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बूँदें

"पिताजी ने अपने अंतिम समय में इस कटोरी में बहुत सारी बूँदें दी थीं, और कहा था कि 'बेटा, यही एक
गुजारिश है कि इन्हें हमेशा अपने साथ रखना'|" एक साल से फ्रिज में रखी हुई प्लास्टिक की थैली से लिपटी उस कटोरी में जमी हुई बूंदों को अपनी पत्नी को दिखाते हुए उसने कहा|

"आपके पिताजी की निशानी है, उनके इस आशीर्वाद को हम हमेशा अपने साथ रखेंगे|"

उसकी आखें जैसे एक वर्ष पूर्व का दृश्य देख रहीं थी, और उसने कहा, "इस साल जब बारिश नहीं हुई, खेत सूख रहे थे,सारे कामगार शहरों में भाग गए, तो मैं अकेला इन्हीं 'बूंदों' के सहारे खेती करने लगा, थोड़ी मेहनत की, पानी का भी इंतज़ाम किया|"

एक क्षण रुक कर उसने अपनी बात आगे बढ़ाई, "फिर थोड़ी सी बारिश की 'बूँदें' भी बरसीं, उसके बाद फसल हुई जिन पर ओस की 'बूँदें' झिलमिला रहीं थीं, और इसी के कारण हम भोजन नाम के अमृत की 'बूंदों' का सेवन कर पा रहे हैं|"

"तो इस कटोरी में उनके चरणामृत की बूँदें हैं?"

"नहीं |"

"फिर क्या है?"

"पिताजी के पसीने के बूँदें..."


यह रचना चंद्रेश कुमार छतलानी जी द्वारा लिखी गयी है . आप जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय, उदयपुर में सहायक आचार्य (कंप्यूटर विज्ञान) के रूप में कार्यरत हैं . आपकी लघुकथा, पद्य, कविता, ग़ज़ल, गीत, कहानियाँ मधुमति (राजस्थान साहित्य अकादमी की मासिक पत्रिका), शब्द व्यंजना, रचनाकार, अमेजिंग यात्रा, निर्झर टाइम्स, राष्ट्रदूत, जागरूक टाइम्स, Royal Harbinger, दैनिक नवज्योति, एबेकार पत्रिका आदि में रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं . संपर्क सूत्र - पता - 3 प 46, प्रभात नगर, सेक्टर - 5, हिरण मगरी, उदयपुर (राजस्थान) ,फोन - 99285 44749 ई-मेल -chandresh.chhatlani@gmail.com
यू आर एल - http://chandreshkumar.wikifoundry.com

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