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स्त्री : एक परिभाषा
माँ, बहिन, अर्धांगिनी, बेटी और ना जाने ऐसे कितने ही रुप को धारण करने वाली वो मुरत कलयुग में स्त्री के नाम ‍से जानी जाती रही है । स्त्री प्राचीन काल से ही इस धरती पर कई सारे अवतार लेकर जन्म लेती रही है ।  ये स्त्री कभी एक माँ के रुप में अपने बच्चे को दुध पिलाती है तो कभी एक बहिन बनकर अपने भाई की कलाई पर रक्शासूत्र बाँधती है कभी एक पुरूष का आधा अंग बनकर उसकी अर्धांगिनी कहलाती है तो कभी एक बेटी बनकर अपने पिता का नाम रोशन करती है ।
नाम एक रुप अनेक :- 
आज के समाज में एक स्त्री की स्थिति पूर्ण रूप से उसकी सोच पर निर्भर करती है । एक तरफ तो ये ही स्त्री
दिल्ली के एक सुनसान इलाके में देर रात चंद दरिंदो की हवस का शिकार बन जाती है और वही दूसरी तरफ अमृतसर में पली बढ़ी किरन बेदी नाम की बेटी उन्हीं दरिंदो की खाल खिंचती नजर आती है । अगर वो अपने आप को एक अबला  नारी मान लें तो वह एक चारदीवारी के भीतर अपनी सासुमाँ के अत्याचार सहते सहते ही मर जाती है और अगर वही वह खुद को एक सबल नारी मानें तो जापान में भीषण भूकंप में अपनी जान देते हुए अपने बच्चे को एक नया जीवन दे जाती है । 
भारत में स्त्री की स्थिति 
भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से ही एक स्त्री की स्थिति बहुत ही दयनीय रही है । समय के साथ साथ स्त्री को प्रताड़ित करने के सिलसिलों में बढ़ोतरी होती गयी । पहले सती प्रथा फिर पर्दा प्रथा और फिर बाल विवाह और ऐसे बहुत से असामाजिक कृत्यों से भारतीय नारी का सामना समय समय पर होता रहा है । आज के इस प्रायोगिकता के दौर में एक ओर इन्हीं स्त्रियों को जहाँ मंदिरो में देवियों के रूप में पूजा जाता है वही दूसरी ओर उन्हीं देवी समान बेटियों को अस्पतालों में कोख से बाहर तक नहीं आने दिया जा रहा है । हमारे देश में महिला अत्याचार की बढ़ती घटनाओं ने भारतीय नारी की सुरक्षा पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।
पूरे भारतवर्ष में स्त्री को सबसे कमजोर कड़ी माना जाता है ।  आज एक माता पिता अपनी बेटी को पढ़ाई के लिए गांव से दूर भेजने से कतराते है क्योंकि उन्हें लगता है कि शहर में तो आए दिन लड़कियों के साथ बलात्कार यौन शोषण जैसे गंभीर अपराध होते रहते है ऐसे में उस बेटी के सारे सपने वही चूर चूर हो जाते है और फिर वो घर की चारदीवारी में कैद होकर रह जाती है । 
महाराष्ट्र महिला आयोग की एक सदस्य द्वारा कुछ समय पहले दिया गया बयान सोचने पर मजबूर कर देता है कि क्या वो सही मायने में महाराष्ट्र महिला आयोग की सदस्य बनने लायक भी है या नहीं ? उन्होंने कहा कि दुष्कर्म के लिए महिलाओं का पहनावा और बर्ताव जिम्मेदार है । इन मोहतर्मा से मैं एक सीधा सा सवाल करना
अश्विन गुप्ता
चाहूँगा कि उस 6 साल की बच्ची ने ऐसा कौनसा उकसाने वाला पहनावा पहना हुआ था जिससे उसी के मोहल्ले में रहने वाले एक निर्दयी दरिंदे ने उस बच्ची को अपनी हवस का शिकार बनाया ? इसी सदस्य ने दिल्ली में 16 दिसम्बर 2012 को घटे उस सामूहिक दुष्कर्म के संदर्भ में कहा कि उस लड़की को रात में फिल्म देखने जाने की क्या जरूरत थी ? 
इस घटना के पश्चात् कई लोगों ने सलाह देते हुए ये तो कह दिया कि माता पिता अपनी बेटियों को देर रात को कहीं नहीं भेजे उन्हें भड़कीले कपड़े नहीं पहनने दें और उन्हें हिदायत दे कि वो अपनी मर्यादा में रहे लेकिन किसी महानुभाव ने ये नहीं कहा कि जब कोई बेटा घर से निकलें तो माता पिता उसे ये समझाए कि बाहर जाकर किसी लड़की को ना छेड़े किसी का बलात्कार ना करें और अपनी मर्यादा में रहें । 
महिलाओं की इस दशा के लिए किसी व्यक्ति विशेष को जिम्मेदार ठहराना कतई मुमकिन नहीं है । स्त्रियों की इस स्थिति के लिए हर वो व्यक्ति जिम्मेदार है जो एक बेटे और एक बेटी में फर्क करता है ‌। मगर इंसान को ये बात समझना चाहिए कि स्त्री भगवान द्वारा बनाई गई बहुत ही खुबसूरत कृति है जो प्रेम, स्नेह, करूणा एवं मातृत्व की प्रतिमूर्ति है।
स्त्री नाम की इस पहेली को समझना आज के किसी पुरूष के बस की बात नहीं है । ये ही स्त्री एक माँ बनकर अपने ही बच्चे द्वारा एक रोटी के लिए तरसती है तो कभी एक बहिन बनकर अपने ही भाई द्वारा पिता की जायदाद से बेदखल कर दी जाती है कभी एक अर्धांगिनी बनकर अपने ही शराबी पति द्वारा मार खाती है और कभी एक बेटी बनकर कम उम्र में अपने पिता द्वारा ब्याही जाती है । इतना कष्ट सहने के पश्चात भी अपने मुख से एक आह तक नहीं निकालने वाली ही ये परिभाषा स्त्री कहलाती है ‌। 

यह रचना अश्विन गुप्ता जी द्वारा लिखी गयी है . आप  सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में कार्यरत हैं . आप  कवितायेँ, कहानियाँ और लेख आदि विधाओं पर अपनी लेखनी चलाते हैं . 

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