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व्यर्थ क्यों आँसू बहाना ?

बिखरी अलकें, शुष्क होंठ और, आँसुओं से आँख भर
साँवरे से रूप को एक ओढ़नी से ढाँप कर
एक लड़की याद उसको कर के तकती राह को
मोहित भट्ट
जो गया था स्वर्ग का आभास दे कर बाँह को
ग्रीष्म की तपती पवन चुभती की जैसे आरियाँ
और कुछ पल देख कर यह बोल उठी पुरवाइयाँ
-" सुन री पगली! राह को कब तक निहारोगी बताना
कौन लौटा है यहाँ पर, व्यर्थ क्यों आँसू बहाना? "

जिसने सिखलाया कभी था, पाठ जय की कुंजियों का
जिसने इक वादा किया था, रंग बनेगा बिंदियों का
जिसने यह शर्तें रखी थी, और ज़रुरी था निभाना
-"आज से जो भी तुम्हारे मन में आये बोल जाना"
तुम बिना क्या हो ह्रदय की बात को कहना सुनाना
कौन लौटा है यहाँ पर, व्यर्थ क्यों आँसू बहाना?

जिसके कारण गाँव में बगिया के हर माली से ठनकर
रोज़ उसका अनछुए फूलों से स्वागत हर मिलन पर
चूमकर बादल उदासी के कहा वो -"मैं रहूँगा"
-"मत विकल हो! मैं तुम्हारे साथ ही हूँ, और रहूँगा"
पर तुम्हारी आदतों में, बोलकर है भूल जाना
कौन लौटा है यहाँ पर, व्यर्थ क्यों आँसू बहाना?

पूर्णिमा का चाँद मैंने, आजतक वैसे न दीखा
जिसको तुम कहते थे लगता, मेरे मुखड़े के सरीखा
मेरे हिलकोरों को जिसने, मुस्कुराने की वजह दी
या विरह की सिसकियों को,अपनी आँखो में जगह दी
आज आना, फिर चले जाना, बनाकर इक बहाना
कौन लौटा है यहाँ पर, व्यर्थ क्यों आँसू बहाना?

यह रचना मोहित भट्ट जी  द्वारा लिखी गयी है . आप गीत, छंद, मुख्तक आदि विधाओं में अपनी लेखनी चलाते हैं तथा मासिक काव्य गोष्ठियों में अविरित भाग लेते हैं . संपर्क सूत्र - ईमेल- mohit.peak@gmail.com
मोबाइल - 8182034122,7080801349, पता- c-38 vivekanandpuram,kalyanpur(w),lucknow-226022
Uttarpradesh

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