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मिलता नहीं कन्धा कोई आंसू बहाने को 
क्या युद्ध ही  बस एक अंतिम प्रयाय था
या उससे परे अन्य  भी  कोई उपाय था

संवाद कृष्ण का दुर्योधन से भी हुआ
और बोल गया वो कलयुग के सत्य को
की जानता हूँ मैं मर्म धर्म का
अंतर्मन मेरा अनुसरण को तैयार नहीं है
अधर्म ज्ञात है मुझे पर क्या करूँ प्रभु
उससे निवृत होने का विचार नहीं है
और आप मधुसूदन मेरे ह्रदय में हैं
करता वही मैं हूँ , जो मुझसे कराते आप
अब आप ही जानो क्या पुण्य क्या है पाप

हम आज भी कह देते हैं की ज्ञान मत दो यार
अपना कोई जब आता है रास्ता दिखाने को
अहंकार से भरे बस संवाद होते हैं
फिर मिलता नहीं कन्धा कोई आंसू बहाने को


पांडव गीता/प्रपन्न गीता के श्लोक से प्रेरित




यह कविता रणजीत कुमार मिश्र द्वारा लिखी गयी है। आप एक शोध छात्र है। इनका कार्य विज्ञान के क्षेत्र में है ,साहित्य के क्षेत्र में इनकी अभिरुचि बचनपन से ही रही है . आपका उद्देश्य हिंदी व अंग्रेजी लेखनी के माध्यम से अपने भाव और अनुभवों को सामाजिक हित के लिए कलमबद्ध करना है।

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