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जुगाड तकनीक के विविध आयाम
सच में हमारा देश विविधता में एकता का नायब नमूना है .एक तरफ तो हम मंगल तक की खैर खबर लेने के
लिए यान भेज रहे हैं तो दूसरी तरफ जुगाड़ की सवारी कर सस्ता रोमांचक और गतिशील परिवहन अपने गाँव-देहात तक में उपलबध कराकर देशी तकनीक का नायाब नमूना पेश कर रहे हैं . दरअसल जुगाड़ खालिस भारतीय तकनीक है .इसका बेहतरीन प्रयोग मेरी उम्र के लोगों ने अपने बचपन में बखूबी देखा और इंजॉय किया  है .उस ज़माने में  आज की तरह एक या दो बच्चे तो होते नहीं थे किसी भले घर में .चार बच्चों से कम वाला परिवार, परिवार ही नहीं माना जाता था .जबकि पति –पत्नी की मुलाकात बड़ी जुगाड़ लगाने के बाद होती थी .नई नवेली बहु तो बिचारी ददिया सास ,चचिया सास और ननद,जेठानी के पैरों की धूल पोंछने में साल गुजार देती थी . डायरेक्ट इंटेरेकस्न वाले पति पत्नी वे ही होते थे जिन्होंने पिछले जन्मों में मोती दान किये होते थे .उस पर भी अगर बहू ने पहले साल में ही खुशखबरी नहीं दी तो फिर उसकी सात पीढ़ियों में तकनीकी खराबी तलाशी जानी तय थी .पर उस जमाने की बहुओं में जुगाड़ की प्रतिभा कूट –कूट कर भरी होती थी और सौ में एक आध बदकिस्मत बहू होती थी जो साल भर के भीतर खुशखबरी नहीं सुना पाती  थी .उसमे भी उस बेचारी का कम उसके पतिदेव का ही दोष ज्यादा होता था .संयुक्त परिवार जुगाड़ तकनीक की सबसे बड़ी प्रयोगशाला थे .सीमित आमदनी में घर चलाना बिना जुगाड़ के संभव ही नहीं था .हर औसत भारतीय  परिवार की तरह ही हमारा परिवार भी जुगाड़ से चलता था.घर की ज़रूरतों को पूरी करने के लिए माँ-बाबूजी रोज ही कोई न कोई नयी जुगाड़ लगाते रहते थे ..तब बाबूजी की पेंट एक बालिश्त छोटी करानी की ज़रूरत ही नहीं पड़ती थी .जरा सी छोटी होते ही वह पेंट पहले बड़े भैया फिर मेरे द्वारा प्रयुक्त होकर अंततः निक्कर और पोंछे तक में रूपांतरित होती थी और इस रूपांतरण में जुगाड़ तकनीक का बखूबी इस्तेमाल होता था .यों तो अपनी सीमित तनख्वाह में बाबूजी ने तीन बहनों का शादी –ब्याह ,और हम चार भाई बहनों की पढाई लिखाई कर हमे जिस भी लायक बनाया है वह आज के दौर में अजूबे से कम नहीं पर मैं जानता हूँ बाबूजी जुगाड़ तकनीक के कुशल प्रयोक्ता थे और संयुक्त परिवार की ज़िम्मेदारियों  (जिन्हें निभाना  एवरेस्ट की चोटी पर चढ़ने से कम मुश्किल काम ना था )को  अगर वे सहज ही पूरा कर पाए तो इसमें उनके  जुगाड़ तकनीक में पारंगत होने को भी समुचित श्रेय है .बाबूजी यदि जुगाड़ विज्ञान के पियरे क्युरी थे तो माँ भी मैडम क्युरी से कम नहीं थी .बाबूजी साथ में गप्प लगा रहे प्यारे कंजर से लेकर रामभरोसे हलवाई तक और कहारिन चाची से लेकर मेहतरानी मौसी तक के लिए खाना परोसने का कब शाही फरमान जारी कर दें  इसका पता नहीं होता था. पर बुलाये या बिन बुलाये अतिथियों की संख्या कितनी भी हो मुझे याद नहीं पड़ता की माँ ने कभी  पिताजी के फरमानों का पालन ना किया हो .कभी खीझ –चीख चिल्लाहट उनके चेहरे या मुख से प्रकट हुयी हो ऐसा अवसर नहीं आया .खाने में छप्पन भोग भले ही ना होते हों पर सब माँ की तारीफ करके जाते थे .कहने का आशय है हमने जुगाड़ को घर परिवार में बाल्यकाल से आत्मसात किया है और घर में स्थापित प्रयुक्त ये जुगाड़ हमारी प्राचीन भारतीय परम्परा से सहज भाव से आया है .
जुगाड़ की यह तकनीक भारतीय परिवारों में  श्रुति परम्परा की तरह पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित हुयी है .इसका अपना अलिखित संविधान है .बल्कि यदि हम यह कहे हमारा तमाम ज्ञान और कौशल विकसित और संरक्षित ही जुगाड़ तकनीक से हुआ है तो अतिश्योक्ति ना होगी.जानकार बताते हैं कि जब बौद्ध धर्म की देश विदेश तक में जय जयकार हो रही थी . सम्राट अशोक से लेकर हर्षवर्धन तक ने  क बौद्ध धर्म को राजधर्म बनाकर हिन्दू धर्म को हाशिये पर पहुंचा दिया था और हिन्दू धर्म ग्रन्थ वेड –पुराण सब नष्ट हो चुके थे तो पुष्यमित्र शुंग के काल में बड़ी जुगाड़ लगाकर सारे ग्रन्थों का पुनर्लेखन हुआ और उसमे गणेश जी से लेकर व्यास जी तक जुगाड़ पूर्वक फिट किये गये .हमारी जीवन पद्धति में प्राचीन ज्ञान धर्म के रूप में इस तरह से जुगाड़ से फिट कर दिया गया है कि हम धार्मिक क्रिया कलाप समझकर योग –प्राणायाम  किया करते थे पर वह हर खासो –आम को निरोगी रखने का हमारे प्राचीन ऋषि –मुनियों का सुनियोजित जुगाड़ था .
बाबा रामदेव ने भले ही योग और प्राणायाम को धर्म से बाहर निकालकर उस जुगाड़ पर्दाफाश कर दिया हो पर इस बहाने अपनी दुकान चलाने का जुगाड़ तो कर ही लिया है .जुगाड़ तकनीक के प्रयोग में महिलाएं हमेशा से पुरुषों से इक्कीस रही हैं ,अब जबकि जुगाड़ के प्रयोग के उत्क्रष्ट नमूने देखने को कम ही मिलते हैं और भारतीय कुटीर उद्योगों की जिस तरह से चीनी यूज एंड थ्रो  तकनीक ने लगभग निगल ह लिया है वैसे ही महानगरीय संस्क्रती के ‘खाओ और उडाओ’ दर्शन ने जुगाड़ तकनीक का भी खासा नुक्सान किया है ऐसे माहौल में भी जुगाड़ का प्रयोग करते हुए सम्मान्य परिवारों की ही नहीं, अच्छा कमाती खाती महिलाएं भी करते हुए अभी भी मिल जाती हैं .नये माहौल में जुगाड़ ने प्रयोग क्षेत्र बदला है .पहले संतान नहीं होने पर नियोग से जुगाड़ किया जाता था ,तांत्रिक और ओझा नहीं सफल हो पाते थे तो मोक्ष और मुखाग्नि के लिए बहुत बार जुगाड़ से  पुत्र  प्राप्त कर लिया जाता था .पूरा महाभारत  जुगाड़ पर ही आधारित है .आज दुनिया भर के  निसंतान दम्पति किराये की कोख का जुगाड़ करने भारत आते हैं .अरब  के बूढ़े  शेख नाबालिग बीबी पाने के लिए भारत आते हैं ,मेडिकल टूरिज्म का धंधा भी आजकल जोर पकड रहा है ये भी कम पैसों में अच्छा इलाज पाने का जुगाड़ ही है .पिछले दिनों जब हमारे यहाँ किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिल रहा था तो जुगाड़ से सरकारें तक चलायी गयीं .वी पी सिंह से लेकर इंद्र कुमार गुजराल और चन्द्रशेखर तक की सरकार जुगाड़ से चली .फिर विद्वान् और अद्भुत वाकसंयमी  प्रधानमन्त्री स्व० नरसिम्हा राव जी ने अल्पमत  सरकार को  बहुमत की सरकार में बदलने के दौरान जुगाड़ तकनीक का जो बेहतरीन प्रयोग किया वह भारतीय राजनीति में जुगाड़ तकनीक के लोकप्रिय होने के क्रम में महत्वपूर्ण पड़ाव था .अटल बिहारी वाजपेयी जी को नरसिम्हा राव जी भले ही मजाक में ही सही गुरु जी कहते रहे हों पर जुगाड़ से सरकार चलाने  की कला तो अटल जी ने नरसिम्हा राव जी से ही सीखी थी .बाद में तो वे  जुगाड़ करने में ऐसे पारंगत हुए कि  जया ,माया और ममता जैसी तीन तीन कुंवारियों को साध कर स्वयम को जुगाड़ तकनीक का महारथी  साबित किया.बताने वाले बताते हैं कि अटल जी की तो जुगाड़ के क्षेत्र में इतनी ख्याति हो गयी थी कि जब अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन  ‘मोनिका लेविंस्की” मामले में उलझ गये तो उन्होंने अटल जी से इस झंझट से निकलने का तरीका पूछा. .सूत्र तो यहाँ तक बताते हैं कि क्लिंटन साहब ने कुछ दिन के लिए अटल जी से उनका जुगाड़ माँगा था पर अटल जी ने स्पष्ट शब्दों में यह कहते हुए –“राष्ट्रपति महोदय रार नहीं ठानूंगा,हार  तुरंत  मानूंगा,काल के कपाल पर साफ साफ़ लिखा है,जुगाड़ तुम्हे दे दिया तो दर दर खाक छानूँगा --,इसलिए क्षमा करें अपनी तो सरकार ही जुगाड़ से चल रही  है .” मुझे याद है कि बचपन में दूध फट जाने पर माँ जुगाड़ से उसका  पनीर बना लेती थी . .हाँ अगर रोज़गार ढूंढने की बात हो तो भाई कैसी भी छोटी बड़ी नौकरी हो बिना जुगाड़ के पाने की सोचना तो आज  भी मूर्खता है ..दरअसल जुगाड़ इन्नोवेशन है जोकि किसी भी तरह से मौलिक आविष्कार से कम नहीं है .बहुत से वैज्ञानिक शोध
अरविंद पथिक
शोधपत्रों तक सीमित रह जाते हैं पर जुगाड़ तो जीवन की प्रयोगशाला में विकसित होता है .इसलिए कभी बेकार नहीं जाता . पहले गाँव कस्बे का मैकेनिक तक एक्सीलेटर का तार टूट जाने पर साईकिल की ब्रेक के तार से मोटरसाइकिल चलाने का जुगाड़ कर देते थे.पर आज इस क्षेत्र में जुगाड़ का स्तर काफी गिरा है .पिछले कुछ समय से जब से चीन का विज्ञान और रोजमर्रा की चीजों को बनाने लके क्षेत्र में दखल हुआ है ,भारतीय जुगाड़ तकनीक को धक्का लगा है .जितने में भारतीय सामान जुगाड़ से तैयार होता था उतने में ‘यूज एंड थ्रो वाला चीनी ‘मॉल मिलने के कारण यांत्रिकी और अभियांत्रिकी के क्षेत्र में जुगाड़ जानने और करने वाले खत्म हो चले हैं पर खालिस भारतीय संस्कार लेकर पैदा हुए हम जैसे लोगों को ये बात हज़म करने में तब बड़ी दिक्कत होती है जब कार मकेनिक से लेकर मोटरसाइकिल के मकेनिक तक , कारपेंटर और पेंटर से लेकर प्लम्बर और इलेक्ट्रीशियन तक कहते हैं,-“बाबूजी पुर्जा ही बदलेगा .कोई जुगाड़ नहीं हो सकता .”,सच मानिये जब एक किसी भी इलेक्ट्रानिक या इलेक्ट्रिक आइटम का छोटा सा पुर्जा खराब होने पर पूरा आइटम ही बेकार घोषित कर दिया जाता है ,तब हमें अपने पुराने ज़माने के जुगाड़ कला पारंगत मैकेनिक और मिस्त्री बहुत याद आते हैं .
मैं तो दावे के साथ कहता हूँ कि भारतवर्ष को यदि अपने सीमित संसाधनो द्वारा विकास के पथ पर आगे बढ़ना है तो ‘यूज एंड थ्रो ‘ के चीनी दर्शन को त्याग कर जुगाड़ के ‘मितव्ययी ‘ पर टिकायु तरीकों की ओर ही आज नहीं तो कल वापस आना ही होगा .:क़ाला धन लाने: से लेकर ‘विकास’ लाने  तक ‘डिजिटल इण्डिया’से लेकर ‘क्लीन इण्डिया’ तक के वादों को चुनावी दौर से निकाल कर यथार्थ के धरातल पर  हमारे प्रधानमन्त्री जी के संकल्प को पूरा करना है तो उसे केवल जुगाड़ से पूरा किया जा सकता है .मुझे प्रधानमंत्री जी क्षमता और प्रतिभा पर पूरा भरोसा है.उनका तो  पूरा जीवन ही जुगाड़ कला के सफल प्रयोग का सर्वोत्तम नमूना है इसलिए सब मिलके बोलो जय जुगाड़ 

1फरवरी 1972  को शाहजहांपुर, उ०प्र० मे जन्मे अरविंद पथिक लंबे अरसे से देश के प्रतिष्ठित पत्र –पत्रिकाओं में व्यंग्य लेखन करते रहे हैं .कई दैनिक ,साप्ताहिक ,पाक्षिक एवं मासिक पत्रों में सामयिक विषयों पर व्यंग्य लेखन कर रहे अरविन्द पथिक  मूलतः कवि हैं । आपकी प्रकाशित कृतियों में 'मैं अंगार लिखता हूं' (कविता संग्रह),अक्षांश अनुभूतियों के(गीत संग्रह  तथा 'बिस्मिल चरित" महाकाव्य सम्मिलित है।दूरदर्शन समेत तमाम टीवी चैनलों पर अनेक बार काव्यपाठ कर चुके अरविंद पथिक ने क्रांतिकारियों के जीवन पर विशद अध्ययन एवं गवेषणात्मक लेखन किया है .  १८५७  के प्रथम स्वातंत्रय संग्राम के नायकों के जीवन पर रेडियो नाटक की एक पूरी श्रंखला आकाशवाणी की राष्ट्रीय प्रसारण सेवा के लिये लिखने वाले अरविंद पथिक को सरकारी -गैर सरकारी संस्थाओं के अनेक मान सम्मान एवं  पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं ।इनमें अखिल भारतीय भाषा भाषा साहित्य सम्मेलन का  प्रतिष्ठित "साहित्य श्री" अलंकरण तथा भाऊरावदेरस संस्थान का  "युवा साहित्यकार पुरस्कार"  शामिल हैं। हिंदी काव्यमंच पर ओज के  कवि के रूप में जाने जाने वाले अरविंद पथिक आकाशवाणी और दूरदर्शन सहित तमाम चैनलों पर निरंतर वार्ता , साक्षात्कार ,काव्यपाठ आदि के द्वारा प्रस्तुति देते रहे हैं.सोशल मीडिया को परिवर्तन का हथियार मानने वाले अरविंद पथिक पं.० रामप्रसाद बिस्मिल फाउंडेशन के अध्यक्ष के रूप में क्रांतिकारियों के जीवन मूल्यों को प्रचारित प्रसारित करने में सतत संलग्न हैं .संप्रति शिक्षा निदेशालय दिल्ली में कार्यरत रहते आप  हुये अनवरत साहित्य सृजन मे रत  हैं ,

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  1. बहुत सटीक व्यंग.

    एम.आर अयंगर.
    laxmirangam.blogspot.in
    8462021340

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  2. जिन्होंने भी मेरे व्यंग्य आलेख को पढ़ा उनका धन्यवाद ,आशुतोष जी का भी बहुत बहुत आभार--

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