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   (  लातिनी अमेरिकी कहानी  )
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                                 # गोल खंडहर
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                                                      --- मूल लेखक : जोर्गे लुई बोर्ग़ेस
                                                      --- अनुवाद : सुशांत सुप्रिय
उस रात किसी ने उसे नाव से सरककर तट पर आते हुए नहीं देखा । किसी ने भी बाँस की उस नाव को उस पवित्र कीचड़ में धँसकर डूब जाते हुए नहीं देखा । लेकिन कुछ ही दिनों के भीतर वहाँ रहने वाले हर व्यक्ति को यह पता चल गया कि बहुत कम बोलने वाला वह व्यक्ति दक्षिण दिशा से आया था , और यह भी कि वह नदी के ऊपरी छोर पर स्थित असंख्य गाँवों में से एक का रहने वाला था , जहाँ की स्थानीय बोली यूनानी भाषा से दूषित नहीं हुई थी और जहाँ कुष्ठ-रोग विरल था ।
           
जोर्गे लुई बोर्ग़ेस
असल में पके हुए बालों वाले उस आदमी ने पहले कीचड़ को चूमा था । फिर लड़खड़ाता हुआ वह उस ऊँचे किनारे पर चढ़ा था ( हालाँकि वहाँ उगी कँटीली झाड़ियाँ उसकी त्वचा को भेद रही थीं , किंतु वह उन्हें परे नहीं हटा रहा था , शायद वह अपनी त्वचा के छिलने के दर्द को महसूस भी नहीं कर पा रहा था ) । लहुलुहान और अशक्त वह किसी तरह खुद को घसीटते हुए उस गोल अहाते तक ले गया , जहाँ किसी घोड़े या बाघ की पत्थर की प्रतिमा स्थापित थी जो पहले कभी आग के रंग की थी , पर अब राख के रंग की रह गयी थी । वह गोल दायरा एक मंदिर था जिसे कोई प्राचीन अग्निकांड तबाह कर चुका था । अब मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों से भरा एक जंगल उस मंदिर की बची-खुची पवित्रता को नष्ट कर रहा था , जहाँ किसी देवता की एक भग्न मूर्ति भी उपेक्षित खड़ी थी । वह विदेशी उस मूर्ति के आधार के पास ही औंधा लेट गया ।
             दूसरे दिन जब उसकी नींद खुली तो सूरज आकाश में बहुत ऊपर चढ़ आया था । बिना हैरान हुए उसने यह महसूस किया कि उसके घाव अब ठीक हो रहे थे । उसने अपनी निस्तेज आँखें बंद कर लीं और वह सो गया । यह नींद उसे थकान की वजह से नहीं आई थी बल्कि वह इसलिए सोया , क्योंकि वह अभी और आराम करना चाहता था । वह जानता था कि उसके अपराजेय मक़सद की पूर्ति के लिए यह मंदिर ही उपयुक्त स्थल था । वह यह भी जानता था कि बहती हुई नदी के किनारे थोड़ी ही दूरी पर एक और मांगलिक मंदिर के भग्नावशेष थे , जिसे पेड़ों के अंतहीन झुरमुट भी नहीं छिपा पाए थे । इस मंदिर में मौजूद देवताओं की मूर्तियों को भी जला कर नष्ट कर दिया गया था किंतु वह जानता था कि फ़िलहाल उसे सो कर अपने तन-मन की स्फूर्ति को बहाल करना था ।
              बीच रात में वह किसी पक्षी का उदास गीत सुनकर जाग गया । नंगे पैरों के निशान , कुछ अंजीर और गूलर तथा पानी से भरा एक जग अपने पास देखकर वह जान गया कि इलाक़े के लोगों ने उसे यहाँ सोते हुए देख लिया था । उसकी कृपा की आकांक्षा की वजह से या उसके जादू से डरकर उन्होंने उसकी नींद को बाधित नहीं किया था । हालाँकि यह जानकर उसे भय की कँपकँपी महसूस हुई और उसने खंडहर हो चुकी दीवार में ही एक बड़ा आला ढूँढ़ लिया , जहाँ छिप कर उसने खुद को पत्तियों और लताओं से ढँक लिया ।
              जो मक़सद उसे यहाँ लाया था , उसे प्राप्त करना असम्भव तो नहीं था , किंतु वह अलौकिक ज़रूर था । दरअसल वह आदमी के बारे में सपना देखना चाहता था । वह उस आदमी का सपना एक-एक ब्योरे की सम्पूर्णता में देखना चाहता था , और फिर वह उस आदमी का प्रवेश वास्तविकता में कराना चाहता था । इस जादुई परियोजना ने उसकी पूरी आत्मा को निचोड़कर उसे नि:शक्त बना दिया था । ऐसी स्थिति में यदि कोई उससे उसका नाम पूछता या उसके पिछले जीवन के बारे में पूछता तो शायद वह इसका भी जवाब न दे पाता । यह निर्जन और ध्वस्त मंदिर उसे अपने लिए सही जगह लगी , क्योंकि यहाँ ज्ञात दुनिया का हस्तक्षेप नहीं के बराबर था । इलाक़े के किसानों का आस-पास होना भी उसके लिए फ़ायदेमंद था , क्योंकि वे उसकी थोड़ी-बहुत ज़रूरतों को पूरा कर सकते थे । भेंट के तौर पर दिए गए उनके चावल और फल पेट भरने में उसकी सहायता करते । अब वह अपने एकमात्र उद्देश्य सोकर सपने देखने के लिए खुद को समर्पित कर सकता था ।
             शुरू में उसके सपने बेहद अव्यवस्थित थे । बाद में उसे द्वन्द्वात्मक क़िस्म के सपने आने लगे । अजनबी ने सपना देखा कि वह एक गोल रंगभूमि के केन्द्र में था जो कि इस जले हुए मंदिर जैसा ही था । शांत छात्र सीढ़ियों पर ऐसे बैठे थे गोया वे छात्र न हो कर आकाश में लटके बादल हों । अंतिम छात्रों के चेहरे कई सदियाँ दूर अंतरिक्ष में लटके हुए थे , हालाँकि वे चेहरे बिलकुल स्पष्ट और सही थे । वह अजनबी उन छात्रों को शरीर की रचना , ब्रह्मांडिकी और जादू आदि विषयों पर भाषण दे रहा था । सभी चेहरे उत्सुकता से सुन रहे थे और समझदारी के साथ प्रश्नों के जवाब दे रहे थे , जैसे उन्हें इस परीक्षा के महत्त्व की जानकारी हो -- उनमें से एक का इस आभासी रूप-रंग से उद्धार होना था और उसे वास्तविक विश्व का हिस्सा बनाया जाना था । वह अजनबी अपने जगे होने और सपने देखने -- दोनो ही अवस्थाओं में अपने आभासी छात्रों के उत्तर सुनता । वह ढोंगियों को फ़ौरन पकड़ लेता , जबकि कुछ छात्रों की बुद्धिमत्ता को तेज़ी से विकसित होते हुए देखता । वह एक ऐसी आत्मा की खोज कर रहा था जो इस ब्रह्मांड में भागीदारी के क़ाबिल साबित हो ।
                नौ या दस रातों के सपनों के बाद वह अजनबी कुछ कड़वाहट के साथ यह समझ पाया कि वह ऐसे आभासी छात्रों से कोई उम्मीद नहीं रख सकता था जो निष्क्रियता से उसकी शर्त स्वीकार कर लेते थे , लेकिन ऐसे छात्रों से उम्मीद की जा सकती थी जो कभी-कभार उसकी बातों का तार्किक खंडन करते थे । उसकी शिक्षा को ज्यों-की-त्यों स्वीकार कर लेने वाले कल्पित छात्र उसके स्नेह के क़ाबिल तो थे , किंतु वे कभी भी वास्तविक व्यक्ति के स्तर तक नहीं पहुँच सकते थे , जबकि उसका खंडन करने वाले छात्रों में ऐसी सम्भावना की तलाश की जा सकती थी । एक दिन दोपहर के समय ( अब वह दोपहर में भी नींद और सपनों के आगोश में चला जाता था , अब वह सुबह के समय कुछ घंटों के लिए ही जागता था ) उसने उस अवास्तविक महाविद्यालय के छात्रों को सदा के लिए वहाँ से रवाना कर दिया और अपने पास केवल एक छात्र को रखा ।
                  वह पीली त्वचा वाला एक शांत लड़का था जिसके तीखे नैन-नक़्श किसी स्वप्नद्रष्टा-से लगते थे , हालाँकि वह लड़का थोड़ा हठी और ज़िद्दी भी था । अपने सहपाठियों के यूँ अचानक हटा दिये जाने से वह घबराया नहीं बल्कि कुछ विशेष कक्षाओं के बाद उस लड़के की प्रगति ने उसके शिक्षक को भी हैरान कर दिया । फिर भी एक दिन अनर्थ हो गया । वह अजनबी अपनी नींद से यूँ जागा , जैसे वह किसी चिपचिपे रेगिस्तान से निकला हो । उसने दोपहर की तुच्छ रोशनी को देखा और उसे इस बात का भ्रम हो गया कि दरअसल वह सुबह का समय है । तब जा कर वह समझा कि वास्तव में उसने कोई सपना नहीं देखा था । पूरा दिन और पूरी रात एक असहनीय, प्रांजल , अनिद्रा-रोग उसे पीड़ित किए रहा । खुद को थका देने के लिए वह जंगल में इधर-उधर भटका , किंतु इसके बावजूद उसके हिस्से में नींद के कुछ सतही पल ही आए । कच्ची नींद के उन पलों में उसे जो चितकबरी परछाइयाँ दिखीं , वे सब बेकार थीं । उसने उस काल्पनिक महाविद्यालय के छात्रों को फिर से जुटाने का प्रयास भी किया , किंतु अभी उसने उनके सामने अपना भाषण शुरू ही किया था कि सारे चेहरे विकृत हो कर ग़ायब हो गए । इस अनिद्रारोग की लगभग चिरस्थायी अवस्था में उसकी प्राचीन आँखें क्रोध के आँसुओं से जलने लगती थीं ।
                वह जानता था कि हालाँकि वह हर प्रकार की दुनियावी और अलौकिक उलझनों और पहेलियों को सुलझा सकता था , किंतु सपने जिन असम्बद्ध और चकरा देने वाले तत्वों से बने थे , उन्हें अपने मन के मुताबिक़ ढाल पाना किसी भी इंसान के लिए बेहद कठिन काम था । यह काम भुरभुरी रेत से रस्सी बुनने या बिना आकार वाली हवा को सिक्के में ढालने से भी ज़्यादा दुष्कर था । वह समझ सकता था कि इस काम में शुरू में विफल होना अवश्यंभावी था । उसने क़सम खाई कि वह उस विशाल दृष्टिभ्रम को भूल जाएगा जिसने उसे शुरू में भटका दिया था । अब उसने एक दूसरा तरीका आज़माना चाहा । लेकिन उसे अमल में लाने से पहले उसने खुद को एक माह का समय दिया ताकि वह अपनी उस ऊर्जा को दोबारा पा सके जिसे उसके पागलपन भरे सपनों ने सोख लिया था । उसने सपने देखने के बारे में पहले से सोच-विचार करना छोड़ दिया । ऐसा करने से वह दोबारा अपनी नींद को पा सका ।
अब वह दिन में काफ़ी समय तक सोया रहता । इस दौरान उसे कभी-कभार सपने भी आए , लेकिन उसने उन पर कोई ध्यान नहीं दिया । अपने कार्य को दोबारा शुरू करने के लिए उसने पूर्णिमा की प्रतीक्षा की । उस दिन दोपहर के समय उसने नदी के पवित्र जल में स्नान करके उसने खुद को शुद्ध किया , सभी आसमानी देवताओं की पूजा की , सर्वशक्तिमान ईश्वर की वंदना की और फिर सोने चला गया । सोते ही उसने एक धड़कते हुए हृदय का सपना देखा ।
                सपने में वह हृदय सक्रिय , गरम , गुप्त और बंद मुट्ठी जितना बड़ा था । वह गहरे लाल रंग का था और इंसान की देह में छाती के पास धड़क रहा था । उस इंसानी देह का न कोई चेहरा था , न कोई लिंग । चौदह प्रांजल रातों तक उसने बेहद स्नेह से यह सपना देखा । उसने उस हृदय को छुआ नहीं बल्कि वह केवल उसे ध्यान से देखता रहा , शायद आँखों से ही उसे दुरुस्त भी करता रहा । हर रात उसकी दृष्टि पहले से ज़्यादा साफ़ होती गई । उसने उस हृदय को अलग-अलग दूरी से और विभिन्न कोणों से देखा और जिया । चौदहवीं रात में उसने पहले हृदय की मुख्य धमनी को उँगली से छुआ , फिर उसने पूरे हृदय को भीतर और बाहर से महसूस किया । इस जाँच से वह संतुष्ट हुआ ।
              जान-बूझकर एक रात उसने कोई सपना नहीं देखा । अगली रात सपने में उसने हृदय को लिया और फिर एक ग्रह के नाम का आह्वान करके उसने प्रार्थना की । फिर वह मानव शरीर के किसी अन्य मुख्य अंग का सपना देखने में व्यस्त हो गया ।
एक वर्ष के भीतर ही वह कंकाल और पलकों तक पहुँच गया था । असंख्य बाल का सपना देखना सबसे कठिन काम था । जल्दी ही उसने एक सम्पूर्ण मनुष्य का सपना देखा । वह एक युवक था , किंतु वह युवक न हिल-डुल सकता था , न बोल सकता था , न ही अपनी आँखें खोल सकता था । हर रात वह अजनबी उस युवक को सोया हुआ देखता था । गूढ़ज्ञानवादी सृष्टिशास्त्र के मुताबिक़ विश्वकर्मा लाल रंग के आदम को ठीक-ठाक करके उसे खड़ा होने लायक बनाते हैं । उस अजनबी जादूगर के कई रातों की कोशिश से बना यह सपनों का आदम भी उस मिट्टी के आदम की तरह ही अनाड़ी , कच्चा और प्रारंभिक प्रयास जैसा था ।
              एक दिन दोपहर के समय उस अजनबी ने अपनी कृति को लगभग नष्ट ही कर दिया था , हालाँकि बाद में उसे अपनी इस हरकत पर पछतावा हुआ । ( यदि वह उसे नष्ट कर देता तो यह उसके लिए बेहतर ही होता ) । जब उसने पृथ्वी और नदी के देवताओं की प्रार्थना समाप्त कर ली तो वह उस मूर्ति के सामने साष्टांग दण्डवत की मुद्रा में लेट गया । वह मूर्ति सम्भवत: किसी बाघ की थी या शायद किसी घोड़े की थी । अजनबी ने उस प्रतिमा से मदद की याचना की । उसी शाम उसने उस मूर्ति का सपना देखा । सपने में वह एक जीवित , धड़कता हुआ जीव था । वह कोई ऐरा-गारा बाघ या घोड़ा नहीं था बल्कि इन दोनो ही प्रचंड जीवों का मिश्रण था । इस जीव में साँड़ , गुलाब और तूफ़ान के अंश भी समाहित थे । बहुत सारे जीवों व तत्वों से बने इस देवता ने उस अजनबी को बताया कि पृथ्वी पर उसे अग्नि के नाम से जाना जाता था , और यह भी कि इस वृत्ताकार भग्न मंदिर में लोगों ने यज्ञ किया था तथा पशुबलि का चढ़ावा चढ़ाया था । इस देवता ने अजनबी से यह भी कहा कि वह उसके सपनों से उपजे सोये हुए छायाभासी मानव में जादुई शक्ति से प्राण डाल देगा ,
जिससे उस देवता या जादूगर को छोड़ कर बाक़ी सभी उस छायाभासी मानव को हाड़-माँस से बना जीवित इंसान मान लेंगे । देवता ने उस अजनबी जादूगर को आदेश दिया कि वह अपने छायाभासी जीव के लिए धार्मिक अनुष्ठान करे और फिर उसे थोड़ी दूर पर स्थित नदी के किनारे ही बने दूसरे भग्न मंदिर में ले जाए ताकि वहाँ ईश्वरीय चमत्कार की वजह से छायाभासी मानव पूर्णता को प्राप्त कर सके । उस अजनबी के सपने में जैसे वह छायाभासी मानव जाग गया था ।
               अजनबी जादूगर ने आदेश का पालन किया । उसने लगभग दो वर्ष की अवधि अपने सपनों के मनुष्य को ब्रह्मांड के रहस्य और अग्नि-देवता की पूजा-पद्धति के बारे में समझाने में लगा दी । हालाँकि भीतर-ही-भीतर उसे उस आदमी से जुदाई का ग़म सताने लगा था । आख़िर उसने अपने सपनों में उसका निर्माण किया था । वह उसे बेटे जैसा मानने लगा था । उसे ज्ञान देने के बहाने हर रोज़ वह अपने सपनों को और ज़्यादा समय देने लगा । सपने में ही उसने उस छायाभासी मानव के दाएँ कंधे को दोबारा बनाया , क्योंकि उसे उसमें कुछ कमी नज़र आ रही थी । कई बार उसे ऐसा लगता कि यह सब पहले भी हो चुका है और इस बात से उसे तकलीफ़ होती ... आम तौर पर उसके दिन अच्छे बीत रहे थे । जब भी वह अपनी आँखें बंद करता , वह सोचता -- अब मैं बेटे के साथ रहूँगा । कभी-कभी वह यह भी सोचता -- जिस बेटे का मैंने निर्माण किया है , वह मेरी प्रतीक्षा कर रहा है । यदि मैं उसके पास नहीं गया तो उसका अस्तित्व ही मिट जाएगा ।
               धीरे-धीरे उसने अपने छायाभासी बेटे को वास्तविकता का आदी बना दिया । एक बार उसने उसे दूर स्थित पहाड़ की चोटी पर झंडा लगाने का आदेश दिया । अगले दिन दूरबीन से देखने पर झंडा वहाँ लहराता हुआ दिखा । उसने अपने उस छायाभासी बेटे पर और भी कई प्रयोग किए । हर प्रयोग पिछले से ज़्यादा साहसिक था । कुछ कड़वाहट के साथ वह समझ गया कि उसका बेटा अब वास्तविक अर्थ में पैदा होने के लिए न केवल तैयार था बल्कि आतुर था । उस रात उसने अपने छायाभासी बेटे को पहली बार चूमा और उसे नदी के किनारे के घने जंगल और दलदल के पास वाले गोल खंडहर में स्थित दूसरे भग्न मंदिर में भेज दिया । लेकिन वह नहीं चाहता था कि उसका बेटा खुद को छायाभासी समझे । वह चाहता था कि उसका बेटा खुद को अन्य लोगों की तरह ही वास्तविक माने । इसलिए उसने ऐसा करने से पहले अपने बेटे के ज़हन से उसके प्रशिक्षु होने के समय की पुरानी सारी यादें हटा दीं ।
               अब वह अजनबी जादूगर अपने भीतर जीत और सुकून महसूस कर रहा था , लेकिन थकान उस पर हावी थी । सुबह और शाम के झुटपुटे के समय वह पत्थर की मूर्ति के सामने साष्टांग प्रणाम की मुद्रा में प्रार्थना करता । उसे यह उम्मीद थी कि उसका छायाभासी बेटा भी उस समय नदी किनारे स्थित किसी भग्न मंदिर में मौजूद मूर्ति के सामने ऐसे ही आराधना कर रहा होगा । अब रात में वह पहले की तरह सपने नहीं देखता था । यदि कभी-कभार उसे सपने आते भी थे तो वे आम लोगों के साधारण सपनों जैसे होते थे । अब उसे ब्रह्मांड के सभी स्वर और रूप फीके लगते थे । उसका सारा ध्यान अपने अनुपस्थित बेटे की ओर होता , जिसे उसकी आत्मा सींच रही थी । उसके जीवन का उद्देश्य पूरा हो गया । अब उसके भीतर आह्लाद भरा था ।
             
सुशांत सुप्रिय
उस अजनबी जादूगर की कथा के कुछ वाचकों के अनुसार कुछ वर्षों बाद एक रात दो नाविकों ने उसे गहरी नींद से जगाया । अँधेरे में वह उनके चेहरे नहीं देख सका , लेकिन उन्होंने उसे उत्तर दिशा में स्थित एक मंदिर में रहने वाले जादूगर के बारे में बताया , जो बिना खुद जले धधकती आग में चल सकता था । अजनबी जादूगर को अचानक ईश्वर का कथन याद आ गया । उसे याद आया कि विश्व में मौजूद सभी जीव-जंतुओं और तत्वों में केवल आग को ही उसके बेटे के छायाभासी होने के रहस्य के बारे में पता था । इस स्मृति ने उसे पहले तो संतोष दिया , किंतु बाद में उसे पीड़ित कर दिया । उसे भय था कि उसका बेटा कभी अपने विशिष्ट होने के बारे में सोच-विचार कर सकता है । ऐसे में उसे यह पता लग सकता है कि वह एक छवि मात्र है । एक वास्तविक आदमी न होना , किसी और व्यक्ति के सपनों की उपज मात्र होना -- यह पता लगना कितना अपमानजनक होगा , कितना चकरा देने वाला सत्य होगा । अपने मज़े की अवस्था में उपजे अपने बच्चों में भी हर पिता की रुचि होती
है । इसलिए यह स्वाभाविक था कि वह जादूगर अपने उस बेटे के भविष्य के बारे में चिंतित हो जिसके प्रत्येक अंग को उसने अपनी सोच से एक हज़ार एक गुप्त रातों में बनाकर पूरा किया था ।
                उसके चिंतन-मनन का अंत अचानक ही हो गया , हालाँकि कुछ संकेत इस ओर पहले से ही इशारा करने लगे थे । एक लम्बे सूखे के बाद दूर की पहाड़ी पर किसी चिड़िया जैसा हल्का और तेज़ी से उड़ने वाला बादल का टुकड़ा प्रकट हुआ । फिर , दक्षिण दिशा की ओर आकाश का रंग किसी तेंदुए के मुँह जैसा गुलाबी हो गया । इसके बाद चारो ओर ऐसा धुआँ छा गया , जिसने लौह-रातों को भी जैसे खुरच डाला । अंत में जंगल से भयातुर जानवरों के भागने की अजीब घटना घटी । जो भी अब हो रहा था वह सब कई सदियों पहले भी हो चुका था । अग्नि-देवता के मंदिर के गोल खंडहर एक बार फिर धधकती आग में नष्ट हो गए । चिड़ियों से रहित एक सुबह उस अजनबी जादूगर ने खुद को उस गोल खंडहर में चारो ओर से भीषण आग से घिरा पाया । एक पल के लिए उसके मन में नदी में पनाह लेने का विचार आया , किंतु फिर वह समझ गया कि मौत उसके बुढ़ापे का आलिंगन करने के लिए आ रही थी ताकि उसे अपने श्रम से मुक्ति मिल सके । फिर वह लपलपाती लपटों के बीच चला गया । किंतु उन लपटों ने उसकी त्वचा को जलाया नहीं । वे उसे अपने आगोश में ले कर पुचकारने लगीं । उसे कोई गर्मी या जलन महसूस नहीं हो रही थी ।
और तब राहत , अपमान और भय के मिले-जुले भाव से वह अजनबी जादूगर यह समझ गया कि दरअसल वह स्वयं भी मात्र एक छायाभासी उपस्थिति था , किसी अन्य वास्तविक व्यक्ति के सपने की उपज भर था ।



यह रचना सुशांत सुप्रिय जी द्वारा लिखी गयी है . आपकी कई कहानियाँ तथा कविताएँ पुरस्कृत तथा अंग्रेज़ी, उर्दू , असमिया , उड़िया, पंजाबी, मराठी, कन्नड़ व मलयालम में अनूदित व प्रकाशित हो चुकी हैं ।पिछले बीस वर्षों में आपकी लगभग 500 रचनाएँ देश की सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं ।हिन्दी में अब तक आपके  दो कथा-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं:'हत्यारे' (२०१०) तथा 'हे राम' (२०१२)।आपका पहला काव्य-संग्रह ' एक बूँद यह भी ' 2014 में  प्रकाशित हुआ है ।
संपर्क सूत्र - सुशांत सुप्रिय         मार्फ़त श्री एच. बी. सिन्हा ,
         5174, श्यामलाल बिल्डिंग ,
         बसंत रोड, ( निकट पहाड़गंज ) ,
         नई दिल्ली - 110055
         मो: 9868511282 / 8512070086
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