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       पुस्तक समीक्षा
छोटे आकार की बड़ी कलात्मक लघुकथाएं

लघुकथाएं जीवन के एक छोटे-से हिस्से का प्रतिनिधित्व करती हैं, लेकिन अगर उनको पूरे विस्तार से देखें तो
'गुरु-ज्ञान : आईना दिखातीं लघुकथाएं'
उनमें समूचा जीवन झलकता है। इस संदर्भ में अगर बालकृष्ण गुप्ता ‘गुरु’ की बात करें, तो यह परिभाषा एक खास अंदाज में सार्थक होती लगती है। किसी भी रचनाकार द्वारा अपने समय की व्याख्या दोहरी जिम्मेदारी का काम होती है, वह चाहे किसी भी स्तर की हो। इंसान का व्यवहार हो सकता है और वह इंसान की मानसिकता भी। इसमें समाज और संगठनों को भी शामिल किया जा सकता है।
यहां यह कथन उल्लेखनीय है कि लघुकथा सीमांतों पर लड़ी जाने वाली गुरिल्ला लड़ाई है। इसका अर्थ और कथन की व्युत्पत्ति का इशारा यही है कि कहानी लघु हो या बड़ी, उसका असली संघर्ष उस गुरिल्ला हमलावर शैली में ही निहित होता है। अगर कहानी यह काम नहीं कर सकती है, तो वह जीवन की उस सच्चाई को या गुरिल्ला युद्ध के उस आधार को खो देगी, जिसके आधार पर कहानी अपना संदेश देती है। 'गुरू' की लघुकथा की शैली को इस संदर्भ में परखा जाए, तो वे पूरी तरह से सफल हैं। उनकी लघुकथाएं पाठकों से संवाद करती हैं और उनके लिए कुछ काम भी छोड़ जाती हैं।
पाठक के लिए बालकृष्ण गुप्ता 'गुरु' जो काम छोड़ते हैं, वह उसे सोचने पर मजबूर करता है। वे अपनी बात कहते हैं और बाद में फैसला करने के लिए पाठक को स्पेस देते हैं। उनके संग्रह 'गुरु-ज्ञान' की कई लघुकथाओं में इसके उदाहरण बिखरे पड़े हैं।
साहित्यिक दंड-बैठकों से दूर 'गुरु' अपनी लघुकथाओं के साथ अपेक्षाकृत कम ही मैदान में आते हैं, लेकिन उनकी रचनाओं को पढ़कर यह जाना जा सकता है कि वे कितने गहरे जाकर चीजें लाते हैं। फिर वह चाहे अर्थ हो या कलात्मकता। इस संदर्भ में 'शिष्टाचार का चक्र' शीर्षक लघुकथा में वे एक ऐसे चक्र का उल्लेख करते हैं, जो हम सबके आसपास घूमता रहता है। कई बार हम उसके संपूर्ण रूप में नहीं, तो किन्हीं-किन्हीं टुकड़ों में उस चक्र का हिस्सा होते हैं। यह लघुकथा किसी पर आरोप तय नहीं करती, लेकिन आरोप लगाती भी है। कहीं हम सब आरोपित हो जाते हैं, तो कहीं चक्र के किसी हिस्से में हम बरी भी होते रहते हैं। यह एक ऐसी कथा है जो निरंतर हमारे समाज में घट रही है। यह कलात्मकता और संदेश देने, यानी दोनों स्तरों पर समान रूप से सक्रिय होती हुई लगती है।
'गुरु-ज्ञान : आईना दिखातीं लघुकथाएं' की छोटी-छोटी कहानियों में जीवन का विस्तार उतना ही व्यापक है, जितना कि एक इंसान के जीवन में होता है। भाषा, कला और अर्थ के स्तरों पर पुस्तक में अच्छा संयोजन मिलता है। थोड़ी आलोचना इस बात की हो सकती है कि वे कहीं-कहीं उपदेश देने वाली पंक्ति जोड़ देते हैं, इससे कथा का कलात्मक प्रभाव आहत हो जाता है। एक-दो जगह ऐसा हुआ है कि लेखक का अतिरिक्त कथन संवाद की तीव्रता को कम कर देता है। बहरहाल, इसे नजरअंदाज कर दें, तो बाकी सारी लघुकथाओं में जीवन की विविधता और उसकी विसंगतियां उन्होंने अच्छी तरह पकड़ी हैं। लघुकथा के इस समर्पित लेखक के प्रयासों में बड़ा और लघु जीवन अच्छी तरह से आया है। यह लेखक अच्छी तरह से जानता है कि उसे छोटी कथाओं की इस ‘गृहस्थी’ में कैसे कम में अपनी बात कहनी है। यानी कम शब्द, कम कल्पना और कम समय में। लेखक ‘अपनी बात’ में इशारा कर चुके हैं कि लघुकथा सामान्य गृहिणी के बजट की तरह है, जो कब, कहां और कैसे खर्च करना है, अच्छी तरह जानती है। लघुकथाओं की गुणवत्ता और अर्थवत्ता बताती है कि 'गुरु' को भी यह 'बजट' बनाने की कला बखूबी आती है।



- रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति
(फोन : 09826782660)

पुस्तक : 'गुरु-ज्ञान : आईना दिखातीं लघुकथाएं'
लेखक : बालकृष्ण गुप्ता 'गुरु'
कीमत : 250 रुपए (सजिल्द)
प्रकाशक : अयन प्रकाशन, नई दिल्ली
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लेखक सम्पर्क :
बालकृष्ण गुप्ता ‘गुरु’
(सेवानिवृत्त प्राचार्य)
डॉ. बख्शी मार्ग, खैरागढ़- 491881
जिला- राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)
फोन- 09424111454
ईमेल- ggbalkrishna@gmail.com                   

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