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अतीत का आँगन
ब्रह्म मुहूर्त में जगना मेरे लिए सदैव ही कठिन रहा है, विशेषकर दिल्ली आने के पश्चात्। किन्तु आज स्वतः नीन्द खुली तो आभास हुआ कि नींद पूरी हो चुकी है, समय देखा, 5 बजने वाले थे। बिस्तर छोड़ते ही सहस्त्रों विचारों ने धावा बोल दिया। उनके विचार मन में बार-बार आते हैं जिनकी कोई स्मृति निकट हो। मानव के आयु के अनुसार मन में विचारों का आवागमन होता रहता है। सदैव किसी अच्छे सहपाठी या अन्य से मित्रता का प्रयोजन बनता रहता है, अथवा अन्य कोई प्रयोजन......। यदि मित्रता है तो उसे किस सीमा तक पहूँचाया जा सकता है, चरम तक कैसे पहुँचा जाए? इत्यादि।
                मैं यह तो नहीं सोच रहा था किन्तु मानवीय प्रवृत्ति के कारण स्वयं को इन्हीं विचारों के आस-पास विचरते पाया। कमरे की बत्ती जलाकर दरवाजा बन्द करके छत पर आ गया, तो पुनः विचारों के सागर में गोते
दिपेश कुमार
लगाने लगा। जैसे- प्रातः भ्रमण के जाना चाहिए या नहीं? कहाँ जाना चाहिए? यहाँ मैं अजनबी हूँ, जाना उचित होगा या नहीं? आदि-आदि। घर तो सर्दियों का है किन्तु ग्रीष्म ने अपना पूर्ण आधिपत्य जमा रखा है। परन्तु ऐसा प्रतीत होता है आज अपने घर से उन्हें खदेड़ने में वह सफल हुआ है। ठंढ़ की अनुभूति हो रही थी, मैं अधिक देर नहीं ठहर सका, कमरे में आ गया। शॉल ढूंढने लगा किन्तु विफल रहा, पुनः ढूंढा लेकिन नहीं मिला। अचानक याद आया कि एक अन्य स्थान पर भी कुछ वस्त्र रखा है, वहां अवश्य होगा। गर्म शॉल से कुछ राहत मिली, इसी क्रम में मैं सोच रहा रहा था कि कुछ लिखूँ। ज्यों ही डायरी हाथ में उठाया और दो पृष्ठ पलटा तो पाया कि पुनः बाल्यावस्था की अत्यंत अभावपूर्ण किन्तु मनोरम परिवेश में उपस्थित हो चूका हूँ। बचपन की समस्त दुःखद व सुखद स्मृतियों पर आक्रमण करके उन्हें ध्वस्त कर रही थी। जीवन की सहस्त्रों बाधाओं को लांघकर, अन्धविश्वासी समाज के रीति-रिवाजों को तोड़कर, धर्म, जाति, समाज, रिश्ते-नाते, जिम्मेदारी इत्यादि की स्मृतियों को धूमिल कर बाल्यावस्था के स्वच्छ, सुन्दर, दोषरहित आँगन में जा बैठा। हालाँकि उस आँगन में पुष्प का एक भी पौधा नहीं था, था तो केवल काँटों का। उस समय ये काँटे ही मेरे मन को सुख और दुःख की अनुभूति कराते थे, लेकिन आज वे काँटे अत्यधिक प्रिय हो गए हैं। समाज के दिए अनगिनत घावों को सहना अत्यधिक कठिन लग रहा है। ये समाज क्या है?? कैसा है?? क्यों है?? यह मुझसे कहता है, उसने ऐसा किया तुम भी करो, फलां ऐसा बना तुम भी बनो, वह इधर जा रहा है तुम भी जाओ, ये नीची जाति के है इसके यहाँ मत खाओ। लोग और समाज सलाह के बजाए आज्ञा क्यों देता है? क्या मैं उसका गुलाम हूँ? शरीर के अंग-अंग को छलनी कर दिया, समाज के नुकीली  बातों ने। अब आभास होता है कि बचपन का वो काँटा कितना सुखद था। फटे-पुराने ही सही, तन ढकने को दो वस्त्र तो थे, रूखा-सूखा ही सही पेट तो भर जाता था, भला नहीं कर पाया तो बुराई भी तो नहीं की। स्थितियाँ आज भी कुछ मिलती-जुलती हैं, रोज भूखा नहीं सोना पड़ता है, रूखा-सूखा मिल जाता है, हर सुविधा नहीं पर उचित मात्रा में वायु मिल ही जाता है जीने के लिए। कुछ तथ्य मिट गए तो कुछ जुड़ गए। आज जीवन के ऐसे पड़ाव के निकट आ गया हूँ जहां व्यक्ति वो सब कुछ देने को तैयार है जिसे समय रहते वापस किया जा सके। अर्थात् वो अपने मन में वापस लेने की ईच्छा रखते है। शरीर की सुगमता नहीं वरन् आत्मा की सुगमता चाहिए। किन्तु स्नेह, ममत्व, आदि जैसे अनमोल रत्न कोई क्यों दे????



यह रचना दीपेश कुमार जी द्वारा लिखी गयी है . आप बी. ए. हिंदी (प्रतिष्ठा) द्वितीय वर्ष के छात्र है . आप साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखनी चलाते हैं व स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य में रत हैं . संपर्क सूत्र - मो. 7532970980 , ई-मेल :- dipeshlsc@gmail.com

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