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                          कृष्णा मेनन उर्फ़ कथकली 

राजेश दा से परिचय को अभी बहुत दिन नहीं हुए थे पर शुभा को न जाने क्यों लगता था कि वह उन्हें बरसों-बरस
से जानती है. यूं भी तो हर परिचय इसी क्षण शुरू हुआ हो, क्या यह जरूरी है? हर रिश्ता हमारे जागते हुए ही बने, ये भी तो जरूरी नहीं. आत्माएं कभी सोती हैं भला!  राजेश दा से मिले हुए शायद चार से पांच दिन ही हुए थे शुभा को पर दोनों एक दूसरे से मिलते ही कैसे खिल उठे थे! याद है उसे, पहले तो केवल चार-पांच माह तक पत्र- व्यवहार मतलब मेल के जरिये ही बात होती रही थी. स्नेह में भीगे अपनत्व में भरे शब्दों में न जाने क्या जादू था कि एक दिन शुभा ने मेल में ही लिख डाला... “ राजेश जी, क्या आपको मैं भैया कह सकती हूँ? आपका स्नेह मुझे छू जाता है, भर-भर देता है भीतर तक. जैसे इस जन्म से नहीं शायद कुछ पुराना नाता है आपसे जो...” आगे शब्द नहीं मिले थे उसे और उधर से नेह भरी पाती आ गयी थी.... ‘ तुम जो चाहे कह सकती हो, वैसे मैं मिला नहीं तुमसे पर अहसास होता है कि भारत में कोई छोटी बहन है मेरी!”
खिलखिला उठी थी शुभा मेल पढ़कर. “क्या पता दादा कैसी शक्ल होगी आपकी! फोटो अपनी ही लगा रखी है न!” दादा ने बड़ी गम्भीरता से लिखा था... “ क्या कहूं शुभी तुम तो खुद जान सकती हो, कहती तो हो कि इस जन्म से रिश्ते नहीं बनते, फिर किस जन्म की तस्वीर को मानोगी सच!” तो देर तक सोचती रह गयी थी शुभा. शवासन करते समय योग शिक्षक इस बात पर काफी बल देते है कि मनुष्य एक समय के पश्चात अपनी ज्यानेंद्रियों और कर्मेन्द्रियों से मुक्त होकर अनंत की यात्रा कर सकता है. कौन जाने क्या है इस अनन्त में? कहाँ जाती होगी आत्मा? मुक्त होना इतना सरल होता है क्या? फिर जिस मुक्ति के लिए इतनी साधना करते है लोग, क्या सचमुच मुक्त हो पाते हैं उसके बाद भी?
सोचते सोचते शुभा डेस्क पर ही सर रखे सो गयी थी. अचानक झटके से उसकी नींद खुली तो पसीने से देह तरबतर थी. “ ओह एयर कंडीशनर ऑन करना भूल गयी थी शुभा. पानी पीकर एसी चलाया तभी कम्प्यूटर की स्क्रीन पर फ्लैश होते मैसेज को देखा उसने .. “ न्यू जर्सी में अगले हफ्ते सम्मेलन है और तुम आ रही हो शुभा! एंड नो आर्ग्यूमेंट. बस तुम आ रही हो.” भीग गयी शुभा इस अपनत्व में.  और पहुँच गई थी वो पागल लडकी नुमा स्त्री न्यू जर्सी. कॉन्फ्रेंस में भी भाग लेगी और मिलेगी राजेश दा से. यही वह मुलाक़ात थी जिसने शुभा के मन में छिपे अनेक प्रश्नों को जातक कर बाहर रख दिया और जैसे वह खुद से ही पहली बार मिली और जरिया बने राजेश दा!
एक समस्या और थी शुभा के साथ. किसी भी जगह पर जाने पर न जाने कैसे उसे लगता था कि यह जगह तो उसने कई बार देखी है. राजेश दा ने हँसते हुए कहा  “ शुभा बहुत घुम्मक्कड रही होगीए तुम्हारी आत्मा पिछले जन्म में!” मुस्कराई शुभा .. “ पता नहीं दादा. इस जन्म में तो घर और कॉलेज में ही साम्य नहीं बिठा पाती.”
घूमते-घुमाते और कॉन्फ्रेंस के जरिये कई मित्र बन गए थे. शाम ढलते ढलते प्रिंसटन विश्वविद्यालय घूमने का कार्यक्रम बना और आइसक्रीम के बिना तो यह यात्रा पूरी हो नहीं सकती थी तो सभी एक स्कूप और दो स्कूप के शोर में डूबे जैसे आइसक्रीम पर टूट ही पड़े. कल वापस भारत जाना था. शुभा के भीतर कुछ टूट रहा था. राजेश दा को और जानने की इच्छा से और अमेरिका जैसे देश में हिन्दी पढने पढ़ाने नए तौर तरीकों से जुड़ने की इच्छा लिए शुभा पूछ बैठी... “आपने टेम्पल विश्वविद्यालय में कब से पढ़ाना शुरू किया दा? कैसे और क्या पढ़ाते है आप लोग? और इतनी सुन्दर कविताएँ कैसे लिखते है आप?”
“ अरे बस बस ...” राजेश दा ने बहती शुभा पर रोक लगाई. “इतने सारे प्रश्न? एक साथ इतना कुछ जान लेने की इच्छा! रोको खुद को शुभा.
“न जाने किस शाख के टूटे पत्ते की तरह नियति मुझे यहाँ ले आई है दादा. मैंने तो सोचा भी नहीं था पर अब लगता है कि कुछ है जो मेरी ही प्रतीक्षा कर रहा था. यहाँ आकर पर वो कुछ मिला नहीं. कल तो मैं चली जाऊंगी पर कुछ है जो पूरा होने के लिए मेरी ही प्रतीक्षा कर रहा है, बताइए न दादा. बस कोई उत्सुकता मेरे अन्दर बैठी इंतजार कर रही है जैसे पूरा होने के लिए.” शुभा जैसे अधीर हो रही थी.
“....फिर ये भी है कि मेरे देश की शिक्षा पद्दति और इस देश की पद्दति अलग है तो इस बारे में भी कुछ बताइए. शिक्षा के क्षेत्र में भी आपके क्रांतिकारी विचारों ने बाँध लिया है मुझे” 
अच्छा, तुम किसी को भी सम्मोहित कर सकती हो शुभा, पर खैर तुम मेरी यात्रा को समझना चाहती हो तो चलो ये बताओ कि ये यूनिवर्सिटी कैसी लग रही है तुम्हें?
हम लोग उस समय प्रिन्सटन विश्वविद्यालय के प्रांगण में घूम रहे थे. रात के ११ बजे का समय था. इस विश्वविद्यालय की दीवारों में हर बैच के नाम का एक पत्थर गढ़ा था जिस पर उस बैच का वर्ष लिखा था, मानों अपने होने का सबूत दे रहा हो.
“...दादा मुझे लगता है कि कभी-न-कभी मैं यहाँ से गुजर चुकी हूँ. जैसे लगभग सौ साल पहले का ये नक्काशीदार पत्थर मैंने अपने ही हाथों से लगाया था. मैं अब तक महसूस कर सकती हूँ हथौड़े की वो चोट और उसकी आवाज!” 
“शुभा! तुम तो बहुत जल्दी अतीत की यात्रा पर निकल जाती हो. अच्छा बाहर आओ तो तुम्हें किसी से मिलवाता हूँ...”
शुभा हैरान थी. “रात को ११ बजे! जब चारों ओर कोई नहीं है तो दादा किससे मिलवाएंगे मुझे?”
मुझे हंसी आ गई. दादा, मैं आपके अनुभव सुनना चाहती थी और आप मुझे डराना चाहते है! रात के ११ बजे आप यहाँ किससे मिलाना चाहते है?
ये मौसम बसंत का था,ठंडी-ठंडी हवा के थपेड़े अब अच्छे लगना शुरू हो गए थे पर वसंत जैसा वसंत अभी यहाँ नहीं आया था. फूलों और पत्तों से लदे वृक्ष भारत में शुभी को वसंत का सीधा साक्षात कराते थे पर यहाँ पेड़ों पर कोंपले भी नहीं फूटी थी. इतिहास हमें सम्मोहित करता है पर कहीं दराद भी पैदा करता है हमारे भीतर. हम चीजों को देखने लगते है अपने ही नज़र के चश्में से!
“कहाँ चली गई तुम!...भीतर चलें?” मेरे भीतर प्रश्न था पर मैं बिना कुछ कहे उनके पीछे चल पड़ी. दरवाजे की चरमराहट ने मेरे भीतर एक कौंध पैदा की पर मैं किसी तरह बच्चों की सी उछलती उत्सुकता को दबाए उस सदियों पुराने दरवाजे के भीतर दाखिल हो गई. सामने की दीवार पर एक तस्वीर पूरे उजास के साथ उस अँधेरे में भी चमक रही थी. 
“ ये कृष्णा मेनन है...मैंने सबसे पहले इसी प्रिन्सटन यूनिवर्सिटी में पढाना शुरू किया था, इनकी जगह पर!” राजेश दा ने गहरी नजर से उस तस्वीर को देखते हुए कहा.
मैं अब कुछ पूछना चाहती थी, कुछ सुनना चाहती थी. राजेश दा तो टेम्पल विश्वविद्यालय में पढ़ाते है. फिर यहाँ? पर इस तस्वीर ने सब खोखला कर दिया था. कुछ था इस तस्वीर की आँखों में,जो बहुत खोया हुआ,कहीं दूर टिमटिमाते तारे सा, पनीला, जल तरंग सा बहता हुआ मेरे भीतर समोता जा रहा था. कुछ था जिसमें बह रहा था शुभा का अस्तित्व. घुल रही थी उसकी आत्मा !
“..क्या ये नृत्य करती थी राजेश दा!” उन आँखों में कुछ ऐसी सम्मोहन शक्ति थी जिससे बचने की कोशिश में शुभा और भी धंसती जा रही थी. राजेश दा जैसे इस प्रश्न के लिए तैयार नहीं थे. “हाँ..पर तुम कैसे जानती हो? सुना है इनके बारे में? जानती हो कुछ?
“नहीं बस नाम सुनकर और तस्वीर को देखकर जो अनुभूति का पहला छिटका सा टुकडा था,उसने जैसे मुझसे खुद कहा कि...” छोडिये मेरी बात! राजेश दा ये कौन हैं, इनका इतिहास जानना चाहती हूँ मैं.”
राजेश दा हंस पड़े! “तुम अतीत से इतना प्रेम करती हो कि हर चेहरे में एक इतिहास लिपटा हुआ नजर आने
हर्ष बाला शर्मा
लगता है तुम्हें. मान लो इनका कोई इतिहास न हो तो? और हो भी तो मुझे पता ही होगा ये भी तो जरूरी नहीं!”
अब राजेश दा को देखने की बारी शुभा की थी. “और किस से मिलवाया आपने कृष्णा मेनन की तस्वीर को? मुझे ही चुना है आपने. या नियति ने चुनवाया है आपसे? आप खोलना चाहते हैं इतिहास राजेश दा! मैं जानती हूँ वो इतिहास जो दफ़न है आपके भीतर. बोलिए न दा, हो सकता है ये इतिहास मुझे भी कोई दिशा दिखा सके, मेरे भविष्य के लिए. 
राजेश दा बाहर की और चल पड़े.  शुभा भी चुपचाप उनके क़दमों का पीछा कर रही थी. एक छोटी सी तलैया के किनारे वे ठिठके और बैठने का इशारा किया. ढेरों उमड़ती जिज्ञासाओं को लिए शुभा वही बैठ गई. राजेश दा कहीं अतीत के खंडहरों में भटक रहे थे. 
“...कृष्णा मेनन उसका असली नाम नहीं था. क्या था, ये भी मुझे नही पता! पुर्तगाली पिता और यूनानी माँ की संतान न जाने कब और कैसे भारतीय नृत्य के संपर्क में आई, यह मैं भी ठीक से नहीं से बता सकता. पर इतना जरूर है कि....उन दिनों एक भारतीय नृत्य समूह उन दिनों वाशिंगटन आया हुआ था और कृष्णा भी अपनी माँ के साथ एक सम्मेलन में हिस्सा लेने आई हुई थी. 15 बरस की कृष्णा ने एक कत्थक नृत्यांगना को देखा और बस उसकी जिन्दगी की राह उसे मिल गई.”
“...ता थई थई तत...आ तई तई थत...” कृष्णा मेरे सामने नृत्य कर रही थी. “थपक थपक पग थपक थपक...” तलैया का पानी कृष्णा के आकार में बदल रहा था. दोनों ही मौन थे. अचानक दा बोल उठे. “कृष्णा ने भारत जाने की इच्छा माँ- पिता के सामने रखी! यूनानी माँ का आकर्षण उसने विरासत में पाया था और उसकी जिद भी! मना करने पर वह घर से सारे सम्बन्ध तोड़ कर चली गई.
“ ता धिन धिन धा, धा धिन धिन धा...” तलैया का पानी फिर आकार ले रहा था. नक्शा बन रहा था, बदल रहा था. शुभा देख रही थी पानी के भीतर की वो बेचैनी जो तलैया से बाहर आने के लिए बढ़ती ही जा रही थी.
राजेश दा की कहानी अपने समताल के साथ आगे बढ़ रही थी. “...कृष्णा के माता-पिता नाराज थे पर कृष्णा को शायद वह सब कुछ मिल गया था जो वह इतने साल से ढूंढ रही थी. वो दिल्ली पहुँची पर शायद दिल्ली उसकी भूख और तलब को बढ़ा ही सकती थी, पूरा करने में सक्षम नहीं थी. किसी तरह, न जाने कैसे वह जयपुर के पास एक गाँव में पहुँच गई. पर इस यात्रा ने उसे थकाया नहीं. शायद वह कुछ ढूंढ रही थी जो उसे वहां मिल सकता था...”
“..हाँ वही तो, जयपुर ठीक है. वहां उसे कोई गुरु जी जरूर मिले होंगे. सीख पाई कृष्णा कथकली?” शुभा की आवाज किसी गहरे कुँए से आ रही थी. 
“...शुभा? तुम ठीक हो न?” राजेश दा उसकी आवाज के गहरेपन से चिंतित हो उठे.
“..हाँ दादा! मैं ठीक हूँ...” शुभा की नजर तलैया के थपक- थपक की कहानी पर टिकी थी. “ हाँ तो जयपुर में कृष्णा को मिले उसके गुरु?”
राजेश दा उसकी इस उत्सुकता पर मुस्करा उठे... “ इतना आसान कहाँ होता है वो पाना जिसकी चाह में हम बांवले हो उठते है डगर-डगर! खैर, एक गुरूजी मिले कृष्णा को जिन्होंने कथक की कहानी को उसके भावों से मिला ही दिया.
“ये गुरूजी कितने गुणवान थे, पता नहीं. पर जैसे गुणवान शिष्य पाकर गुरु की प्रतिभा निखर उठती है वैसे ही कृष्णा को पाकर गुरु जी की प्रतिभा भी निखर उठी. उनकी कत्थक की विलम्बित, द्रुत, लय और ताल जैसे कृष्णा के पैरों की ता, थई, थई तत.. में मूर्त हो उठी.
“...कृष्णा जब नाचती तब सूर के भजन को आकार दे देती. कृष्ण की कृष्णा बनकर उद्धव को चुनौती देती कृष्णा अपने नृत्य में ..... “ऊधौ मन न भए दस बीस”. राजेश दा कत्थक की कथा में डूबे थे.
शुभा तलैया के पानी में उठती-गिरती तरंग को देख रही थी. अन्धेरा गहरा घना था. चाँद की चांदनी अपने गहरे शबाब के साथ पानी में छितरा रही थी और शुभा को लगा कि बस अब कृष्णा करिश्न्मय हो गई. गुरु जी के स्नेहिल व्यवहार में कृष्णा ने कृष्ण हे देखें होंगे तभी तो कृष्णा कत्थक नहीं सीख रही थी. वो खुद ही हो गई थी कथकली जिसमें सूर-तुलसी के पद आकार ले रहे थे. और यहाँ उसी आकार में ढल रहा था जलाशय भी!
राजेश दा ने शुभा को चलने का इशारा किया “जानती हो शुभा! कृष्णा पूरे १० बरस कथकली बनकर नाचती रही. सारी नृत्य मुद्राएं उसने समर्पित कर दी उसने गुरूजी को....गुरु की गुरुता में मग्न कृष्णा अपना नाम भी समर्पित कर चुकी थी उनको! कि तभी...”
शुभा कथा के इस मोड़ तक आते-आते चांदनी के सम्मोहन में डूब चुकी थी. चांदनी छन-छन कर बह रही थी और कृष्णा तथा शुभा को एक करती जा रही थी.
राजेश दा गाडी तक पहुँच चुके थे. प्रिन्सटन के सम्मोहन से अब सम्बन्ध टूटने ही जा रहा था. उसके तिलिस्म में तैरती शुभा बोल उठी... “ चलते हैं दादा, पर बात पूरी हुई नहीं अभी!”
“बस और कुछ नहीं है बताने को! १० साल बाद कृष्णा को पता चला कि गुरूजी की पत्नी और बच्चे भी है. गाँव से उनकी पत्नी जब बच्चों के साथ लदी-फदी पहुंची तो ...” आगे मैं भी नहीं जानता शुभा कि क्या हुआ? बस इतना ही कि कृष्णा लौट आई और यहाँ पढ़ाने लगी प्रिन्सटन में! मैं उससे कुछ बरस पहले मिला था फिर उसने यह नौकरी भी छोड़ दी और न जाने कहाँ चली गई. तुम देखती उसे शुभा, जैसे सारी साधना मूर्त हो जाती थी उसके चेहरे के लकीरों पर! जैसे कुछ कहना चाहती थी वो, पर मैं नहीं समझ सका! शायद तुम ही समझ पाओ कुछ उसके तस्वीर से बात करते हुए!”
शुभा की उत्सुक आँखे कुछ और ढूंढ रही थी. कहीं खोई हुई थी शुभा! कुछ अनबूझी कहानी सा! कत्थक की सारी मुद्राएँ भी “ता थेई थेई तत” करते हुए भी कहानी को पूरा कर पाती है क्या? कथकली करती कृष्णा अभी भी तो नृत्य करती चल रही है उसके साथ! हाँ उसे पहुंचानी होगी ये कहानी हर एक के मन तक! कृष्णा अब साए की तरह बैठ गई है उसकी आत्मा में सेंध लगाकर या कई जन्मों से ही साथ थी वो भीतर बैठी हुई. बस अब जान पाई है शुभा! उसे भी तो नृत्य बहुत छोटा है बचपन से ही! कत्थक ने उसे भी तो खींचा था ...
राजेश दा गाडी स्टार्ट कर रहे थी. शुभा चुपचाप गाडी में बैठ गई. प्रिन्सटन पीछे छूट रहा था. कृष्णा अपने कथकली के साथ पीछे छूटती जा रही थी. सोच रही थी शुभा ... “ कृष्णा हर युग में होती है क्या? क्या बीता होगा राधा पर जब सुना होगा उसने कि द्वारिकाधीश अब अपनी पटरानियों के साथ रहते है और रुक्मिणी के साथ रहते हुए छूट गई राधारानी! कौन सुनेगा राधा के मन की वो पुकार! लौट कर आए कभी कृष्ण? क्या रुक्मिणी के साथ रहते हुए राधा को भूल गए! और राधारानी की कहानी? राधा भी तो रासलीला में खो जाती थी और समर्पित कर देती थी खुद को! अरे यह क्या, शीशे में तो एक छवि साथ-साथ चलती दिख रही है! ये चेहरा तो हूबहू उसी का है जो शीशे में झांकते हुए उसे ही एक टक देख रही है! इस युग की राधा! कौन? कृष्णा मेनन...या कथकली....या........! 


यह रचना डॉ. हर्ष बाला शर्मा जी द्वारा लिखी गयी है . आप अध्यापन कार्य में रत है . आपकी प्रकाशित रचनाएं - सूचना युग में हिंदी शिक्षण , मीडिया और बाज़ार की भाषा , समकालीन हिंदी नाटकों में व्यवस्था विरोध आदि है . 

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  1. हर्ष बाला जी,
    नमस्कार...मेरा नाम दिनेश प्रसाद है और मैं एऩआईडी, अहमदाबाद में राजभाषा अधिकारी के रूप में कार्यरत हूं...दरअसल किसी दूसरे देश में आयोजित हिन्दी सम्मेलनों में भाग लेने की बड़ी इच्छा है...इसी सिलसिले में गूगल पर खोज कर रहा था...आईएचसी द्वारा पिछले वर्ष में आयोजित हिन्दी सम्मेलन के कुछ वीडियो देखने का मौका मिला...Technology aur Hindi par आप अपना प्रेजेन्टेशन दे रही थी...बहुत ही उपयोगी और लाभदायक व्याख्यान लगा...आपके इस व्याख्यान ने आपको और जानने की इच्छा बढ़ा दी...और फिर कृष्णामेनन उर्फ कथकली पढ़ने का मौका मिला...कहानी की शैली काफी रोचक है...इस कहानी में इतिहास की भी जानकारी है...अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग ने कहानी की खूबसूरती को बढ़ाया ही है. बधाई एवं धन्यवाद
    डॉ. दिनेश प्रसाद, राजभाषा अधिकारी, राष्ट्रीय डिज़ाइन संस्थान. मोबाइल 8980420747, ईमेल - dinesh_p@nid.edu

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