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कला दीर्घाएं

एक नन्हा बीज जब अंकुरित होता है तो उसमें उभर आने की छटपटाहट होती है। वही उसे दीर्घायु प्रदान करती है, पल्लवित व पुष्पित भी करती है। टालीगंज, कलकत्ता की बिरला एकेडमी एवं आकार प्रकार आदि अन्य दीर्घाऐं, कोलाबा की जहौगीर आर्ट गैलरी निजी है उसी तरह, रफी मार्ग (नई दिल्ली) की आल इण्डिया आर्ट एवं क्राफ्ट सोसाइटी’ प्राईवेट लिमिटेड कम्पनी है जो 1928 से काम कर रही है। यह उभरते कलाकारों/शिल्पकारों के प्रोत्साहन के बारे में है। गैलरी इन्चार्ज श्री मुकेश ने मुझे बताया कि इसमें 400 रू की फीस देकर सालाना प्रदर्शनी में प्रतियोगी आधार पर चुनी हुई कलाकृतियां ही गैलरी में प्रदर्शित की जाती हैं, जो जज चुने जाते हैं वे अपने क्षेत्र के नामवर होते हैं। दूसरी पद्वति गैलरी को निजीतौर पर कुछ दिन किराए पर लेकर 4-5 कलाकार अपनी कलाकृतियां प्रदर्शित कर सकते हैं। और तब खर्च प्रति कलाकार  करीब 5 हजार रू0 आता है। 
यह संस्था सरकारी धन/दान अनुदान नहीं लेती। पहले एक हाल में यह ब्रिटिश लाइबे्ररी को किराए पर उठाए थी, जो अब वहां नहीं हैं। हम जब गए तब गैलरी में दर्शक दो-चार ही थे बाहर भी कोई आकर्षक बोर्ड भी नहीं था। यह गुमनाम जैसा नजर आया। लगा कि इसमें आंतरिक सुधार की जरूरत है। कलाकृति जो एक बार किसी साफ-सफाई आदि की वजह से जहा , टंगी वहीं लगाई जाए जैसे कि हावड़ा स्टेशन वेंटिग कार्नर पर कलाकार जतिन दास की कलाकृति अभी तक लगाई नहीं गई है। 

1. मंत्रालयों के रिसेप्सन अथना रिक्त दीवारों पर एवं वह कोरीडौर जहां मंत्री व सचिव बैठते हैं, वहां उभरते कलाकारों की कलाकृतियां प्रदर्शित हो।
2. रेलवे स्टेशनों के एन्ट्री व एग्जिट गेट के ऊपर। 
3. राष्ट्रीय बाल भवन में गैलरी ज्यादा सक्रिय करके अदलते-बदलते कलाकारों/शिल्पकारों को मौका दिया जाए। 
4. पर्यटन-स्थलों पर भी यह प्रयोग किए जाएॅ। 
5. राज्य सरकार भी कला और शिल्प संर्वधन के लिए आवश्यक उपाय करे।



यह रचना क्षेत्रपाल शर्मा जीद्वारा लिखी गयी है। आप एक कवि व अनुवादक के रूप में प्रसिद्ध है। आपकी रचनाएँ विभिन्न समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है। आकाशवाणी कोलकातामद्रास तथा पुणे से भी आपके  आलेख प्रसारित हो चुके है .

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