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एक बदचलन गाना 
आज नमिता उदास थी.उदासी की यूं तो कई वजहें हो सकती थी. एक तो निगोडा ये मौसम, टप-टप आंसू बहाता और दूसरी उसकी उमर!! अब इस उमर में तो कोई उदास हो जाए भला!! और तीसरी वजह यह भी हो सकती थी कि...खैर छोडो लब्बोलुआब यह कि नमिता उदास है. और उसकी उमर को दोष देना भी कितना वाजिब है भला, कुल जमा पन्द्रह की तो है वो! तो अब इसे भी उमर जैसा कुछ माने तो ठीक वरना!!
असल में जो कुछ आज हुआ, यूं तो रोज़ कुछ न कुछ होता ही रहता है पर जो कुछ आज हुआ वो और दिनों से कुछ हल्का सा अलग था. हालांकि आने-जाने वालों को तो खबर ही नहीं हुई होगी पर आज नमिता की जो हालत थी उसमें उसे ये वाकया ज्यादा ही नागवार गुज़रा!! हुआ कुछ यूं कि ... आज सुबह कण्डे बटोरते समय .....रूकिए क्या हुआ? साहिबान ,नाम नमिता है तो क्या हुआ? कोई खानदानी रईसाना नाम हमारी साधारण सी नौंवी जमात में पढ्ने वाली लडकी का नहीं हो सकता क्या? हां तो कण्डे बटोरते समय जब-जब  नमिता...अच्छा निम्मो सलीम के घर के सामने से निकलती है तो झोपडी के अन्दर से एक फडकता सा बदचलन गाना उसके लिए ही बजता है—‘‘एक आंख मारूं तो छोरी पट जाए...’’ और हर रोज निम्मों को लगता है कि छोरा है सलीम और छोरी है निम्मों. कंडे अटोरते हुए भी सुर्खाब के पर लग जाते हैं मुलगी के!!गोबर की बदबू परेशान नहीं करती, बस कान में बजता रहता है वही अश्लील सा गाना!!
पर आज उदासी की कई वजहें थी!! सुबह सवेरे कंडे बनाने और बीनने के लिए जाती नमिता को दरवाजे पर ही टोक मार दी मां ने! ‘अरी आज कंडों की जरूरत को न!’ ये क्या; पिछले दो बरस से निम्मों कंडों की बिसात पर ही तो बिछी जा रही थी रानी बनके! प्यादी सी गई थी और चलना कितना मुश्किल था इस गोबर भरी बिसात पर! पर सलीम की वो गाने की अदा! वो पान की पीक; जो किनारे पर होठों से चूती हुई हलक में अटका देती थी निम्मों के दिल के किसी पुर्जे को; उसी ने तो इस बिसात की रानी बना दिया था निम्मों को! और आज माँ को देख, कैसे रोड़ा बन गयी उसकी राह का!!आँख की किरकिरी बन चुभी थी निम्मों को ‘क्यों री माँ; आज चूल्हा नहीं बालना! उंह, फिर मुझे न बोलना कि मरी निम्मों को काम नहीं सुहाता?’कोठरी के दरवाजे से टकराती माँ की बोली की परवाह किए बगैर धड़धडाती बाहर निकल गयी थी निम्मों! पर ये क्या?सब सुनसान; खाली टप्पर? कुछ धक से हुआ उसके भीतर! पर बढ़ गयी निम्मों आगे! सलीम के दरवाजे के सामने ही तो गोबर का ढेर होता था जहां निम्मों बनाती थी थोड़ा सा गोबर बटोर कर कंडे और बीनती थी सपने, जहां कान दिए रहती थी सामने वाली कोठरी को, पर ये क्या? आज कहीं कोई गाना नहीं बज रहा था?
साहिबान, रुकिए, अमां हम लव-जिहाद की नामाकूल बहस में उलझाने नहीं जा रहे हैं आपको! न तो अपन का कोई ऐसा इरादा है न ही इसरार कि कहानी को हर बार एक सेट पैटर्न का मुलम्मा चढ़ा कर दे दें आपको कि बजा बेटा झुनझुना, तो बंदर नाचेगा! चलते हैं अपन तो निम्मों के साथ कि देखें काहे को पन्द्रह बरस की उमर में ये लड़की इस कदर उदास है?
हर्ष बाला शर्मा 
निम्मों ने कान खुजलाए, आज तेरह बरस की उमर से जिस गाने की धुन पर नागिन की तरह नाच रही थी वो और जो दो बरस से सलीम मियाँ की आवाज में बजते बजते निम्मों के कान के रास्ते घुस गया था कहीं दिल-विल के किसी कोने में, आज बंद कैसे हो गया? कोठरी के किनारे से झांकता सलीम भी मौजूद नहीं था.निम्मों के नथुनों में गोबर की बू चढ़ गई. न तो सलीम का गाना, न ही एक दूसरे को अदबदा कर देखने की खुमारी! गोबर न चढ़े नथुनों में न तो और क्या? साहस करके कोठरी की ओर बड़ी ही थी, उस कोठरी की तरफ जिसमें कभी पाँव भी न धरे थे पर जिसके कोने कोने का अहसास निम्मों के भीतर था ,  कि सामने के घर से अभी हफ्ते भर पहले बहू बन कर आई श्यामा खींसे निपोरते हुए सामने आ गई और पूछ बैठी ' क्यों री निम्मों, क्या झाँक रही है?" आग लग गई निम्मों को 'मरी सब जाने है पर बताएगी नहीं' और निम्मों पूछे तो पूछे कैसे! हँसते हुए बोली श्यामा 'तेरा गाने वाला तो गया निम्मों अपने गाँव दुल्हिन लाने, सात दिन बाद ही लौटेंगे सलीम मियाँ अपनी दुल्हिन के साथ' !
ये क्या हुआ? निम्मों पर तो जैसे गोबर का पहाड़ ही गिर पड़ा हो! आज के युग में आएं कृष्ण और उठाएं आ कर ये गोबर का पहाड़! उठाया होगा कभी उन्होंने द्वापर में गोवर्धन! देखे आकर कि हर गोबर का पहाड़ गोवर्धन नहीं होता!  वैसे कायदे से देखा जाए तो सलीम ने उससे कोई वायदा नहीं किया था, वायदा तो छोडिए उनमें यूँ तो कोई दुआ सलाम का भी रिश्ता नहीं था, बस था तो  बीच में एक अश्लील, बदचलन सा फडकता हुआ गाना जिसमें बताया गया था कि ये दिल विल नाम की जो चीज होती है वो बस ऐसे निकलती है और वैसे बस कैच कर लेता है उसे कोई! और उसे लगा कि यही हुआ होगा उसके और सलीम के मुआमले में भी! पर यहाँ तो मसला ही उलट गया. सलीम मियाँ तो चल दिए रास्ता बचाकर लेने दुल्हिन गोया निम्मों का दिल-विल तो कुछ था ही नहीं.
ये कोई रणक्षेत्र में घटी घटना नहीं थी न ही इतिहास में इसके दस्तावेज मिलेंगे; सदियों के बाद भी. पर ये घटना इतनी छोटी भी न थी. एक लड़की के जीवन को किरच-किरच कर जाने वाली घटना इतनी छोटी भी नहीं हो सकती कि उससे यूँ ही गुजर जाया जाए!
तो गोबर के कंडों से अपनी जिंदगी को बुनती और उसे खूबसूरत बनाने की कोशिश में उलझे निम्मों उर्फ नमिता उदास थी और उदासी के केन्द्र में था सलीम का गाना और उसकी पान की पीक, और उसकी इश्श्श्स्श माइल और....और. ...और....
पर जैसे ऐसी उदासी और ऐसी कई उदासियाँ प्रेम के कीड़े को मारने में नाकामयाब होती है, वैसे ही निम्मों की उदासी भी उसकी प्रेम भरी नीम बेहोशी को तोड़ने में नाकामयाब ही हुई. इस उदासी के बावजूद अगली सुबह हुई और मुई निम्मों चल दी कंडे बटोरने. निम्मों जाना चाहती है उस मरदूद के घर के सामने और देखना चाहती है उसकी दुल्हिन को! और शीशा बना देना चाहती है गोबर के कंडों को, झाँक के देखना चाहती है अपना चेहरा उसमें. वो किसी से कम है क्या? देखेगी जरूर वो सलीम की दुल्हिन को जिसने कितनी आसानी से छीन लिया उसका वो बदचलन गाना. कौन जाने इन गानों को बनाकर कितना जुलम ढाया है फिलम वालों ने निम्मों पर.
पर ये उमर और ये दिन.उदासी की परत गहरी होती जा रही है उस पर. उस पर ये बारिश...टप..टप आंसू.. जमीन सोखे जा रही है इन आसुओं को.कौन रखेगा इनका इतिहास और कौन जानेगा इनका भविष्य!
पार्ट २-
समय बीतना था सो बीता ही.  घटनाएँ घटती है और जीवन आगे बढ़जाता है सो निम्मों की जिंदगी भी आगे बढ़ गई. इस घटना के बाद निम्मों ने कंडे न बनाए हों ऐसा नहीं पर हाँ जगह जरूर बदल गई. अब वह कंडे बीनती थी अपने स्कूल के रास्ते पर. और इस बहाने चली जाती थी अब स्कूल भी. अब ये तो नहीं पाता कि ये इसी घटना का चमत्कार था या कुछ और पर दो साल से नवीं में अटकी अपनी निम्मों इस बार पास हो गई. अब उसके दिल के पुर्जे को भाने लगा था स्कूल का रास्ता भी.  असल में हुआ ये कि उस रास्ते से गुजरते हुए एक गाना और सुनाई देने लगा था निम्मों को साइकिल पर चढकर जाते हुए लड़के का. अब गानों की तो कमी नहीं है और सारी फ़िल्में बताती है कि टूटे दिल पर गानों का असर बड़ी तेजी से होता है.और विज्ञान कहता है कि...अब छोडिये, विज्ञान कुछ भी कहें, हम तो फिल्म पर विश्वास कर लेते है अभी. हाँ तो उस पर भी हुआ असर एक नए अश्लील से गाने का जो कुछ इस तरह था 'आजा मेरी गाड़ी में बैठ जा''
और साइकिल बन जाती है गाड़ी निम्मों के सामने. निम्मों क्या करें, इसकी आँखों की कशिश बांधे ले जाती है उसे.!  निम्मों को लगता है हवा के घोड़े पर बैठ कर आता है ये लड़का और  साइकिल बदल जाती है सफेद
घोड़े में. हाँ बस अब तय कर लिया निम्मों ने, इसके बच्चों की अम्मा वही होगी. रोक के देखे कोई उसे. शान से पूरी ठसक से बैठेगी निम्मों इसकी साइकिल पर पीछे. पर हाँ, सलीम की गली से गुजरेगी जरूर!और पान भी खाएगी. और पीक जब बहेगी तो धीरे से अपने होठों से चूम लेगी इस लड़के को! और गाएगी 'एक आँख मारे जमाना झुक जाए'. निगोडा सलीम देखे तो कि सिर्फ कंडे ही नहीं बीनती, सपने भी बुनती है थोड़ी मामूली सी गैर मामूली लड़की.
पर ये लड़का, निम्मों उर्फ नमिता का मन करता है सोलह  की इस उमर में कि बस गाता जाए गाना और बटोरती रहे वो कंडे उम्र भर और देखे कि बस ऐसे गया दिल और वैसे बस कैच कर लिया किसी ने. अब इतना भी नहीं चाह सकती क्या एक मामूली सी लड़की. पर फिर भी कभी-कभी सलीम का गाना बहुत मिस करती है वो...वही वाला. . थोड़ा सा बदचलन गाना..

यह रचना डॉ. हर्ष बाला शर्मा जी द्वारा लिखी गयी है . आप अध्यापन कार्य में रत है . आपकी प्रकाशित रचनाएं - सूचना युग में हिंदी शिक्षण , मीडिया और बाज़ार की भाषा , समकालीन हिंदी नाटकों में व्यवस्था विरोध आदि है . 

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