मुक्की चिल्लाहट ,अगले स्टेशन पर मैं उतर गया दुकान से पानी बोतल लेकर मुँह धोया तथा प्यास बुझाकर I बस अड्डे की तरफ भागता हुआ चला गया I 

यह रचना अशोक बाबू माहौर जी द्वारा लिखी गयी है . आपकी विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी है . आप लेखन की विभिन्न विधाओं में संलग्न हैं . संपर्क सूत्र -ग्राम - कदमन का पुरा, तहसील-अम्बाह ,जिला-मुरैना (म.प्र.)476111 ,  ईमेल-ashokbabu.mahour@gmail.com

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