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चीखों का उपहार

भोर होने से पहले
चैन से सोया पंछी
आवारा कुत्तों का क्रंदन
बादलों की ओट में छिपे तारे
तेज़ी से सड़क की छाती रौंदती कार
स्टेशन पर जेब काटते बच्चे
शोर मचाता सीलिंग फैन
फूटपाथ पर पड़ा लाशनुमा व्यक्ति
अंधेरे में मुस्कुराती मेरी परछाई
सभी अनजान हैं, मेरी चीख से।

दिपेश कुमार
घर के सारे काम करके
कॉलेज जाकर पढ़ाती हूँ
जीन्स टॉप और सलवार सूट वाली लड़कियों को
ज़ुल्म मत सहो,
अपने हक़ की लड़ाई लड़ो
फिर वापस घर आती हूँ
बिना थके, जुट जाती हूँ
कोल्हू के बैल की तरह......
तब जाकर कहीं उपहार पाती हूँ
एक से बढ़कर एक चीख।

थक चुकी हूँ
उपहारों के बोझ से
अँधेरे ने ढक दिया है
देह के सारे उपहारनुमा ज़ख्म
ये अँधेरा भी तो मजबूर है
बँधा है, ज़माने के रिवाज़ से।

तोड़ूँगी!!!
हाँ, तोड़ूँगी ये रिवाज़
अँधेरे में निकलेगा सूरज
मेरा अपना सूरज
जो अस्त होना नहीं जानता
मिटा देगा, अँधेरे का अस्तित्व।

मेरा छोटा-सा सूरज
निगल लेगा उस सूरज को
फिर कभी रात नहीं होगी
और ना ही चीखों का उपहार
होगा तो सिर्फ दहकता आग का गोला।


यह रचना दीपेश कुमार जी द्वारा लिखी गयी है . आप बी. ए. हिंदी (प्रतिष्ठा) द्वितीय वर्ष के छात्र है . आप साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखनी चलाते हैं व स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य में रत हैं . 

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