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सतीश चन्द्र श्रीवास्तव की गज़लें 

1.

पांव तो है पर चल नहीं पाता ।
सम्बल बहुत है पर संभल नहीं पाता ॥
अभिमन्यु हूँ, जीवन के चक्रव्यूह में,
घुस तो जाता हूँ, निकल नहीं पाता ।
रिश्तों के चन्द खिलौनें देकर,
बहलाते तो हो पर बहल नहीं पाता ।
आसान बहुत है ज़िन्दगी के मसले,
हल मुश्किल से भी निकल नहीं पाता ।
 
 2.

उड़ा के परिन्दों को आसमां में देखते है ।
चलो अपना हौसला आज़मा के देखते है ॥
वो कहता है मेरी बात मान कर देखो,
ये सच है तो उसकी बात मान कर देखते है ।
ख्वाबॊं के टूटने से ग़र ज़िन्दगी खत्म ही होती,
तो चलो, इसको भी आज़मा के देखते है ।
ज़िन्दगी ग़र सब्र का इम्तहान लेती है,
चलो ये इम्तहान भी दे के देखते है ।
सतीशचन्द्र श्रीवास्तव

3.

सच कहते हो मैं चहेरे दो-दो रखता हूँ ।
हँसी एक में दूजे में जख्मॊं को रखता हूँ ॥
मेरी वफ़ाओ को वो पहचानते कैसे,
दिल एक में दूजे में रस्मों को रखता हूँ।
देवता थे पत्थर के वो, कुछ कहते कैसे,
इन्सां हूँ मैं इसलिए हर जगह सच को रखता हू।
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यह रचना सतीशचन्द्र श्रीवास्तव जी , द्वारा लिखी गयी है . आप रेल प्रबंधक कार्यालय , इलाहाबाद में कार्यरत है . आपकी विभिन्न राष्ट्रीय पत्र -पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी है . सतीश चन्द्र जी , स्वंतंत्र रूप से लेखन कार्य में रत है

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