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कम्बख्त कहानी मुझे जेल ले गई या ये कहिये कि कहानियों के पात्र की खोज में मैं जेल तक चला गया। एक जेल से दूसरे फिर तीसरे गया, पर कहानी के पात्र जितने खुँखार किस्म के दिखे उतने उनके किस्से सुनने नहीं मिले। लोगों ने सलाह दी कि पागलखाने भी घूम आवो। शायद वे मेरा मखौल उड़ना चाहते थे।
आखिरकार एक पात्र मुझे मिल ही गया। मुझे कभी यह ख्याल नहीं आया कि बँटवारे के इतने वर्षों बाद भी कुछ किस्सों के खंडहर जेल में कैद मिल जावेंगे। हुआ यह कि कैद में एक बूढ़ी मुझे देख सहसा बोल उठी, ‘बेटा! लगता है कि तुम इसी पाकिस्थान के हो।’
न मालूम उसे कैसे यह आभास हुआ? खैर, मैंने उसी को अपनी कहानी का पात्र समझकर पूछना चालू किया और जैसे जैसे वह अपनी कहानी सुनाने लगी, मैं उसकी तह में जाने को लालायित हो उठा।
बँटवारे के पहले वह हिन्दुस्थानी थी और शायद वह उसी रूप में भारत आ भी चुकी होती। वह उस समय अपनी पहली औलाद के होने के मधुर स्वप्न में खोई हुई थी। उसे बँटवारे के घिनौने स्वरूप का अंदाज भी न था। अचानक हिन्सा खुले आसमान के नीचे नग्ननाच करने उतारू हो गई। लाहौर में घर-घर जाकर लोगों को बाहर खींचा जाने लगा और खून से सनी सड़कों पर उनके सिर को धड़ से अलगकर तड़पता छोड़ दिया जाने लगा। हिन्सा जब नफरत के लिबास को ओढ़े रहती है तो वह अति क्रूर, बेहया और वीभत्स्य हो जाती है। किसी को इसकी परवाह नहीं थी कि वे एक गर्भवती को बेरहमी से खींच रहे थे और उसके ही सामने उसके शौहर का कत्ल कर उस स्त्री की चीख का मजाक उड़ा रहे थे। जिसने कत्ल किया वही उस स्त्री को खींचकर भीड़ से दूर ले गया। उसके बाद उसे कुछ सुँघाया गया या फिर सिर पर मारा गया, वह समझ नहीं पायी थी। वह वहाँ से कैसे, कहाँ और किसके द्वारा ले जायी गई, उसे कुछ भी मालूम नहीं हो सका था।
कालान्तर उसने अपने आप को एक अँधेरी कोठरी में पाया, जहाँ रोशनी अंदर आने के लिये बाहर ही तड़प रही थी और उसकी तड़प शायद उतनी ही होगी जितनी वह स्वतः अनुभव कर रही थी। प्रकाश अंधेरी कोठरी में आना चाहता था और वह कोठरी से बाहर फैले उजाले में नहाने की चाह लिये तड़प रही थी। यह मात्र उसकी अपनी सोच थी क्योंकि वह नहीं जान पाई थी कि बाहर प्रकाश उतना ही भयभीत था जितनी उसकी आत्मा बंद कोठरी में थी।  बाहर शोर था -- चीख-पुकार की भीड़ थी -- गाली-गलौच का प्रदूषित वातावरण था -- शैतान का साम्रज्य था। किसी शैतान ने कोठरी का दरवाजा थपथपाया। दरवाजे का सीना चीरती तलवारें भीतर आ धमकीं। तलवारें खून से सनी थी फिर भी प्यासी लग रहीं थी। तभी कोई उस स्त्री को खींचकर बाहर ले आया और भीड़ को चीरता -- वीरान की खोज करता भाग खड़ा हुआ।
शैतानों की भीड़ में वह एक मामूली इंसान था या कोई रहनूमा, वह स्त्री नहीं समझ पायी थी। ऐसे समय बेबस हुई सोच कुंद हो जाती है -- प्राण अचेतावस्था में तड़पना भी त्याग चुके होते हैं।
दंगों के समय कहानी रेंगती नहीं, वह सरपट भागती जाती है। कहानी के पात्र कँटीली झाड़ियों में कूद पड़ते हैं -- हाँफते हुए कुछ देर सुस्ताते हैं -- फिर किसी आशंका से भयभीत हो जाते हैं मृत्यु की ओर अग्रसर इंसान की तरह।
और जैसा उस वृद्धा ने आगे बताया वह भीड़ से निकलकर जो आदमी उसे उठाकर भाग रहा था,  कुछ दूर जाकर रुक गया। उसने अपने चेहरे पर का नकाब जैसे ही अलग किया तो उस स्त्री को समझने में देर नहीं लगी कि वह मुसलमान था। वह एक बारगी सिर से पैर तक कंप उठी।
‘डरो नहीं,’ उसने कहा, ‘मैं समझ गया कि तुम हिन्दू हो। पर मैं एक नेक ....’
‘दंगे की भीड़ में कोई भी नेक इरादेवाला नहीं होता,’ ये शब्द अनायास ही उस स्त्री के मुख से निकल पड़े थे। पर वह अजनबी यह सुन हल्की-सी मुस्कराहट के साथ बोला, ‘ये सब तो आनेवाला वक्त बतायेगा। अभी ये बताओ कि क्या तुम लाहौर की रहनेवाली हो? यदि हाँ, तो तुम्हारे शौहर और परिवार का पता बतावो, मैं तुम्हें वहाँ पहुँचा सकता हूँ।’
इन शब्दों में शायद कुछ ऐसा था जो विश्वास जगा सकता था। स्त्री ने कहा, ‘वे सब को तो मेरे सामने ही कत्ल कर दिया गया था। अब क्या पता दूँ?’
‘ठीक है। मेरे साथ चलो।’
और जब वह उसे अपने घर ले आया, तब उसने एक बार फिर अपने ओठ खोले और बोला, ‘तुम  चाहो तो बच्चा जनने तक यहाँ रह सकती हो। बाद की बात फिर सोचना।’
वृद्धा ने एक गहरी साँस लेकर आगे कहा, ‘‘लेकिन उसके बाद सोचने जैसी कोई चीज ही न रही। वो मेरे बच्चे को प्यार जो करने लगा था। जब कोई माँ अपने बच्चे पर अटूट प्यार उँडेलते किसी को देखती है, तो वह उसका आदर करने लगती है। मैं भूल गई कि वह मुसलमान था और एक हिन्दू बच्चा उसके लिये जान से भी प्यारा हो गया था।
‘‘लेकिन प्यार व घृणा के बीच धर्म की इतनी बारीक रेखा होती है, इसका मुझे ज्ञान नहीं था। अज्ञानता  ही तो धोखा देनेवाली होती है। इस बात का पता मुझे तब चला जब मैं फिर एक बार माँ बनी। अब मेरे और उसके बीच दो बच्चे थे -- एक हिन्दू और दूसरा मुसलमान। धर्म ने अपनी केंचुली तुरन्त बदल ली। वह छोटे को उतना या उससे अधिक प्यार करता तो कोई बात नहीं थी। पर अब उसकी आँख का तारा जैसे किरकिरी बन उसे तड़पाने लगा था।
‘‘और एक दिन वह बड़े को घूमने साथ तो ले गया, लौटकर अकेला ही आ गया। मैंने लाख कोशिश की यह जानने कि वह मेरा बेटा कहाँ चला गया है। तो जो जवाब मुझे मिला उसे मेरे अंदर बैठा ममता से ओतप्रोत हृदय सहन नहीं कर पाया। उसका जवाब था, ‘अब उसको हमेशा के लिये भूल जावो।
‘क्यों?’
‘किसलिये?’  
‘क्या हो गया मेरे बच्चे को?’
‘‘मैं चीख पड़ी -- चीखती रही और वे चीखें उसकी आँखों की पुतलियों से टकराकर टूटे हुए काँच की किरमिचों की तरह बिखरती रहीं। चीखें थककर गिड़गिड़ाने लगती हैं -- मिमयाने लगती हैं -- हताश होने लगती हैं परन्तु एक आहत औरत की चीखें हताश होना नहीं जानती। वे चिन्गारियाँ बन जाती हैं -- भभकती आग लगाने आतुर -- सबकुछ स्वाहा करने विक्षिप्तावस्था में जाने को व्याकुल।
‘‘मैं चाहती तो उसके चेहरे को नाखूनों से लहुलुहान की देती -- उसकी आँखें लोंच लेती। लेकिन नहीं। मैंने ऐसा कुछ नहीं किया। मैंने उसे एक ही वार में धराशाही कर दिया। उसके सीने से छूटते खून के फव्वारे को उन्माद से देखने की चाहत लिये मैं वहीं खड़ी रही।’’
भूपेन्द्र कुमार दवे
इसके बाद वह वृद्धा एकदम खामोश हो गई।  उसके पास आगे बोलने को और क्या था? एक अपराधी की जेल में गुजरती जिन्दगी न तो कोई कोरा पन्ना होती है -- न ही उसपर कुछ और लिख पाने की गुंजाईश होती है क्योंकि गुनाह तो उस पर सजा की काली स्याही पोत चुका होता है।
मैं उसके सामने गुमसुम बैठा रहा, यह सोचता हुआ कि क्यों इस स्त्री ने कहा कि प्यार व घृणा के बीच धर्म की एक बारीक रेखा होती है। अगर प्यार एक ऊँची चोटी पर बैठा हो तो वह चारों ओर फैली गहरी खाई में कूदने की कैसे हिम्मत कर सकता है? और तभी न जाने क्यूँकर मन में आया कि उससे उस व्यक्ति का नाम तो जान लूँ जिसकी उसने हत्या की थी।
‘जावेद।’
यह नाम सुनते ही एक चलचित्र-सा मेरी आँखों के सामने कुछ उभरने लगा। मेरी एक कहानी के पात्र  का भी यही नाम रहा है। वह लाहौर का रहनेवाला था और दंगे के दौरान उसने अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा  देने के इरादे से चुपचाप भारत भेज दिया था। इसके लिये उसने अपने बच्चे को एक हिन्दू परिवार को सोंप दिया और नम आँखों से बिदा करते हुए उसने बच्चे से कहा था, ‘अब इस पिता का नाम उस देश में कभी भी अपनी जुबान पर मत लाना।’
क्या यह कहानी मैं उस स्त्री को सुनने की हिम्मत रखता हूँ? शायद नहीं, क्योंकि इससे वह विचलित हो जावेगी। ताउम्र सजा से तो छुटकारा मिलेगा नहीं, पर यह कहानी उसे विचलित अवश्य कर देगी -- पश्चाताप के पैरों तले रोंद देगी -- उसे विक्षिप्त  कर देगी -- उसे जेल से उठाकर पागलखाने ले जावेगी। पागलखाने की जिन्दगी तो जेल से भी बद्त्तर होती है।
क्या कोई बच्चा अपनी माँ को यह सजा दे सकता है? और इसलिये मैं बिना कुछ कहे वहाँ से बाहर आ गया।




यह रचना भूपेंद्र कुमार दवे जी द्वारा लिखी गयी है आप मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल से सम्बद्ध रहे हैं आपकी कुछ कहानियाँ व कवितायें आकाशवाणी से भी प्रसारित हो चुकी है 'बंद दरवाजे और अन्य कहानियाँ''बूंद- बूंद आँसू' आदि आपकी प्रकाशित कृतियाँ हैसंपर्क सूत्र - भूपेन्द्र कुमार दवे,  43, सहकार नगररामपुर,जबलपुरम.प्र। मोबाइल न.  09893060419.

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