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कहानी का इतिहास बहुत प्राचीन है . जब से मानव में सोचने - समझने कहने की प्रवृति आई , तब से कहानी का विकास माना जाता है . गत बीस वर्षों में कहानी की परम्पराओं में और अधिक परिवर्तन हुआ है . नयी कहानी में नयी दिशा का बोध और नयी कविता की तरह नयी कहानियों की भी सर्जना हुई है . मिनी कहानी या लघु कथा शैली का जन्म हुआ . इस डेढ़ दशक में हिन्दी की कहानी में कुछ ऐसे नाम आयें हैं , जो कहानी को विश्व सहिअत्य की कहानी के सम्मुख खड़ा करने में सक्षम हैं . वैचित्र - रहस्य , रोमांच , कुतूहल तथा रहस्य आदि तत्वों का इस दशक में लोप सा हो गया हो , यह बात नहीं , किन्तु आज की कहानी इन सबसे बहुत आगे बढ़कर अपने को कथा साहित्य में प्रतिष्ठत कर चुकी है . साठोत्तरी कहानियां शिल्प और कथ्य के स्तर पर अपने महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है . ये कहानीकार कहानी के विधान को ताक पर रखकर अनुभूति , चिंतन तथा संवेदना  की तन्मयता और प्रमाणिकता को कहानी का रूप देने के लिए अग्रसर हैं . शिल्प की द्रष्टि से भी इस दशक की कहानियाँ में बड़ा अंतर आया है . ठाकुर प्रसाद सिंह ने कहानी के सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखते हैं - ' हिन्दी के कथा साहित्य ने बड़ी तन्मयता से अपना कार्य पूरा किया है . उत्तर दायित्व का ज्ञान उसे अपेक्षाकृत और शैलियों से अधिक रहा है , यद्यपि प्रेमचंद का कोई व्यक्ति इस बीच में नहीं हुआ , किन्तु समस्यों का निराकरण बड़ी शक्ति से किया है . आज आवश्यकता है कि समाज शक्ति इस वर्तमान कुंठा का स्थान शीघ्र ले. जीवन की व्याख्या के नए मूल्यों के प्रति विश्वास की भावना और दृढ होने से संभव हो सकेगा . '
अतः इस कथन से यह स्पस्ट है कि इस दशक के पूर्व तक कहानी पर छाया रहने वाला संत्रास और कुंठा का वह कोहरा अब मिट चुका है , जो पश्चिमी कहानी की नक़ल पर कहानीकारों पर छाया रहा 
आज की हिन्दी कहानी साहित्य मनोविज्ञान , संत्रास कुंठा की परिधि से बहार निकल कर यथार्थ की भूमि पर स्वछंद रूप से विचरण कर रहा है . कहानीकार कमलेश्वर का कथन है - 'आज का कहानीकार देख रहा है कि राजनीति ने सामान्य आदमी को मात्र एक  मोहरा बना दिया है . ऐसी इस्थिति में में सामान्य की यातनाएँ अधिक समृद्ध और मारक हुई . आज का लेखन मनुष्य की यातनाओं का मूक और तटस्थ साक्षी नहीं , अपितु उसका सहभोक्ता और सहयात्री भी है . इसीलिए आज की कहानियाँ सन्दर्भ सापेक्ष है . यह अनुभव तक सीमित न रहकर अनुभव के अर्थों तक पहुँचती है . जहाँ आदमी एक विराट ऐतिहासिक प्रांगन में मौजूद है . यह संघर्षशील यथार्थ का दौर है . जो मुक्ति और न्याय के लिए आदमी द्वारा आदमी का सबल पक्ष है '. 

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