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मैं औरत हूँ
मुझे भी जीने दो
आगे बढ़ने दो
हक़ जरा से पाने दो I
खामोशी तनिक सी
झकझोरती,मरोड़ती मुझको
उमड़ती उफान लेती
रगड़ती अंदर तन को
बादल बनकर बरसती
उमड़-खुमड़ करती
गिरती बिजली सी
कोहराम मचाती I
मुझको भी उड़ लेने दो
पंख फ़ैलाने दो I
मैं औरत हूँ
मुझे भी जीने दो I
कदम रखा था
जब मैंने,
अपनी ही देहलीज पर
आँखें इतरा उठी,घर से
बाहर उंगलियाँ तीरों सी
होंठ बुदबुदा उठे
लाखों में
जुबान सबकी कडुवी सी I
मैं भी जीना चाहती हूँ
बुलंदियां छूने दो I
मैं औरत हूँ
मुझे भी जीने दो I
जब मैंने कदम बढ़ाया
सडकों पर
शैतान मुझ पर टूट पड़े
झुण्ड बनाकर,बेरहम
हीन,घिनौने कट्टर
प्यासे मेरी देह के
न शर्म,हया उनमें
न लगते पुत्र किसी के I
मैं पुलकित सरिता हूँ
लहराकर बहने दो I
मैं औरत हूँ
मुझे भी जीने दो I
मेरे वक्षस्थल पर
खेले थे कभी
आज बहकने लगे
अशोक बाबू माहौर
मैं माँ हूँ
बहन भी तुम्हारी
भवानी मेरा अंतिम रूप
मैं जगदंबा,जग पालन हूँ
किलकारी आँगन की I
मुझे कदम मिलाकर चलने दो
तूफानों से लड़ने दो I
मैं औरत हूँ
मुझे भी जीने दो I



यह रचना अशोक बाबू माहौर जी द्वारा लिखी गयी है . आपकी विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी है . आप लेखन की विभिन्न विधाओं में संलग्न हैं . संपर्क सूत्र -ग्राम - कदमन का पुरा, तहसील-अम्बाह ,जिला-मुरैना (म.प्र.)476111 ,  ईमेल-ashokbabu.mahour@gmail.com

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  1. आपकी इस पोस्ट को शनिवार, ०६ जून, २०१५ की बुलेटिन - "आतंक, आतंकी और ८४ का दर्द" में स्थान दिया गया है। कृपया बुलेटिन पर पधार कर अपनी टिप्पणी प्रदान करें। सादर....आभार और धन्यवाद। जय हो - मंगलमय हो - हर हर महादेव।

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