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हे ! फूल जरा तू
महका दे
मेरे घर, द्वार को
आँगन को भी
महका दे
खिड़की और दीवाल को
बस जा मेरे
अंत: कण में
महका दे ईमान को
मिथ्या वाणी
तोड़ दे ,
जोड़ दे
सत्य पावन ज्ञान को
इंसानियत के शब्द मलकर
इंसान बना दे
शान से I
हे ! फूल जरा तू
भर मुझमें
सद्गुण सारे
ज्ञान के,
देख जिसे
झूम उठे
शैतान भी
अशोक बाबू माहौर
प्यार से I
तू भर मुझमें
ढेरों वाणी
गुरु ग्रंथ महान की
कोयल भी कूक उठे
हूक बढ़े इंसानों की
फूँक भी
पिघल उठे
अग्नि शांति पानी सी I


यह रचना अशोक बाबू माहौर जी द्वारा लिखी गयी है . आपकी विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी है . आप लेखन की विभिन्न विधाओं में संलग्न हैं . संपर्क सूत्र -ग्राम - कदमन का पुरा, तहसील-अम्बाह ,जिला-मुरैना (म.प्र.)476111 ,  ईमेल-ashokbabu.mahour@gmail.com

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  1. लाजवाब रचना, मैंने तो इस पोस्ट को बुकमार्क ही कर दिया . धन्यवाद

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