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श्रद्धा और प्यार 
आज से बहुत-बहुत वर्ष पहले आदिम-युग की बात है कि एक दिन घने जंगलों के बीच बहती एक नदी के किनारे, वृक्ष की छाया में,दूब पर बैठी श्रद्धा फूलों की माला गूँथ रही थी। बसन्ती बयार से कभी-कभी उसका आँचल उड़ने लगता था। माला गूँथ लेने के बाद वह धीरे से उठी और गुनगुनाती हुई लहरों की ओर बढ़ने ही वाली थी कि उसके सम्मुख एक आखेटी खड़ा हो गया। श्रद्धा ने उसे देखा और सहम कर आँखें नीची कर लीं।
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 आखेटी ने पूछा- ” सुन्दरि ! तुम कौन हो ?’’
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 ‘‘ मैं..... मैं.....और तुम कौन हो आगन्तुक ?"
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मैं आखेटी हूँ। मेरा नाम प्यार है.......!"
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 ”प्यार !"
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 ”हाँ, तुम कौन हो ?"
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”मैं श्रद्धा हूँ। लेकिन तुम आखेट क्यों खेलते हो ? मैं इससे घृणा करती हूँ।"
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”श्रद्धे ! तुम्हारी घृणा का कारण पूछ सकता हूँ ?"
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”इसलिये कि तुम निरीह और भोली आत्माओं के साथ खिलवाड़ करते हो। तुम उन पर अधिकार करने के लोभ से मनमानी करते हो। लेकिन ......... तुम कितने सरल हो प्यार ! क्या इसे छोड़ नहीं सकते ?’’
महेंद्र भटनागर
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‘‘श्रद्धे ! मेरे जीवन में एक बहुत बड़ा अभाव है। शायद तुम उसे पूरा कर सको। मैं स्वयं नहीं जानता कि मैं कब क्या करने लगता हूँ। लेकिन, तुम्हें वचन देता हूँ  कि  तुम्हारे साथ  रह कर  पवित्र भावनाओं को....।’’
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”मुझे भरोसा है प्यार ! पता नहीं, ऐसा लगता है जैसे कि कोई खोयी हुई चीज़ मिल गयी है। तुमको पाकर  मैं धन्य  हो गयी हूँ। मेरे  फूलों में सुगन्ध आ गयी है। लो यह तुम्हें ...!’’
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और श्रद्धा ने प्यार के चरणों में माला रख दी !
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उस दिन से श्रद्धा और प्यार एक दूसरे से जुड़ गये।  
बिना श्रद्धा -भाव के प्यार वासनाओं का दास है, वहशी है और बिना प्यार के श्रद्धा अपूर्ण है, अकेली है, व्यर्थ-जीवन का बोझ है !
श्रद्धा ने प्यार को पवित्र किया है और प्यार ने उस पवित्रता से श्रद्धा का शृंगार !


यह रचना महेंद्र भटनागर जी द्वारा लिखी गयी है . आप स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी-कविता के बहुचर्चित यशस्वी हस्ताक्षर हैं।महेंद्रभटनागर-साहित्य के छह खंड 'महेंद्रभटनागर-समग्र' अभिधान से प्रकाशित हो चुके हैं।  'महेंद्रभटनागर की कविता-गंगा' के तीन खंडों में उनकी अठारह काव्य-कृतियाँ समाविष्ट हैं। महेंद्रभटनागर की कविताओं के अंग्रेज़ी में ग्यारह संग्रह उपलब्ध हैं। फ्रेंच में एक-सौ-आठ कविताओं का संकलन प्रकाशित हो चुका है। तमिल में दो, तेलुगु में एक, कन्नड़ में एक, मराठी में एक कविता-संग्रह छपे हैं। बाँगला, मणिपुरी, ओड़िया, उर्दू, आदि भाषाओं के काव्य-संकलन प्रकाशनाधीन हैं। 

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  1. श्रदा और प्‍यार कहानी पढी। आनंद तो आया ही और साथ में चिन्‍तन करनें की और अग्रसर कर गया। आज जो प्‍यार का रूप दिखाई पड़ता है वह श्रदाविहिन प्‍यार, शायद उसे प्‍यार कहना भी अतिश्‍याक्ति ही होगी। श्रदा और विश्‍वास के बिना प्‍यार तो सम्‍भव ही नहीं हो सकता है। जो दिखाई पड़ता है शायद उसी को हम प्‍यार कहनें लगे है।

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  2. बहुत ही कम शब्दों में सहजता से जीवन में खुश रहने का सार है ये।

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  3. रचना एक फ़न्तासी है। FANTASY [कल्पना]

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