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वक़्त का तक़ाज़ा है, चलना ही पड़ेगा
असित नाथ तिवारी
जो नाग फन लहरा रहे, कुचलना ही पड़ेगा
न्याय की देवी, अब गुमान मत कर
तेरी आंखों की पट्टी को अब उतरना ही पड़ेगा

संसद के सत्ताधीश, कुनबों के मठाधीश
चाल-चरित्र, चेहरा बदलना ही पड़ेगा
हर रोटी की गोटी, जो हैं सेट कर रहे
मुर्दों की भांति उन्हें जलना ही पड़ेगा

हर वोट के लिए नोट, हर जन के लिए धन
संभलो ईमान को बदलना ही पड़ेगा
फूंक डालो महापंचायत को, आग लगा दो
एक रोटी का जुगाड़ जो कर नहीं पाया
उस पूरे सिस्टम को निगलना ही पड़ेगा

उठो गाण्डीव संभाल लो, हे भारत के लाड़लों
कुरुक्षेत्र की रणभूमि में अब लड़ना ही पड़ेगा
वक्त का तकाजा है, चलना ही पड़ेगा
जो नाग फन लहरा रहे, कुचलना ही पड़ेगा



यह रचना असित नाथ तिवारी जी द्वारा लिखी गयी है।  आप २००३ से हिंदी पत्रकारिता में सक्रिय है। आपकी देश के कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित हो चुकी है . आप फिलहाल ज़ी न्यूज से संबद्ध है।  संपर्क सूत्र -  स्कूल ब्लॉक, मंडावली, पूर्वी दिल्ली .मो: 7838816382

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