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बेटी तेरा नसीब 
माँ के लाड प्यार ने उमा को पागल बना दिया I जब भी मनोहर उमा को डाँटते या समझाते कयामत सी आ जाती I उमा की माँ सावित्री छाती पर चढ़कर ताण्डव करने लगती I 
          उमा पढ़ने में बहुत ही होशियार लड़की थी I कक्षा में सबसे आगे किन्तु कुछ गन्दी आदतें उसे जकड़े हुए थी I खुद मनोहर ने आँखों से देखा I सावित्री से कहा भी था किन्तु क्या फायदा सारा राशन पानी लेकर सिर पर सवार थी I मनोहर को पिता होना अब मुसीबत से कम नहीं था I 
         "देख बेटी उमा ,मैं तेरा बाप हूँ थोड़ी बात मेरी भी सुन लिया कर I" मनोहर ने उदारता पूर्वक कहा I 
     
   "क्या है पिताजी ?क्या मैं आपकी बात नहीं सुनती ?I "उमा ने पल में जवाब दिया I 
         "सुनती है ,पर ध्यान से नहीं I "
         "अच्छा नहीं सुनती तो माँ को ध्यान से समझा देना I माँ से मैं समझ लूँगी I "उमा बाहर निकल गई I 
          मनोहर ठगे से रह गए बार बार सिर खुजलाए I , 'क्यों न सावित्री को समझाया जाए I 'मनोहर अंदर चले गए I 
         "अजी,सुनती है ,तेरी लाडो ने मेरी एक बात न सुनी तू ही सुन ले I उमा में दिन व दिन गन्दी आदतें पड़ती जा रहीं हैं I वह बाहर किसी सहेली से नहीं ,एक लड़के से मिलने जाती है I वह लड़का अनजान है I फर्जी है I उमा को नरक में डाल सकता है I "
        "बस तुमसे ये बातें सुन लो अपनी औलाद के लिए यह सोचना भी पाप है I"सामने से मुँह भरा जवाब मिला I 
         "उमा कहाँ जा रही है I "मनोहर ने पूछा I 
         "जा कहाँ रहीं हूँ ,अपनी सहेली से मिलने I "उमा ने जवाब दिया I 
         "क्यों तुम बीच-बीच में मेरी लाडो को परेशान करते हो ? जब भी आती है सौ सवाल, जब भी जाती है सौ सवाल I तुम बाप हो या दुश्मन I "पास खड़ी सावित्री बीच में ही बोल उठी I 
          मनोहर ने अपने ही गाल पर जोड़ का तमाचा मारा और कुर्सी पर बैठ गए I हाँफते सीना फुलाए I 
          सावित्री मंदिर चली गयीं ,मनोहर भी जरूरी काम से बाहर ,तभी वह लड़का घर आ धमका I बहला फुसलाकर उमा को भगा ले गया I मनोहर जब घर लौटे पाँव तले जमींन खिसक गई I सारा माहौल दुःख से भर गया I 
          "अब तेरा कलेजा ठंडा पड़ गया I " मनोहर खींजे I 
          "मुझे क्या पता उमा ये कर बैठेगी ? I "
          "तुझे नहीं मुझे पता था I लाख समझाने पर भी दोनों के दिमाग में बात नहीं घुसी I मैं पागल था जो तुम्हारे पीछे दाँत हिलाए घूमता रहता I "
           सावित्री रोने लगी ,"अब जी में आए सब बोले जाओ ,गलती मेरी है I "
           मनोहर ने दो चार लोगों को बुलाकर उमा को खोज तो एक शहर में मिल गई I जबरन उसे उठा लाए I दो तमाचे भी गाल पर जमा दिए I 
          "तूने मेरी नाक पर कालिमा आखिर पोत ही दी I "
           उमा ठनककर रोने लगी अंदर पड़ी चारपाई पर लेट गई I 
          "उमा की माँ मैं जरूरी काम से बाहर जा रहा हूँ ,ख्याल रखना I "
          "ठीक है जी I "
       
अशोक बाबू माहौर
   मनोहर के बाहर जाते ही लड़का घर पर आ धमका अपने तमाम साथियों के साथ I सावित्री को रस्सी में बाँध दिया गाली गलौंच करते हुए उमा को भगा ले गया I मनोहर शाम को घर लौटे सारा नजारा देखकर दंग रह गए I सावित्री को रस्सी से खोला I पास वाले थाने में रिपोर्ट भी लिखवाई किन्तु कोई फायदा नहीं हुआ पुलिस वालों ने केस को दबा दिया I 
            कुछ सालों बाद मनोहर और सावित्री तीर्थ यात्रा कर के घर की तरफ लौट ही रहे थे कि रास्ते में एक साँवली औरत धूल से लथपथ मैली सिकुड़ी साड़ी पहने अपनी छोटी बच्ची को गोद में रखे मनोहर को बार बार निहारती I 
            "उमा की माँ ,देख ये औरत इसका भी क्या जीवन है ?बार बार हमारी तरफ देखती है ,आँखे पौंछती है I "
            "ये तो हमारी उमा है I "सावित्री ने देखते ही पहचान ली I 
             दोनों उसकी तरफ भागे I उमा भी खड़ी हुई भागकर माँ की छाती से लिपट गई चिल्लाते विलखते रोने लगी I माँ ने भी ममता की लहर दौड़ा दी उमा को कसकर पकड़ लिया रोने लगी I 
             मनोहर ने पाँव पीछे खींचे एक झटके में दोनों को अलग कर दिया I 
            "ऐसा मत करो पापा मुझे घर ले चलो I मुझे ये लोग तंग करते हैं I शाम को शराब पीकर पीटते हैं I "
            "तेरा यही नसीब हैं I "
            "ऐसे मत कहो I क्यों न हम अपनी लाडो को घर ले चलें? I "
            "तू चुप हो जा ,अब तेरी ये लाडो ,लाडो नहीं रहीं I एक बच्ची की माँ हैं I कहाँ रखेगी I समाज को क्या जवाब देगी ?I "
             सावित्री भी सहम गई I पलकें बोझ से लद गईं I उमा गिड़गिड़ाने लगी फफकते रोने लगी I 
             मनोहर का भी दिल पिघल गया जेब से दो हजार रूपए निकाले उमा के हाथ में थमा दिए I ,उमा जब भी तुझे पैसों की जरूरत पड़े I घर खबर भिजवा देना हम मदद करेंगे किन्तु रहीं बची नाक का ख्याल रखना I "
             उमा ने पिताजी  की मदद से अपने पति की शराब की लत धीरे धीरे छुड़वा दी I छोटी सी दुकान भी खुलवा दी I दोनों की दिनचर्या धीरे धीरे बदल गई I 


यह रचना अशोक बाबू माहौर जी द्वारा लिखी गयी है . आपकी विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी है . आप लेखन की विभिन्न विधाओं में संलग्न हैं . संपर्क सूत्र -ग्राम - कदमन का पुरा, तहसील-अम्बाह ,जिला-मुरैना (म.प्र.)476111 ,  ईमेल-ashokbabu.mahour@gmail.com

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  1. जय मां हाटेशवरी...
    आपने लिखा...
    कुछ लोगों ने ही पढ़ा...
    हम चाहते हैं कि इसे सभी पढ़ें...

    इस लिये दिनांक 04/01/2016 को आप की इस रचना का लिंक होगा...
    चर्चा मंच[कुलदीप ठाकुर द्वारा प्रस्तुत चर्चा] पर...
    आप भी आयेगा....
    धन्यवाद...

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  2. बहुत बढ़िया आपका नया लेख अच्छा लगा, शुभकामनाये !

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