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अरी दादी
बारात चलने वाली थी। मेहमान तैयार होकर धीरे-धीरे बाहर इकट्ठे हो रहे थे। बिट्टू को भी महंगा सूट पहनाकर सजा दिया गया। वह पिछले दो दिनों से बुआ, नानी का हाथ पकड़े घूम रहा था। उसकी माँ मीना भाई की शादी में व्यस्त थी। उसे बिट्टू की सुध लेने की फुर्सत नहीं थी। घर की महिलाएं एक से बढ़कर एक सजने सँवरने में लगी थी। बारात चलने के कुछ घंटे पहले बुआ, नानी भी व्यस्त हो गई। उन्हें थोड़ा मेकअप कराना और साड़ी सेट करानी थी। उन्होंने बिट्टू को नौकर के हवाले कर दिया। इस समय नौकर को भी सैकड़ों काम थे उसने बिट्टू को बाई के सुपुर्द कर दिया। बाई को बारात जाने के लिये तैयार होना था। साथ ही बीच-बीच में उसे काम के लिये आवाज लग जाती थी। इस समय बिट्टू को सम्भालना उसके लिये मुमकिन नहीं था। वह गलियारे में बिट्टू को छोटे साहब के हवाले करने आई। परन्तु छोटे साहब यह कहते हुए आगे बढ़ गए कि मुझे बहुत काम है। बाई ने यह सुना नहीं। उसने बिट्टू को उसके चाचा की ओर चलता कर दिया और घर में आकर बरात जाने की तैयारी में लग गई। 
बिट्टू कुछ देर भौचक्का सा लाइट, डी.जे. और आगंतुकों को देखता रहा। तभी उसकी नजर एक छोटे से कुत्ते पर पड़ी। वह उसके साथ खेलने लगा। वह कभी पिल्ले की पूंछ पकड़ कर खींचता तो कभी कान। पिल्ला हल्का सा गुर्राता। बिट्टू उसे छोड़ देता। पिल्ला थोड़ी दूर हट जाता। बिट्टू उसे अपने पास आने का इशारा करता हुआ बोलता- “डॉगी आओ, डॉगी आओ।” पिल्ला फिर उसके पास आ जाता और अपनी छोटी पतली दुम तेजी से हिलाने लगता। कभी-कभी बिट्टू के हाथ से मार खाकर भी पिल्ला उसके पास ही रहता। बिट्टू ने अपने हाथ का बिस्कुट उसे खिला दिया था। यही लालच उसे बिट्टू के पास से हटने नहीं दे रहा था। वह अपने कान छुड़ाने को हल्की सी कै-कै की आवाज करता। बिट्टू जोर से हंस पड़ता। बिट्टू देर तक डॉगी के साथ खेलता रहा। 
अपर्णा शर्मा
बारात पूरी तरह सजधज कर मुख्य सड़क की ओर बढ़ने लगी। ‘मुन्नी बदनाम हुई’ के बाद ‘चिकनी चमेली’ की कान फोड़ देने वाली आवाज पर लोग थिरक रहे थे, झूम रहे थे। कुछ ने रंग जमाने के ख्याल से पैग भी लगाये थे। 
महिला हों या पुरूष सभी वीडियो कैमरे के सामने अपने महंगे कपड़ों, चमचमाती आर्टिफिशल ज्वैलरी, मेकअप और डांस को प्रदर्शित करने की होड़ में थे। वे एक दूसरे को धकिया रहे थे। बिट्टू की छः वर्षीया बहन सोनी भी बड़ों के बीच जगह बनाते हुए डांस पार्टी में पहुँच गई। वह टी0वी0 शो में सिखाए स्टैप्स पर डांस कर रही थी। बड़ों के डांस में उसके हिसाब से ढेरों कमियाँ थीं। वीडियो कैमरा कुछ देर के लिये सोनी की ओर मुड़ गया। बड़े भी उसके डांस की तारीफ कर रहे थे। उसके ऊपर नोट लगाये जा रहे थे। सोनी अपनी पूरी तन्मयता से नाच रही थी। गाना खत्म हुआ और म्यूजिक की आवाज कम हुई तो सोनी के कानों में किसी के रोने की आवाज आई। 
बारात आगे बढ़ी और सोनी पीछे दौड़ी। वह महिलाओं के पास आकर नानी, बुआ की खोज करने लगी। दो-तीन आंटियों के हाथ को जोर से झकझोर कर उसने चिल्लाती सी आवाज में नानी, बुआ के बारे में पूछा। मुश्किल से वह उन तक पहुँच पाई। उसने उनके साड़ी के पल्लू को जोर से खींचा। वे नीचे झुकी तो सोनी ने उनके काम के पास मुँह ले जाकर तेज आवाज में बिट्टू के विषय में बुझा। उन्होंने हाथ के इशारे से और बोलकर बताया कि वे उसके बारे में नहीं जानती। उन्होंने तो उसे नौकर के सुपुर्द कर दिया था। 
इतनी भीड़ में सोनी नौकर को कहाँ ढूढ़ती? वह भीड़ में इधर-उधर दौड़ती हुई कभी मौसी, कभी नानी तो कभी बुआ से बिट्टू और नौकर के विषय में बूझने लगी। कोई भी उसे सही जवाब नहीं दे रहा था। एक आण्टी ने सोनी को डांट भी दिया- “अरे तू इतनी फिक्रमंद क्यों हो रही है वह आगे बारात में किसी के पास होगा।” सोनी कुछ देर शांत रहकर फिर बिट्टू को खोजने लगी। तभी उसे गली से बच्चे के रोने की आवाज महसूस हुई। इस बार उसने किसी से कुछ भी न कहा। सीधे घर की ओर दौड़ने लगी। सोनी पीछे अंधेरे की ओर भाग रही थी और बारात तेज रौशनी और म्यूजिक के साथ आगे बढ़ रही थी। 
बारात विवाह मण्डप में पहुँच गई। मंडप के बाहर एक घंटा जमकर डांस हुआ। दूल्हा स्टेज पर पहुँच गया। स्टेज के सामने के लम्बे रास्ते पर कालीन बिछा था। दोनों ओर लाइट वाले खूबसूरत गमले सजे थे। दुल्हन अपनी सखियों के साथ आहिस्ता-आहिस्ता कदम बढ़ाती स्टेज की ओर बढ़ रही थी। वीडियो कैमरा उसके हर कदम और अंदाज को कैद कर रहा था। दुल्हन स्टेज पर आई, जयमाल डाली और दूल्हा-दुल्हिन को अलंकृत ऊँची कुर्सियों पर बैठा दिया गया। रिश्तेदार बारी-बारी से आकर उन्हें आशीर्वाद देने और फोटो खिंचवाने लगे। दूल्हे के कहने पर बहन मीना भी फोटो खिंचवाने बढ़ आई। परन्तु बच्चे कहीं नहीं थे। उनकी पूछ-ताछ शुरू हुई, ढूंढा गया वे मिल नहीं रहे थे। किसी ने कहा- “आप तो फोटो खिंचवाइये। बच्चों के साथ फिर एक पोज हो जाएगा।” पोज हो गया। स्टेज से उतर कर मीना और उसके पति बच्चों के लिये एक दूसरे को दोष देने लगे। 
मीना ने पति को उलाहना देते हुए कहा- “आज के दिन मेरे पास इतना काम है। आप बच्चों की सुध भी नहीं रख सकते?”
वे बोले- “तुम समझती हो हम मर्दों की कितनी जिम्मेदारियाँ हैं। अब बच्चों को भी हम ही सम्भाले तो तुम महिलाएँ क्या करोगी?”
बुजुर्ग ताई समझाने लगी- “झगड़ते क्यों हो? अभी मिल जाएंगे। यही कहीं होंगे।”
नानी बोली- “सोनी को ढूंढ़ लो, बिट्टू तो अपने आप मिल जाएगा। वही उसका हाथ पकड़े कहीं घूम रही होगी।”
तभी किसी ने कहा- “उधर शायद खाने के पण्डाल में हों।”
सोनी की मौसी बोली- “सोनी को तो खाने से अधिक नाचने का शौक है। देखना अभी स्टेज पर आ जायगी।” कई लोगों की बातों के बीच बच्चों को ढूढ़ने की बात आई गई हो गई। सब एक दूसरे पर टाल कर नाच-गाना, बातों और काम में मश्गूल हो गए। 
खाना समाप्ति पर आ गया। फेरों की तैयारी होने लगी। बिट्टू और सोनी अब भी नजर नहीं आ रहे थे। मीना को एक बार फिर बच्चों की सुध आई। उसने सामने खड़े अपने छोटे भाई को हाथ के इशारे से बुलाया और उससे बच्चों के बारे में पूछा। वह बोला- “कमाल है, अभी तक बच्चे मिले नहीं और आप लोग बड़े मजे से घूम रहे हैं।”
इस बार बिट्टू और सोनी के न मिलने का शोर जोर से उठा क्योंकि डी.जे. का बंद हो गया था। चारों ओर-पण्डाल के अन्दर-बाहर, खाने व नाचने के स्थानों, झरनों और फव्वारों के आस-पास, लान, कमरों आदि में बिट्टू और सोनी की तलाश होने लगी। खबर लड़की वालों के घर भी पहुँच गई। वहाँ भी इन्हें खोजा गया। सब बच्चों को करीब से देखा परखा जाने लगा। अब बिट्टू की नानी और माँ को हर बच्चा सोनी और बिट्टू नजर आ रहा था। 
पंडित जी ने कहा- “आप बच्चों की तलाश करते रहें और साथ ही फेरों का काम भी शुरू करा दें। मुहूर्त निकल रहा है।” दूल्हा-दुल्हन को मण्डप में बैठा दिया गया। छः सात लोग उनके पास बैठ गए। शेष बच्चों की तलाश में लगे रहे। पण्डाल करीब-करीब खाली हो गया था। स्थानीय लोग अपने घरों को चले गए थे। मेहमान और घर के लोग पण्डाल में कुछ झुंडों में एकत्र हो गए थे। वहाँ तरह-तरह की बातें हो रही थी। एक बुजुर्ग महिला बोली- “अरे माँ की इतनी लापरवाही भी अच्छी नहीं। घंटों से बच्चों को पता नहीं और यह आराम से घूम रही है।”
उसका समर्थन उसकी एक हम उम्र ने किया- “इतने बड़े परिवार में भला किसी को तो बालकों की जिम्मेदारी लेनी चाहिए थी।”
तभी किसी ने सलाह दी- “घर जाकर तो देखो कहीं वहीं न छूट गए हों।”
चार लोग गाड़ी में बैठकर घर की ओर रवाना हुए। पूरा घर, छत, रसोई, बाथरूम, स्टोर और कमरों सहित तलाशा गया। परन्तु बच्चों का कहीं पता न चला। आस-पास के घरों को भी खटका कर देख लिया गया। सब जगह निराशा ही हाथ लग रही थी। अब मामला गम्भीर हो गया था। 
रात के दो बज चुके थे। बिट्टू की माँ को अब वास्तव में बच्चों के खोने का एहसास होने लगा था। उसे रूलाई आने लगी। पर वह उसे दबाये कभी नौकर, कभी बिट्टू की नानी और कभी बिट्टू के पापा पर अपना गुस्सा निकाल रही थी। कुछ बड़े लोग उसी को बेवकूफ बता व डाँट रहे थे। तो कुछ दिलासा दे रहे थे। अब उम्मीद की जा रही थी कि बच्चे किसी स्थानीय रिश्तेदार के साथ चले गए होंगे। इसको निश्चित करने के लिये एक साथ कई मोबाइल काम करने लगे। सब पर एक ही तरह के सवाल पूँछे जा रहे थे। परन्तु सभी जगह से निराशाजनक जवाब मिल रहा था। 
भाँवर व देवपूजन का कार्य सम्पन्न हुआ। बारात दुल्हन को लेकर घर आ गई। खुशी के साथ दुःख भी था। जहाँ-जहाँ बैठे लोग बच्चों की चर्चा कर रहे थे। अब थाने में रिपोर्ट लिखवाने के अतिरिक्त और कोई रास्ता नहीं था। बिट्टू की नानी उसकी माँ पर बिगड़ रही थी- “तुमको अपनी सास को बुला लेना चाहिए था। कम से कम बच्चों को तो सम्भाल लेती।”
इस समय वह भी झल्ला रही थी- “मैं तो बुलाना चाहती थी। परन्तु सबसे ज्यादा एतराज आपको ही था कि वह देहातन हमारे मेहमानों में नहीं जँचेगी। मैं तो महसूस करती हूँ कि वह दिखने में चाहें जैसी हों बच्चों की देख-भाल तो जी जान से करती हैं। छोटेपन में बिट्टू उन्हीं की गोद में सबसे अधिक आराम से सोता था। फिर आपको ही परेशानी होने लगी कि बच्चे मैनर्स नहीं सीख रहे हैं। आपके समझाने से ही सोनी भी उनसे चिढ़ने लगी।”
सोनी के नाना थोड़ी तेज आवाज में बोले- “अच्छा अब बंद करो यह बहसबाजी। ज़िरह का समय नहीं है। दिमाग लगाओ कि बच्चे कहाँ हो सकते हैं। जितना जल्दी हो उन्हें ढूढ़ने की कोशिश करनी चाहिए।”
नौकर, बाई और घर के अन्य काम वालों से बारी-बारी से पूछ-ताछ हो रही थी। बिट्टू के पापा और मामा उन्हें फटकार लगा रहे थे। वे अपनी-अपनी सफाई में कार्य की अधिकता के तर्क दे रहे थे और बच्चों के खोने का कसूरवार एक दूसरे को ठहरा रहे थे। बच्चों के अपहरण की आशंका भी की जा रही थी। यह कब और किसकी मदद से हुआ होगा इस संबंध में कयास लगाये जा रहे थे। नई दुल्हन को बच्चों के खोने की थोड़ी जानकारी पहले मिल चुकी थी। अब पूरी घटना सुनकर और घर के ग़मगीन माहौल को देखकर वह सिसकने लगी। कुछ महिलाएं उसे चुप कराने का प्रयास करने लगी। तभी बाहर कोई जोर से चिल्लाया- “अरे जल्दी आओ। बच्चे मिल गए हैं। ये यहाँ हैं।”
यह बिट्टू के मामा के दोस्त की आवाज थी। जो टैंट वाले को बरामदे में ढेर लगे रजाई गद्दों को वापसी के लिये गिनवा रहे थे। उनकी आवाज सुनकर सब उधर दौड़े। 
दो गद्दों को एक ओर झुकाकर कोने में छिपकर बैठने की थोड़ी जगह बनाई गई थी। दो गद्दे नीचे बिछे थे। यहीं कोने में बिट्टू दुबका गहरी नींद में सोया था। सोनी उसे गोद में समेटे किसी बुजुर्ग महिला सी पैर सिकोड़े लेटी थी। उसके शरीर पर केवल फ्रॉक व कच्छी थी। अपना स्वेटर और पैंट उसने बिट्टू को पहना दिये थे। मीना दौड़ कर बच्चों से लिपट गई। सबके तेज बोलने से बच्चे कुलबुलाने और आँखें मलने लगे। सोनी बोनी- “आप सब बिट्टू को छोड़कर बरात में चले गए थे। यह सामने गली में नाली में गिरा हुआ था। वहीं से अंधेरे में जोर-जोर से मम्मी-मम्मी चिल्ला रहा था। इसके सारे कपड़े भी भीग गए थे।”
मीना ने बच्चों को गोद में समेट लिया। थोड़ा रूककर सोनी बोली- “मैंने इसे नाली से निकाला और अपने कपड़े पहना दिये। ठंड से बचाने को इसे यहाँ छिपाया।”
बिट्टू की नानी आगे बढ़कर बोली- “अरी दादी” और सोनी का सिर सहलाने लगी।  

डॉ. (श्रीमती)  अपर्णा शर्मा ने मेरठ विश्वविद्यालय, मेरठ से एम.फिल. की उपाधि 1984 में, तत्पश्चात् पी-एच.डी. की उपाधि 1991 में प्राप्त की। आप निरंतर लेखन कार्य में रत् हैं। डॉ. शर्मा की एक शोध पुस्तक - भारतीय संवतों का इतिहास (1994), एक कहानी संग्रह खो गया गाँव (2010), एक कविता संग्रह जल धारा बहती रहे (2014), एक बाल उपन्यास चतुर राजकुमार (2014), तीन बाल कविता संग्रह, एक बाल लोक कथा संग्रह आदि दस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। साथ ही इनके शोध पत्र, पुस्तक समीक्षाएं, कविताएं, कहानियाँ, लोक कथाएं एवं समसामयिक विषयों पर लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। आपकी बाल कविताओं, परिचर्चाओं एवं वार्ताओं का प्रसारण आकाशवाणी, इलाहाबाद एवं इलाहाबाद दूरदर्शन से हुआ है। साथ ही कवि सम्मेलनों व काव्यगोष्ठियों में भागेदारी बनी रही है। 

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  1. जब तक कहानी का अंत नही हुआ मन में जाने कितनी आशंकाएं आती रही ।बच्चों के मिल जाने पर मेरी भी जान में जान आई ।
    बहुत उम्दा और झकझोरने वाली कहानी ।साधुवाद आपको !

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