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सत्ता तुम किस कदर
घृणास्पद होते गए..
किस कदर तुमने बदला
अपना रूप
विद्रूपताओं से जनमा, तुम्हारा अत्याचार
कहां-कहां नहीं बरपा....
तुम्हारे लिए सब
गिराते रहे मंदिरों को, मस्जिदों को
करवाते रहे दंगे लूटते रहे अस्मत....
और तुम....
हंसते रहे विवश होकर......

सत्ता सच बताना..
विद्रूपताओं पर अट्ट्हास करना
विरुपता का परिचायक नहीं क्या..
क्या कुछ और होता है
हिंस्र जानवर होना.....

सत्ता क्या ये सच नहीं
तुम एक मात्र कारण हो
अब तक के समस्त संघर्षों का...
तुम्हारे लिए ही क्या नहीं हुई
दुनिया की सारी जघन्यतम नरसंहारें.....
असित नाथ
सत्ता तुम देखना
एक दिन तुम हो जाओगे इतने भयावह
कि लोग चाहेंगे मुक्ती तुमसे
चाहेंगे उपर उठना तुमसे भी
फिर टूटेगा तुम्हारा दर्प,
फिर टूटेगा तुम्हारा अहम
और मिट कर रह जाएगा तुम्हारा अस्तित्व


यह रचना असित नाथ तिवारी जी द्वारा लिखी गयी है।  आप २००३ से हिंदी पत्रकारिता में सक्रिय है। आपकी देश के कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित हो चुकी है . आप फिलहाल ज़ी न्यूज से संबद्ध है।  संपर्क सूत्र -  स्कूल ब्लॉक, मंडावली, पूर्वी दिल्ली .मो: 7838816382

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  1. आपकी इस पोस्ट को शनिवार, २३ मई, २०१५ की बुलेटिन - "दी रिटर्न ऑफ़ ब्लॉग बुलेटिन" में स्थान दिया गया है। कृपया बुलेटिन पर पधार कर अपनी टिप्पणी प्रदान करें। सादर....आभार और धन्यवाद।

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  2. सत्ता तुम ठगिनी हम जानी ।

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