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सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला "
नर जीवन के स्वार्थ सकल
बलि हों तेरे चरणों पर, माँ
मेरे श्रम सिंचित सब फल

जीवन के रथ पर चढ़कर
सदा मृत्यु पथ पर बढ़ कर
महाकाल के खरतर शर सह
सकूँ, मुझे तू कर दृढ़तर;
जागे मेरे उर में तेरी
मूर्ति अश्रु जल धौत विमल
दृग जल से पा बल बलि कर दूँ
जननि, जन्म श्रम संचित पल

बाधाएँ आएँ तन पर
देखूँ तुझे नयन मन भर
मुझे देख तू सजल दृगों से
अपलक, उर के शतदल पर;
क्लेद युक्त, अपना तन दूंगा
मुक्त करूंगा तुझे अटल
तेरे चरणों पर दे कर बलि
सकल श्रेय श्रम संचित फल


सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' (1896 -1961) ने अपना जीवन परिचय एक पंक्ति में देते हुए लिखा है, "दुःख ही जीवन की कथा रही"। सच में निराला का जीवन दुखों से भरा था और उन दुखों को चुनौती देने, उनसे जूझने और उन्हें परास्त करने में ही उनका निरालापन था
निराला की रचनाये: (1) खंड काव्य: तुलसीदास
(2) मुक्तक -काव्य: अनामिका, परिमल, गीतिका, कुकुरमुत्ता, बेला, नए -पत्ते, अर्चना, आराधना, गीत-गुंज तथा सांध्य-बेला।
(3) उपन्यास: अप्सरा, अलका, प्रभावती
(4) कहानी -संग्रह: लिली, सखी, सुकुल की बीवी तथा चतुरी चमार
(5) रेखा -चित्र: कुल्ली -भाट, बिल्लेसुर बकरिहा
(6) जीवनी: राणा-प्रताप, प्रहलाद और भीष्म

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