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 गिल्ली गुम हो गयी !


गर्मियों की छुट्टीयां आते ही सबसे पहला ख्याल जो बच्चो के मन में आता है वह है मामा के घर जाना खूब खेल कूद और मजे करना दिन-दिन भर की धमाचौकडी, तरह- तरह के खेल और छोटी-छोटी तकरारें, इन्हीं के साथ गुजरती मस्ती भरी गर्मियां | समय के बदलाव में जहाँ गिल्ली का  -डंडे का स्थान क्रिकेट ने हथिया लिया,समय के साथ खेल गीत तो क्या परम्परागत खेल ही गुमहो गए हैं | सतोलियों [पिट्टू] की आवाजों से गूंजते थे मैदान | कभी समय की तेज धारा ने बच्चों को भी एक दूसरे से अलग थलग कर अपने- अपने आंगन तक सीमित कर दिया है । स्वचालित खिलौनों और सेटेलाइट चैनलों ने बचपन की तस्वीर ही बदल दी है अपनी धरोहर के रूप में पारम्परिक खेलों को बिसरा चुके है , शायद इसीलिए बचपन अब शारीरिक से ज्यादा मानसिक खेलों में गुजरने लगा परिणाम भावी पीढ़ी में निहित हमारे किशोर बुद्धिमानी की दौड़ में उत्कृष्ट तार्किकता क्षमता के  प्रदर्शन के चलते  शरीर से बेहद कमजोर होते जा रहे, इस बात का एहसास अवधेश को उसी दिन हुआ जब अवधेश अपने बेटे शुभम को उसकी गर्मियों के छुट्टी में उसके मामा के यहाँ छोड़ने गया जो बेहद छोटे से कस्बे में बसा था जहाँ
बाजार के रूप में केवल हर मंगलवार हाट लगता था उसी दिन सब खरीदारी करते वहां एक मात्र शासकीय स्कूल वो भी आठवीं तक शुभम के मामा का बेटा किशोर उसी स्कूल में आठवीं में पढता था अब उसकी भी गर्मी की छुट्टियाँ लग गई थी | 
शोभा जैन
अवधेश रास्ते भर शुभम को यही समझाता की देखो यह गाँव है यहाँ तुम्हें घर जैसी सुख- सुविधाएँ नहीं मिलेंगी यहाँ तुम्हारे शहर के स्कूल जैसे दोस्त भी नहीं है लेकिन ये जगह बहुत सुंदर और अच्छी है तुम्हें अच्छा लगेगा तुम्हारी माँ यही पली बड़ी है, और किशोर तुम्हारे बराबर का है उसके साथ तुम्हारी दोस्ती हो जाएगी उसके दोस्त तुम्हारे दोस्त बन जायेंगे तुम्हें यहाँ बहुत कुछ नया देखने और सीखने को मिलेगा ठीक है.... मेरी बातों का ध्यान रखना | शुभम सिर हिलाकर कहता है ओके  पापा | रास्ते में कुछ बच्चे कंचे खेलते  और  तो लट्टू नचाते हुए दिखाई देते है, शुभम उन्हें देखकर अवधेश से पूछता है ये क्या कर रहे है पापा ? अवधेश मुस्कुरा कर कहता है-- ये वही खेल है जो मैने अपने बचपन में बहुत खेला है बहुत मजेदार है |तुम्हें यहाँ बहुत नए- नए खेल देखने और सीखने को मिलेंगे शुभम बोला अच्छा वीडियों गेम से भी अच्छे, रेसिंग शूटिंग और जो मैं कंप्यूटर पर खेलता हूँ उससे भी अच्छे गेम ? अवधेश हलकी से मुस्कुराहट के साथ जवाब देता है--- ये सब तुम देख कर खेलते हो यहाँ तुम्हें खेलकर देखना होगा ....बस यही फर्क है| शुभम सोच में पड़ जाता है| इतनी देर में गावं आ जाता है अवधेश और शुभम गाड़ी से उतरकर घर के द्वार पर  प्रवेश करते है किशोर घर के आंगन में ही जो सीधे गाँव की कच्ची सड़क  से लगा था कुछ बच्चो के साथ कोडा जमालशाही पीछे देखे मार खाई बोलकर खेल खेल रहा था,  जैसे ही वो शुभम और अवधेश को देखता है भागकर घर के भीतर जाता है और कहता है फूफाजी आ गए शुभम भी आया है मम्मी| इतना कहकर किशोर फिर बाहर आता है पानी से भरा एक कांसे का लोटा और एक  गिलास  पानी से भरा हुआ लेकर पानी देते हुए  अवधेश के हाथ से बैग लेकर पूछता है मेरे लिए क्या है फूफाजी इसमें ? अवधेश मुस्कुरा कर कहता है --खुद ही देख लो शुभम तुम्हारे लिए क्या -क्या लाया है  फल और मिठाई निकाल कर उसे देता है किशोर शुभम को भीतर ले जाता है और दोनों बातें करने लगते है| किशोर शुभम को घर के बाहर ले जाता है बाहर बहुत तेज धूप रहती है वहां कुछ दोस्त जो उसके अधूरा खेल छोड़कर जाने पर वापसी का इन्तजार कर  रहे थे उससे कहते है किशोर अब तो तेरा भाई आ गया शहर से तू हमारे साथ थोड़े ही खेलेगा किशोर जवाब देता है नहीं यार अब शुभम भी हमारे साथ खेलेगा क्यों शुभम तुम खेलोगे न हमारे साथ शुभम कहता है ----हाँ  लेकिन अभी बहुत तेज धूप है शाम को ठन्डे मोसम में खेले तो.... किशोर बोला कोई बात नहीं शाम को खेलेंगे,  वे सभी गाँव के सांवले रंग के १३ -१४ वर्ष के मासूम बच्चे मेले से कपड़ों में मार्च अप्रेल की चिल चिलाती धूप में मजे से खेल रहे थे शुभम अपना नाम बताकर सबसे हाथ मिलाता है शाम को सब इकट्ठा होते है और शुभम को  गिल्ली डंडा खिलाते है शुभम को उसमें बहुत मजा आता है उसे महसूस होता है गिल्ली डंडा मेरे अनुमान को मजबूत बना रहा है गिल्ली डंडे में देखकर अनुमान लगते हैं गिल्ली कहाँ तक जाएगी |कुछ देर बाद उसे कंचो का खेल भी खेलने को मिलता है उसे महसूस होता हैं कंचे पर बार बार निशाना लगाने से तो मेरी एकाग्रता बड़ रही है|लेकिन शाम तक वो इन दो खेलों में बुरी तरह थक जाता हैं और उसकी तबियत एक ही दिन में कुछ  ठीक नहीं लगती| अवधेश शुभम से पूछता है तुम तो एक ही दिन में बीमार पड़ गए छुट्टियाँ केसे बिताओगे मैं इसीलिए कुछ दिन यहीं रुका हूँ |शुभम ने जवाब दिया –पापा, किशोर और उसके दोस्त दिन-दिन  भर धूप में इतना खेलते है फिर भी वो बीमार नहीं होते मैं इतनी जल्दी थक गया |अवधेश चुप रह जाता है |

अगले दिन फिर शुभम और किशोर गाँव के हम उम्र बच्चों के साथ गोल घेरा बनाए एक दूसरे का हाथ पकडे गीत गाते  ” हरा समंदर, गोपी चंदर, बोल मेरी मछ्ली कितना पानी….” खेलते है गोल घेरे के बीच मे खडी लडकी पैरों से शुरू करते हुए बताती है ” इत्ता पानी, इत्ता पानी ….”  जैसे ही पानी सर के ऊपर आता है घेरे मे खडे सभी बच्चे इधर उधर भाग चलते हैं ।आज शुभम थोडा ठीक था शारीरिक रूप से  और उसे इन खेलों को खेलते वक़्त ये महसूस हुआ की इन खेलों में लड़ाई झगडा नहीं होता शहर के खेलों की तरह,  कोई किसी को हराने के लिए खेल नहीं  खेलता है सब मजे करने के लिए खेलते है| इसके बाद शुभम कहता कोई और बैठकर खेलने वाला खेल खेले तब किशोर चोर सिपाही का खेल खिलाता इसमे पर्ची निकाल कर चार बच्चे  राजा, वजीर, चोर व सिपाही बन जाया करते ।शुभम कुछ ही दिनों में गाँव के बच्चों के साथ उनके सभी पारम्परिक खेल सीख  चूका था अब वो धूल मिट्टी और धूप में भी स्वयं को सहज महसूस करता कुछ दिनों बाद अवधेश शुभम से घर वापस चलने के लिए कहता तो शुभम का जवाब होता ----पापा वहां ये सारे खेल कहाँ खेलने को मिलेंगे वहां तो टीवी,वीडियों गेम मोबाईल और कम्प्यूटर पर खेल होते है मेरा सर भी दुखने  लगता है लेकिन ये वाले खेल में मैं अब तेज दोड़ सकता हूँ थकता भी नहीं हूँ और यहाँ कोई जीतने के लिए नहीं खेलता बल्कि कोई एक साथी अगर एक दिन नहीं आता तो सबके सब उसके घर चले जाते उसे बुलाने |वहां तो खेलने के लिए सबसे रिक्वेस्ट  करनी पड़ती है यहाँ सब अपने आप एक दूसरे के साथ खेलने आ जाते है शुभम की बातें सुनकर अवधेश  की आँखों से आंसू की धार बहने लगती है| आखिर हम जहाँ पले बड़े वही की चीजों से अपने बच्चो को वंचित कर रहे है जबकि शहर की सुख सुविधाओं में पल बढकर भी  शुभम  शारीरिक रूप से बेहद कमजोर हो गया, उसे महसूस होता है दिमागी खेलों में अपना बचपन जीने वाले बच्चे कभी हार जीत से बाहार आ ही नहीं पाते न ही शरीर से स्वस्थ अपना बचपन जी पाते किताबों का बोझ वेसे ही दिमाग की कसरत के लिए कम पड़ता है जो टीवी के सामने बच्चो को बैठाकर हम उनके बचपन  के साथ खिलवाड़ कर रहे होते है|  शुभम के मोटे होने की वजह भी शायद यही थी| शुभम अवधेश से कहता है ---पापा इन खेलों में कोई खर्च  और साधन भी नहीं चाहिए फिर इनको हम वहां क्यों नहीं खेलते कोई लिखित नियम नहीं सब मिलजुलकर खेलते है |अवधेश शुभम के गाँव में बिताएं इन कुछ दिनों के अनुभवों के आगे निरुत्तर हो जाता है |अवधेश आत्मानुभूति के इस चिन्तन में  डूब  जाता है  --–चिन्तन के ये क्षण उसे एक गहरी सोच में डूबो देते है -- ‘माटी के इन खेलों को हमने बच्चो के जीवन से दूर तो कर दिया,पर क्या उन्हें ऐसे ही व्यापक लाभों वाले नए खेल दे पाये  ? आज भला ऐसा कौन सा खेल हैं जिसमें हार सालती नहीं और जीत के लिए तिकड़में नहीं होने लगती |
 बचपन को कुछ तो किताबों के बोझ ने लील लिया बाकी टी.वी. संस्कृर्ति की भेंट चढ गया । जो बचा भी उसे जमाने की हवा ने अपने हिसाब से ढाल दिया । बेशक खेल आज भी हैं और खेलने के साधन भी लेकिन इनमे वह बात कहां जो इन खेलों मे थी । सामाजिक  बदलाव  का चरित्र न बदला तो शायद एक दिन हमे यह भी याद न रहेगा कि हमारे बचपन मे कभी ” हरा समंदर, गोपी चंदर….या आम छुरी छप्पन चूरी,गरम मसाला पानी पूरी, अक्कड बक्कड बम्बे बो, अस्सी नब्बे पूरे सौ ,सौ में लगा धागा चोर निकल कर भागा…. जैसे गीतों से जुडे किस्म के खेल भी थे । दरअसल माटी से जुड़े इन खेलों के पीछे अपना एक विज्ञान है जीवन के हर पहलू को बेहतर बनाने वाला विज्ञान| लोकखेलों ने हमें ईमानदारी भी सिखाई है,वे बताते है कि असल आनंद खेलने का है | हारकर ‘दाम’ देने में भी मजा है |जीवन के इस सच्चे आनंद के लिए, एक अच्छे व्यक्ति के निर्माण के लिए अगली पीढ़ी को अपनी मिट्टी के खेलों की विरासत सोपना जरुरी है सामूहिकता,सामाजिकता के गुणों के  विकास के लिए लोकखेलों को विस्म्रत करना न तो बचपन के साथ न्याय है , न ही सम्पूर्ण परवरिश का उदाहरण और न ही जिम्मेदारियों के रूप में बचपन के अभावों की पूर्ति | हाथ में वीडियों गेम पकड़ा देने और कम्प्यूटर पर खेल डाउनलोड कर देने से बचपन पूरा नहीं हो जाता | इन बच्चों और किशोरों के शरीर, मन और भावी व्यक्तित्व का निर्माण बचपन में खेले इन खेलों से जुड़ा है| इन्हें गंभीरता से लेना उतना ही जरुरी है जितना गिल्ली डंडे में देखकर हिसाब लगाना की गिल्ली कहाँ तक जाएगी या कितनी दूर पर अब तो गिल्ली ही गुम हो गई ! गर्मियों की छुट्टियाँ खेल के साथ- साथ व्यक्तित्व निर्माण का भी अवसर लाती है इसी चिन्तन के साथ अवधेश एकदम से कह कह उठता है--- बेटा ! मुझे भी अपने बचपन की गुम हुई गिल्ली तलाशना है क्या तुम मेरी मदद करोगे | 

 यह रचना शोभा जैन जी द्वारा लिखी गयी है . आप  एक शोधार्थी के रूप में, एवं मुख्य रूप से आलेख,लघु कहानी,कविताओं,शोध पत्र लेखन में सक्रीय हैं . आपकी  लघु कहानी-‘किशोर मन का प्रेम’ –राष्ट्रीय ‘समावर्तन’ मासिक पत्रिका अंक जनवरी २०१६,आलेख –सोशल साईट्स और लोकव्यवहार- साहित्य कुञ्ज मासिक पत्रिका अंक मार्च २०१६,दो लम्बी कवितायेँ –रचनाकर अंतर्जाल  पत्रिका में प्रकाशित अंक फरवरी २०१६ तथा मुद्रित अमुद्रित पत्र-पत्रिकाओं प्रकाशन एवं ‘स्थानीय अखबार व्हाईस आफ हरदा’- २००० से २००२ तक निरंतर प्रकाशन हैं .
संपर्क सूत्र  – ‘शुभाशीष’, सर्वसम्पन्न नगर इंदौर, मध्यप्रदेश ,मोबाईल नम्बर-9977744555
 ईमेल-idealshobha1@gmail.com

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  1. शोभा जी, बहोत ही बढ़िया लेख. आपके लेख ने तो बच्चपन की यादें ताज़ा कर दी. लेख पढ़कर ऐसा लगता हैं की फिर से बच्चें हो जाये.

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  2. बहुत सही बात कही है आपने, मुझे भी अपने आसपास बच्चों के लिए इन खेलों की कमी महसूस होती है। अब पढाई और प्रतिस्पर्धा ने खेलने का आनंद छीन लिया है।

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  3. वर्षा जी आपका बहुत आभार -हमारे ये लोक खेल अब इंटरनेट मोबाईल ले गए है जिसके चलते बच्चों का शारीरिक विकास प्रभावित हो रहा है |

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  4. BAHUT HI ACCHI POST HAI KYA KARE AAPNE AAJ AANKHE NAM KI BACHAPAN KI YAAD DILA KE

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