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" कहाँ गए वे भूत "
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एक ज़माना था जब बच्चों को बदमाशियों से रोकने के लिए भूत का नाम लेकर डराया जाता था.  बात-बात पर भूत की धमकी, प्रेत का धौंस.... मसलन, पीछे वाले तालाब पे मत जाना वहाँ भूत रहते हैं ... बच्चों को पकड़ के ले जाते हैं, सामनेवाले कुएँ में मत झाँकना उसमें प्रेत रहता है, दरगाह वाले आम के बगीचे की तरफ़ भूल के भी मत जाना वहाँ जिन्न रहा करते हैं, जलेबी और इमली के पेड़ पे गलती से भी मत चढ़ना उसपे पिशाच रहते हैं ... वगैरह वगैरह . बच्चे हीं क्यूँ बड़ी लड़कियों के लिए भी सख्त हिदायत थी - मेहँदी की झाड़ के पास कभी अकेली मत जाना, नीम के पेड़ के नीचे से मत गुज़रना, बाल खोल के कभी छत पे मत जाना, रात में आईना मत देखना भूत का साया चढ़ जायेगा l कुंवारी लड़कियों को खिड़की या झरोखे में खड़े होकर हाथ हिलाना मना था क्यूँकि काकी के अनुसार इसे भूत अपने लिए सकारात्मक इशारा मानकर फटाफट चले आते हैं l इस तरह की ना जाने कितनी सारी हिदायतें l भूत के डर के मारे जीना मुहाल हुआ करता था l हर जगह, हर रास्ते में, हर बात में निरंतर एक डर बना रहता था कि कहीं भूत के हत्थे ना चढ़ जाएँ ! 
पर आजकल के बच्चों को देखिये तो वे बड़े इत्मीनान के साथ ड्रेकुला, वैम्पायर और चुड़ैलों के फ़िल्म और सीरियल्स आराम से देखते हुए नज़र आएँगे l ये बच्चे हाथ में रिमोट लेकर पूरी तन्मयता के साथ भूतों की दुनियाँ का लुत्फ़ उठाते हैं पर क्या मज़ाल कि कभी कोई भूत इनके सामने भी फटकने की ज़ुर्रत करे ! 
कंचन पाठक
सवाल उठता है कि जहाँ पहले हर गली में, हर रास्ते पर, हर पेड़ पर, हर तालाब में, हर कुएँ में भूतों का साम्राज्य हुआ करता था वे सारे के सारे भूत एकबारगी आख़िर कहाँ चले गए ? सोच सोचकर दिमाग का दही हो गया पर उलझन वैसी की वैसी बनी रही l जब और अधिक नहीं रहा गया तब आश्रम वाले बाबाजी से प्रश्न कर लिया l 
बाबाजी ने धैर्य से मेरे उलझनों को सुना और उन्होंने जो बताया वो आप भी सुनिए - " उस ज़माने में वे जो सारे भूत, प्रेत, आत्माएँ सब भटक रहे थे अब वे सब के सब जन्म ले चुके हैं, मनुष्य का शरीर प्राप्त कर चुके हैं इसलिए अब भूत नहीं दिखते l क्यूँकि उन सारे भूतों ने इन्सान का शरीर धारण कर लिया है इसलिए अब आतंक भूत नहीं इन्सान मचाता है ! ये खून के प्यासे दहशतगर्द आतंकी, चोर-उचक्के, तस्कर-लुटेरे, कुकर्मी-बलात्कारी, हत्यारे और नेताओं के वेश में जो खून चूसनेवाले लोग हैं वे सब कौन हैं ? ये सारे हृदयहीन मनुष्य जिनके अन्दर केवल खून की पिपासा है, ये सब के सब भूत, प्रेत, पिशाच, जिन्न, राक्षस हीं तो हैं !! अगर मनुष्य होते तो इनके अन्दर मनुष्यता ना होती ? " यह सुनकर मेरा दिमाग खुल गया l भूतों के विलुप्त होने का रहस्य पूरी तरह से समझ में आ गया . 




यह रचना कंचन पाठक जी द्वारा लिखी गयी है।  आप कवयित्री व लेखिका के रूप में प्रसिद्ध हैं।  आपकी प्रकाशित कृतियाँ :- इक कली थी (काव्य-संग्रह), सिर्फ़ तुम (संयुक्त काव्य-संग्रह), काव्यशाला (संयुक्त काव्य-संग्रह), सिर्फ़ तुम (कहानी संग्रह), तीन अन्य प्रकाशनाधीन हैं।  आपकी कादम्बिनी, अट्टहास, गर्भनाल पत्रिका, राजभाषा भारती (गृहमंत्रालय की पत्रिका), समाज कल्याण (महिला एवं बाल विकास मंत्रालय), रुपायन (अमर उजाला की पत्रिका) समेत देश के विभिन्न राज्यों के प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रचनाएँ प्रकाशित । इन्टरनेट पर विभिन्न वेब पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित ।  हमारा मेट्रो (दिल्ली) एवं कृषिगोल्डलाइन में हर सप्ताह कॉलम प्रकाशित रहते हैं।  संपर्क सूत्र -  मेल आईडी - pathakkanchan239@gmail.com

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  1. बहुत सही लिखा है कंचन जी.बच्चे अब काफी समझदार हो गए हैं,बुद्धू बक्सा जो सामने रहता है.

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