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लघु उद्योग अलीगढ के उप महा प्रबंधक श्री टी एस राजपूत जी से हमारी बात हुई कि सरकार बेरोज़गार युवकों के लिए इनक्यूबेसन कार्यक्रम पर ज़ोर दे रही हैइसमें उनको पेपर रोल बनाना, सोस बनाना, वेल्डिंग, फैशन डिजाइन और इसी तरह के कार्यक्रम, बिस्किट बनाना, डाई बनाकर उनको स्व रोज़गार के लिए तैयार करना है जिससे वे स्वयं तो काम में लगें साथ ही अन्य को भी दे सकें .यह पहल रवांडा , आदि कई अफ्रीकी देशों से हुई है इन अफ्रीकी देशों में कौशल इतना विकसित नहीं हैं कि पश्चिम की तकनीक उनको भाए इसलिए हमारी तकनीक को वे अपना रहे हैं

इस पर कि क्या हम चीनी उत्पाद जो सस्ते हैं पर टिकाऊ थोडे कम हैं के मुकाबलेटिक पाएंगे, पर उनका कहना था कि चीन समान बहुत मात्रामेंबनाता है और हमारी गुणवता (टिकाऊ) रही तो बाज़ार में जगह बन जाएगी .विचार बहुत अच्छा हैसच में मैं वह दिन देखने के लिए बेचैन हूं कि जब हमारे बज़ारों में हमारा बना बनाया सामान मिलेगा
क्षेत्रपाल शर्मा
हमारे युवक पिछले दशक से एम एन सी की तरफ देखते आए हैं विदेशी सामान चीन जापान के हम खरीद ही रहे हैंहमारे उत्पादन पर लागत जिस दिन कम आएगी वह दिन उपभोक्ता के सर्वाधिक हित में होगा


मैंने पुणे में ऐसा पानी गर्म करने का यंत्र देखा था कि जिस के नीचे लकडी जलाकर पानीजल्दी ही गर्म होजाता था इस तरह के पुराने परंपरागत यंत्र फिर से पुनर्जीवित किए जाएं तो शायदकाम बन जाए
बाटा को टाटा हम ने कह दिया, अब वह क्वालिटी नहीं मिलतीनकल ने और नुक्शान किया हैदेसी बाज़ार मिलावट से अटे पटे हैं तो अब इस दिशा में आगे पहल करना बहुत चुनौती भरा काम है
अर्थशास्त्र का नियम है कि खोटा सिक्का खरे को बाहर कर देता हैतो हमारी सबसे पहले मुठ्भेड इसी मुद्दे पर बाज़ार र्में होगीइस पहल के सार्थक होने की हम बाट जोह रहे हैं
याद है आपको अलीशा चिनोय का यह गीत 

देखी है सारी
दुनिया, जापान से लेके रशिया.
  आस्ट्रेलिया से लेके अमेरिका, ..... ... मेड इन इन्डिया, तन
गोरा हो या काला पर हो सच्चा दिलवाला
चांदी नहीं सोना नहीं कोई हीरा ...  
और श्री शिशुपाल सिह शिशु का यह गीत                    
                 "बिहरौ बिहारी की बिहार बाटिका में चाहे
                 सूर की कुटी में अड आसन जमाइए
                  अन्य भाषा भाषियो मिलेगा मनमाना सुख
                 हिन्दी के हिंडोले में जरा तो बैठ जाइए" 
मुझे भी यह मालूम न था कि यह गीत किसने लिखा है, दो चार जगह और भी पूछने पर भी बात न बनी तब प्रोफ़ेसर कृषण दत्त जी पालीवाल जी को फ़ोन मिलाया तब उन्होंने बताया कि यह श्री शिशु पाल सिंह शिशु ने लिखा है
पहले अंग्रेजी का मोह, फिर चीनी मोह, यहां तक कि भाषा विज्ञानपर हम विदेशी आलोचकों ब्लूम्फील्ड, विलियम जोंस को पढकर आगे बढ रहे हैंआखिर कब तक?



यह रचना क्षेत्रपाल शर्मा जीद्वारा लिखी गयी है। आप वर्त्तमान में राष्ट्रीय बाल भवन में हिंदी विशेषज्ञ का काम कर रहें हैं । आप एक कवि व अनुवादक के रूप में प्रसिद्ध है। आपकी रचनाएँ विभिन्न समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है। आकाशवाणी कोलकातामद्रास तथा पुणे से भी आपके  आलेख प्रसारित हो चुके है .

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