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अशोक बाबू माहौर
स्कूलों के चक्कर काटते काटते ,मुझे आज चार दिन हो गए I कोई ढंक का स्कूल मिला ही नहीं जिसमें अपने बच्चे का एडमिशन करा सकूँ I सभी झूँठ की सीडिओं पर बने महान स्कूल है I 
       घर की तरफ लौट ही रहा था कि मेरी नजर दीवाल पर चिपके लम्बे चौड़े विज्ञापन पर पड़ी I साफ़ साफ़ शब्दों में लिखा था ' हमारे विद्यालय में अपने बच्चे का एडमिशन दिलाइए ,निश्चिन्त रहिये I '
       हमारे यहाँ वातानुकूलित कमरे I प्रत्येक कमरे में बैठने की उचित व्यवस्था I लाने, ले जाने के लिए उत्तम साधन वगैरह..वगैरह ..I 
       मैं मुड़ा स्कूल में जा धमका प्रंसिपल महोदय से मुलाकात की "सर मैंने आपका विज्ञापन पढ़ा I क्या बच्चों की पढाई के लिए आपके पास उचित व्यवस्था है ?I "
       "क्यों नहीं ?हमारे पास वातानुकूलित कमरे I उचित फर्नीचर I बैठने के लिए बेहतरीन कुर्सियाँ I "
        मेरा सिर घूम गया हाँ में हाँ मिला दी I आगे क्लास रूम में गया तो अचम्भा साधकर रह गया I सारी खिड़कियाँ टूटी I कुर्सी वगैरह भी उलटी पड़ी टूटी फटी I जगह जगह गंदगियों के ढेर I मैंने दोनों पैर पीछे किये प्रंसिपल महोदय से जुबान लड़ा दी "सर आप तो बोल रहे थे हमारे यहाँ पर व्यवस्थाओं की कोई कमी नहीं है किन्तु ये क्या है ?I "
          प्रंसिपल महोदय मुस्कुराए गिरगिट  की तरह रंग बदला और बुदबुदा उठे "आपको बुरा नहीं मानना चाहिए हमलोगों को स्कूल चलाने के लिए  थोड़ी बहुत झूँठ बोलनी पड़ती है I आप चिंता न करें हम आपके बच्चे को उज्जवल भविष्य देंगे, बेहतरीन शिक्षा I 

यह रचना अशोक बाबू माहौर जी द्वारा लिखी गयी है . आपकी विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी है . आप लेखन की विभिन्न विधाओं में संलग्न हैं . संपर्क सूत्र -ग्राम - कदमन का पुरा, तहसील-अम्बाह ,जिला-मुरैना (म.प्र.)476111 ,  ईमेल-ashokbabu.mahour@gmail.com

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  1. > कोई विद्यालय विद्या व्यसन से श्रेष्ठ होता है उपकरण से नहीं.....

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