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मुझे नहीं पता इन मासूमों पर वक्त इतना कहर ढायेगा ।  उन्हें रोने पर मजबूर कर देगा . 
        मैं रास्ते से गुजर ही रहा था कि पास वाले गाँव से रोने की आवाज।  मैंने धैर्य साधा और गाँव में घुस गया।  दो तीन बच्चे कौने में बैठे दुबले पतले ,उनके माँ बाप खड़े दीवाल के सहारे रोये जा रहे हैं। 
       "आप लोग क्यों रो रहे हो ?" मैंने पूछा।  
       "रोये नहीं तो क्या करें ?इस साल की सारी फसल बर्बाद हो गई ,बच्चा दो दिन से बीमार है।   पैसे भी नहीं I ढंग से खाना भी नहीं खाया I" सामने से जवाब मिला।  
        "अरे भाई आसपास पड़ोस से मदद ले लेते।  "
        "मदद कहाँ तक ,पडोसी भी अब मदद करने से कतराते हैं। "
अशोक बाबू माहौर



         मैंने बैग खोला बिस्कुट बगैरह ....उन्हें थमा दिए।  पर्स से निकालकर रुपये भी।   सारे लोग खुश हुए ,पैरों से लिपटे बोल उठे ,"आप जैसे लोग गरीबों को मिल जाए तो यह संसार स्वर्ग बन जाये आप मसीहा हो सचमुच में। "
         "अच्छा ये सब छोडो जल्दी से बच्चे को अस्पताल ले जाकर दवाई दिलवा दो रुपये की जरूरत पड़े और माँग लेना। "





यह रचना अशोक बाबू माहौर जी द्वारा लिखी गयी है . आपकी विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी है . आप लेखन की विभिन्न विधाओं में संलग्न हैं . संपर्क सूत्र -ग्राम - कदमन का पुरा, तहसील-अम्बाह ,जिला-मुरैना (म.प्र.)476111 , ईमेल-ashokbabu.mahour@gmail.com

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