3
Advertisement
धर्म 

जब देखा स्वयं के शरीर को
तो देखा कई  सारे धागे
सारे  धागे धर्म के
हर धागा धर्म का
डॉ. हर्षवर्धन सिंह
मुझे खींचता
कहता  मुझसे
मैं तेरा मार्गदर्शक
कभी मैं इस ओर
तो कभी उस ओर खींचता
जब कई धागे खींचते
तो थोड़ाखून  निकलता
खून का गहरा लाल रंग देख
सारे धागे शांत हो जाते
घाव भी फिर भर जाता
पर फिर एक दिन  इन धागों में
( जिनमें हर धागा मेरा अपना था
और हर धागा मेरा मार्गदर्शक सा था )
अपनी प्रभुता को ले छिड़ी एक लड़ाई
धर्म धर्म से टकराया
धर्म ने धर्म की दुहाई दी
और मेरा रक्त रिसने लगा
रक्त विहीन हो
धर्म-अधर्म से परे होने की
प्रतीक्षा में मैं शुन्य हो गया


यह रचनाएं डॉ. हर्षवर्धन सिंह द्वारा लिखी गयी हैं I पूर्व में आपकी  रचनाएं आल इंडिया रेडियो, इंदौर स्टेशन, पर प्रसारित हो चुकी हैं I वर्तमान में आप  यूनिवर्सिटी ऑफ़ मेरीलैंड, बाल्टिमोर, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका से सम्बद्ध हूँ I वर्तमान पता: १ स्टोनीब्रूक लेन, रिडले पार्क, पेनसिलवेनिया, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका I ईमेल: harshvardhanou@gmail.com

एक टिप्पणी भेजें

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top