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दीपक पाटीदार 'कविदीप' की कविताएँ

(१)मैं तुम्हें लिखता हूँ -
लिखता ही नहीं मैं बस प्यार में तुम्हें,
और भी कई जगह है जहाँ रहते
मैं तुम्हें लिखता हूँ।

बहती नदी के किनारे बैठे
दीपक पाटीदार 'कविदीप' 

उसकी कलकल में,
उसके बहाव के चट्टानों से टकराने पर
उछलती बूंदों के सजने में
मैं तुम्हें लिखता हूँ।

आकाश में उड़ते पंछियों की
दुनिया से बेपरवाह उड़ान 
और पूरे आसमान को
अपने पंखों में समेटने की चाहत में
मैं तुम्हें लिखता हूँ।

पहाड़ों की ढलान में
बिछी हुई हरियाली में 
कहीं-कहीं खिलते फूलों की
रंगीली महक और उन पर
भंवरों के आकर्षण में
मैं तुम्हें लिखता हूँ।

सड़क पर चलते हुए उसके किनारे
काम करते मजदूर के गहरे सपनों में
मैं तुम्हें लिखता हूँ।

मैं तुम्हें लिखता ही नहीं बस प्यार में
और भी कई हसीन चीजें हैं ऐसी
जिनमें मैं तुम्हें लिखता हूँ।

(२)बस एक ही शब्द -
वो मुझे
अपनी सारी चाहते,
सारे दर्द बता गई।

मुझसे सारी शिकायतें कर गई।
बस एक ही शब्द में
वो एक ही शब्द जो था मौन !

(३)उसके कहने से पहले ही -
मुझे हल्की-हल्की
प्यास लगी ही थी कि
उसने मुझे भरकर पानी का ग्लास
थमा दिया हाथ में

ये देख मैं
जरा भी हैरान नहीं हुआ
क्योंकि मैं भी जान जाता हूँ
उसके मन की हर बात
उसके कहने से पहले ही।

(४)मैंने पाया कि -
छोटी सी खुशी थी वो
मगर मेरे लिए उससे बड़ी
और कोई खुशी नहीं थी

उसने मेरे लबों पर
एक महकती सी मुस्कान रख दी
और मैंने पाया कि
मैं सबकुछ पा चुका था।

(५)एहसास -
खिड़की से आई हवा ने
जब उड़ा दिया होगा जुल्फों को तुम्हारी
और तुमने देखा होगा
एकदम से पीछे मुड़कर

मुझे पता है
तुम्हें हुआ होगा एहसास
मेरे वहाँ होने का

ठीक वैसे ही जैसे मुझे होता है
हवा की दस्तक पर
दरवाजा खटकते ही पर्दे के पीछे
तुम्हारे खड़े होने का एहसास।

(६)मुस्कान -
वो जाते- जाते
मुड़कर एक मुस्कान दे गई
और उसी मुस्कान में ही 
सिमटा रह गया
उसके जाने का गम भी।

(७)उनके जाने पर -
उनके जाने पर
सब कुछ सूना सा रहा

दिन भी सूना, रात भी सूनी
और जूतों की जगह पड़ा अकेला
मेरे जूतों का जोड़ा
करता रहा इंतजार
अपने साथी जूतों के जोड़ों का रात भर।


यह रचना  दीपक पाटीदार 'कविदीप' जी द्वारा लिखी गयी है . संपर्क सूत्र - गांव - भमेसर, जिला - नीमच, मध्यप्रदेश,Mo.8819810049

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