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हे ! जगत के पालन हार 
हे ! जगत के पालन हार
सुन्दर सृष्टि रचने वाले
बना दिया सब कुछ तुमने
तुमको लाख प्रणाम .
          ये जगत क्यों अँधा बनाया ?
          ज्ञान का दीप नहीं जलाकर
          रोते हुए क्यों रंक बनाये ?
          हँसते हुए क्यों अधर्म वाले ?
हम ऋषियों की हो संतान
ऐसा प्रभु दीजे वरदान
तुमको लाख प्रणाम
प्रभु तुमको लाख प्रणाम ..
          हर प्राणी में ज्ञान दया हो
          न समझे कोई पीर पराया
          दीन दुखियों की करें हम सेवा
          न कोई स्वार्थ न कोई दूजा .
सबको मिले सदबुद्धि ज्ञान
ऐसा प्रभु दीजे वरदान
तुमको लाख प्रणाम
प्रभु तुमको लाख प्रणाम ..
          सद्भावना हो हर मन में
अशोक बाबू माहौर
          झुके कभी न धर्म आगे
          ममता टूटे न माता की
          चाहे कष्ट पड़े हजारों बार .
दर्शन पाएं,हो तेरा ध्यान
ऐसा प्रभु दीजे वरदान
तुमको लाख प्रणाम
प्रभु तुमको लाख प्रणाम ..



यह रचना अशोक बाबू माहौर जी द्वारा लिखी गयी है . आपकी विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी है . आप लेखन की विभिन्न विधाओं में संलग्न हैं . संपर्क सूत्र -ग्राम - कदमन का पुरा, तहसील-अम्बाह ,जिला-मुरैना (म.प्र.)476111 , ईमेल-ashokbabu.mahour@gmail.com

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  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 10 सितम्बर 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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