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अस्तित्व की तलाश 
अस्तित्व की तलाश , मैं तो करता गया
और गॉव से शहर , आता गया
सोंधी माटी की खुशबु, भी छोड़ता गया
कमलेश संजीदा
और हकीकत से ,दूर मैं  तो होता गया।

आत्मा को अपनी, मैं तो बेंचता गया
और अंधेरों की तरफ , मैं तो बढ़ता गया
उजालों  से दूर, मैं तो  होता गया
और अंधेरों को गले  से, लगाता गया।

शहर का हवा पानी, मुझे लगता गया
और गॉव का सब कुछ, भूलता गया
दिखने वाले उजालों की तरफ , बढ़ता गया
और अपने अंदर का अँधेरा , बढ़ाता गया।

सही गलत का हिसाब सब लगाता गया
और गलत को सही समझाता गया
बिन आत्मा के , मैं तो चलता गया
एक मशीन सा ही  बनता  गया।

दिन  रात  के चक्रव्यूह में फसता गया
और जमीर बेंचकर पैसा कमाता गया
अपनी ही नज़रों में आदमीं, कितना गिरता गया
फिर भी उठने का ढोंग सा करता गया।

बंद माचिस की तीलियों  की तरह रहता गया
अपना अस्तित्व खोता गया
तिल- तिल करके, हर वक्त जलता गया
और खाली माचिस की तरह ही, फिकता गया ।

यह रचना कमलेश संजीदा उर्फ़ कमलेश कुमार गौतम  जी द्वारा लिखी गयी है।  आप १९८७ से कविता, गाने, शायरी,लेख,कॉमिक्स , कहानियां लिख रहें  हैं।   अब तक आपने  लगभग ५०० कवितायेँ ,५००- गाने ,६००- शायरी ,३-कॉमिक्स, २०-कहानियाँ लिखें हैं। संपर्क सूत्र -  कमलेश संजीदा उर्फ़ कमलेश कुमार गौतम  अस्सिटेंट प्रोफेसर - डिपार्टमेंट ऑफ़ कंप्यूटर ऍप्लिकेशन्स , एस. आर. एम यूनिवर्सिटी  एन. सी. आर. कैंपस मोदीनगर, गाज़ियाबाद , उत्तर प्रदेश  मोबाइल नंबर. ९४१०६४९७७७ ईमेल. kavikamleshsanjida@gmail.com

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