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हम परेशान करते रहे और वो काम करते रहे !

सूखो में कर्जों में लटके वो,
मानसूनों में डूबे अटके वो,
वो सफेद कुर्ते ही नेक बेचारे,
बाँर्डर पे लडे मरे डटके वो,
संसद को मच्छी दुकान करते रहे !
अजी हम परेशान करते रहे
और वो काम करते रहे !!

एक गुनहगार के फन्दे पर मज़हब को लटकाया,
अजी हमने ही तो टाईगर दाऊद भगाया,
दिल्ली विज्ञापन भोपाल मे व्यापम
यूपी हर रोज कत्लों का मातम,
थाईलैंड मे छुट्टी और किसान का नारा,
कैसी बदचलनी सरेआम करते रहे !
अजी हम परेशान करते रहे
और वो काम करते रहे !!

56 इंच की दहाड़ कहाँ अब जारी है,
पुष्पेन्द्र कुमार खण्डेलवाल
आज एक शेर पर कुछ गीदड़ भारी है,
खबरों की मण्डी आवाजों के सौदे,
बाबाओं के यहाँ जनता की मति मारी है,
अब मंहगाई भी कोई मुद्दा है क्या
वो गद्दी पा गये और हम लोकपाल करते रहे!
अजी हम परेशान करते रहे
और वो काम करते रहे !!


यह रचना पुष्पेन्द्र कुमार खण्डेलवाल जी द्वारा लिखी गयी है . आप वर्तमान में स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य में रत है .  संपर्क सूत्र - पता : - ११८/४४, अग्रवाल फार्म, मानसरोवर, जयपुर, मो. : - ९००१८८९९११

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  1. आपकी ये रचना बड़ी अच्छी लगी आखिर की दो पंक्तिया दिल को छु जाती है.

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