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रणजीत कुमार मिश्र की कविताएँ

शिव 
न बेल के पत्ते  हैं , न फूल हैं उपलब्ध
न मन्त्र ज्ञात है , सूझता कोई न शब्द
करदो कृपा प्रभु की अहंकार समर्पित
हो जाए फिर मलिन से शुद्ध मेरा चित्त
महज साँसों का चलना नहीं प्रमाण जीने का
समझ सको तो समझो वरदान जीने का
विष हिस्से में अपने हो परवाह नहीं है
अमरत्व की मुझे कोई अब चाह नहीं है
उठे भुजा तो विश्व के कल्याण के लिए
नतमस्तक हूँ मैं आपके सम्मान के लिए



प्रमाण
क्या क्या प्रमाण दूँ मैं दुनिया के मंच पर
अब उठ गया विश्वास है इस क्षल प्रपंच पर
दर्पण को दूँ प्रमाण की दीखता  हूँ मैं सुन्दर
रणजीत कुमार 
लोगों को ये प्रमाण भरा ज्ञान है अंदर
और प्रमाण ये की मैं कितना सच्चा हूँ
माँ बाप को प्रमाण की मैं अच्छा बच्चा हूँ
गुरु को भी तो प्रमाण की हूँ मैं आज्ञाकारी
और साथियों को ये प्रमाण की मैं हूँ  क्रांतिकारी
प्रमाण की निर्दोष हूँ मैं हर लड़ाई में
और प्रमाण ये भी की अब्वल हौसलाअफजाई में
प्रत्यक्ष के  लिए भी जरूरी प्रमाण है
खेद है की नहीं ज्ञात कैसा ये ज्ञान है
क्या अस्तित्व महज मेरा है ढूंढना प्रमाण
या इसके  परे और भी कोई  है पहचान
संशय की इस घड़ी में दया का पात्र मैं
या किसी बड़े उद्देश्य का हूँ निमित मात्र मैं
है ज्ञात नहीं मुझको कृष्ण आप बताएं
अर्जुन की तरह मुझको भी अब राह दिखाएँ ............



यह कविता रणजीत कुमार मिश्र द्वारा लिखी गयी है। आप एक शोध छात्र है। इनका कार्य विज्ञान के क्षेत्र में है ,साहित्य के क्षेत्र में इनकी अभिरुचि बचनपन से ही रही है . आपका उद्देश्य हिंदी व अंग्रेजी लेखनी के माध्यम से अपने भाव और अनुभवों को सामाजिक हित के लिए कलमबद्ध करना है।

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