1
Advertisement
 स्वार्थी  इंसान

कितना स्वार्थी, कितना लालची ?
सबसे बड़ा ये बुद्धिमान
दया धरम सब भूल गया,
भूल गया प्रभु का गुणगान
सारे जीवों का ये भक्षक,
काम, क्रोध पर है कुर्बान
मोनिका अरोरा
सब है एक से बढ़कर एक,
होली, मुहर्रम और रमजान
धन-दौलत के लोभ में आकर,
नारी का करता अपमान
भाई-भाई का शत्रु है,
कारण है एक धूल समान
नई  सभ्यताओं में आकर,
कन्याओं का हो रहा बलिदान
कठिन बहुत है व्याख्या करना,
लेखनी से मानव पहचान
अत्याचारी और भ्रष्टाचारी ,
ये है कलयुग का का इंसान


यह रचना मोनिका अरोरा जी द्वारा लिखी गयी है . आप बी. ए. हिन्दी (प्रतिष्ठा) तृतीय वर्ष ,श्याम लाल (सांध्य) महाविद्यालय की छात्रा हैं  . 

एक टिप्पणी भेजें

  1. Manjile unko multi h jinke sapno me jaan hoti h akele pankho se kuch nahi hota kyuki hoslo se bi udan hoti h

    उत्तर देंहटाएं

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top