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पढ़ने दो मुझे

बच्चे बड़े हो गये
शायद बड़ों से भी,
पूछते नहीं,
बताते नहीं
माँ-बाप को
अपना दुःख-सुख

पैसे मांगते हैं
जैसे सहना हल्कू से
बर्बाद करते हैं समय
घंटों बैठकर
कॉलेज में,
उड़ाते हैं पैसे
पाते हैं खुशियाँ
लेकिन घर जाते ही
कहते है सबसे
पढ़ने दो मुझे
पढ़ना है मुझे

पढ़ लिया,
इम्तिहान दिया,
छुट्टी हुई,
पैसे दो
घुमने जाना है

तरसते रह गए माँ-बाप
बातें होगी
दो-चार
इन छुट्टियों में
किन्तु,
छुट्टियाँ बीत गयी
वह नहीं आया

वह आ गया
दिपेश कुमार
बेटा,छुट्टियाँ कैसी रही?
थका हूँ,
आराम करने दो,
कल कॉलेज जाना है
कॉलेज से आते ही
पूछा किसी ने
वही सवाल
तो कहता है सबसे
पढ़ने दो मुझे
पढ़ना है मुझे




यह रचना दीपेश कुमार जी द्वारा लिखी गयी है . आप बी. ए. हिंदी (प्रतिष्ठा) द्वितीय वर्ष के छात्र है . आप साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखनी चलाते हैं व स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य में रत हैं . 

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