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गली का साधू

उस गली में बहुत भीड़ थी जो कभी रात में डरावनी हुआ करती।  मैंने वहाँ जाकर देखा,कुछ लोग साधु रुपी
भास्कर.कॉम के सौजन्य 
मानव को कपडे की भाँति मारे जा रहे।  वह चिल्लाकर दया की भीख माँगे जा रहा लिपटा पैरों तले।
      "मुझे छोड़ दो अब कभी उल्टी-सीधी हरकत नहीं करूँगा।  "किन्तु लोग भूसे की तरह धुनें जा रहे।  मैंने उन्हें रोका- "क्यों मार  रहे हो ?विचारे निर्दोष प्राणी को  "
      "अरे भाई ये निर्दोष नहीं है  "
      "क्या मतलब ?ऐसा क्यों ?कोई प्रमाण है  "
      "है न ,शाम होते ही ये साधु इस गली में डरा धमकाकर लोगों से पैसे ऐंठता है।  आज हाथ लगा है  "
      मैंने साधु से पूछा ,उसने अपना सिर हिला दिया आँसू भी तेज धार के साथ बह उठे। मैं खामोश घूंरता रहा उसे कुछ पलों तक ,किन्तु लोगों से आजाद करा दिया।




यह रचना अशोक बाबू माहौर जी द्वारा लिखी गयी है . आपकी विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी है . आप लेखन की विभिन्न विधाओं में संलग्न हैं . संपर्क सूत्र -ग्राम - कदमन का पुरा, तहसील-अम्बाह ,जिला-मुरैना (म.प्र.)476111 ,  ईमेल-ashokbabu.mahour@gmail.com

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