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छोटी इच्छाओं की  चाहत में, बड़ी समस्याओं में फंसने की दास्तां है ‘ गबन’
उपन्यास  - ग़बन
लेखक- प्रेमचंद 
जिंदगी की वह उम्र, जब इंसान को मुहब्बत की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, बचपन हैउस वक्त पौधे को तरी मिल जाये, तो जिंदगी भर के लिए उसकी जड़े मजबूत हो जाती हैंयह कहा जाता है कि बचपन से ही जो बात मन में बैठ जाए वह शायद जिंदगी भर नहीं उतरता तो भला कहानी की नायिका जलपा गहनों के प्रेम से खुद को कैसे वंचित कर सकती थी जिसने आभूषणों से ही खेलते-खेलते बचपन बिताया हो। कहानी गबन में गहनों के प्रति अत्यावश्यक लगाव किस तरह बड़ी-बड़ी समस्याओं का यह पढ़ना बड़ा ही दिलचस्प है कारण बनता है। कहानी के नायक रमानाथ व जलपा के अलावा रत्नादेवी, देवीदीन खाटी, मुंशी दायनाथ, जग्गो, इांपेक्टर खान, मुंशी दीनदयाल, गंगाराम, पब्लिक प्रासिक्यूटर, रमेश जैसे अहम किरदार हैं
भाषा ने बढ़ाई कहानी की शान
मुंशी प्रमेचंद को भाषाओं का जदूगर कहा जाता है और गबन की भाषा से यह स्पष्ट होता है कि जैसे भाषा उनके गुलाम थेजैसे उन्होंने कहानी की शुरूआत में लिखा 'बरसात के दिन हैं, सावन का महीनाआकाश में सुनहरी घटाएँ छायी हुई हैंरह-रहकर 'रिमझिम वर्षा होने लगती है। 'इस ऋतु में महिलाओं की बाल-स्मृतियाँ भी जाग उठती हैं। ये फुहारें मानों चिन्ताओं को ह्रदय से धो डालती हैंमानों मुरझाये हुए मन को भी हरा कर देती हैंसबके दिल उमगों से भरे हुए हैंधानी साड़ियों ने 'प्रकृति की हरियाली से नाता जोड़ा है।
कहानी के कुछ अंश
महाशय दीनदयाल प्रयाग के एक छोटे से गाँव में रहते थेवह थे जमींदार के मुख्तारगाँव पर उन्हीं की धाक थीवेतन कुल पाँच रूपये पाते थे, जो उनके तम्बाकू के खर्च को भी काफी न होता थाजालपा उन्हीं की लड़की थीपहले उसके तीन भाई और थे; पर इस समय वह अकेली थीउससे कोई पूछता-तेरे भाई क्या हुए, तो वह बड़ी सरलता से कहती-बड़ी दूर खेलने गये हैं। दीनदयाल जब कभी प्रयाग जाते, तो जालपा के लिए कोई--कोई आभूषण जरूर लाते। उनकी व्यावहारिक बुद्धि में यह विचार ही न आता था कि जालपा किसी और चीज से सकती है अधिक प्रसन्न होगुड़ियाँ और खिलौने वह व्यर्थ समझते थे; इसलिए जालपा आभूषणों से ही खेलती थीयही उसके खिलौने थेवह बिल्लौर का हार, जो उसने बिसाती से लिया था, अब उसका सबसे प्यारा खिलौना था.असली हार की अभिलाषा अभी उसके मन में उदय ही नहीं हुई थीगाँव में कोई उत्सव होता, या कोई त्योहार पड़ता तो, वह उसी हार को पहनतीजलपा का विवाह दयानाथ के बेटे रमानाथ से तय होता हैरमानाथ फिलहाल बेरोजगार है इसीलिए दयानाथ शादी नहीं कराना चाहतेउनके पास न रुपये थे और एक नये परिवार का भार उठाने की हिम्मत; पर रामेश्वरी ने त्रिया-हठ से काम लिया और इस शक्ति के सामने पुरुष को झुकना पड़ा। दोनों का विवाह हुआजलपा अपने ससुराल से चंद्रहार न आने के कारण बहुत दुखी थी जेसे संसार में चंद्रहार से बड़ा उसके नहीं कुछ लिएफिर भी उसके लिए उधार के गहने आए जिसमें चंद्रहार न होने के कारण जलपा को संतुष्टि नहीं होतीरमानाथ को नौकरी तो मिलती है लेकिन उसकी हैसियत से ज्यादा दिखाने के शौक तथा जलपा के गहनों की चाह ने उसे उधार पर जीने को मजबूर कर दिया थाएक बार वह अपने कार्यालय से पैसे लाया लेकिन जलपा उसे गलती से रत्ना देवी को दे दियाभय और दुविधा में घिरा रमानाथ घर छोड़ कर चला जाता है क्योंकि उसने कार्यालय के पैसे गबन कर लिए हैं लेकिन जलपा को सच्चाई का पता नहींतो क्या सचाई जानने के बाद जलपा रमानाथ को रिश्ता तोड़ देती है? क्या रमानाथ घर लौटता है? क्या गबन का मामला कोर्ट तक पहुंच जाता है? यह तो आपको कहानी पढ़ने से ही पता चल पाएगा
ग़बन उपन्यास पर इतिश्री सिंह के विचार
इतिश्री सिंह 

प्रेमचंद के उपन्यास गबन 1966 पर में फिल्म भी बनाई गईमहान निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में बनी फिल्म में सुनील दत्त और साधना मुख्य किरदार में नजर आएउपन्यास की कहानी ही इतनी रोचक है कि उपन्यास के किरदारों को जब फिल्मी परदे में उतारा गया तो इसे भी लोगों ने खुब सराहाकहानी की सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें अनावश्यक किरदारों का जाल नहींविषयवस्तु बिलकुल भी बनावटी नहीं लगतीउपन्यास आपको बिलकुल भी बोर नहीं करेगी


यह समीक्षा इतिश्री सिंह राठौर जी द्वारा लिखी गयी है . वर्तमान में आप हिंदी दैनिक नवभारत के साथ जुड़ी हुई हैं. दैनिक हिंदी देशबंधु के लिए कईं लेख लिखे , इसके अलावा इतिश्री जी ने 50 भारतीय प्रख्यात व्यंग्य चित्रकर के तहत 50 कार्टूनिस्टों जीवनी पर लिखे लेखों का अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद किया. इतिश्री अमीर खुसरों तथा मंटों की रचनाओं के काफी प्रभावित हैं.

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  1. mai mhd ignou ki student hu. aur mai itisri ki sukrgujar hu ki unhone apne lekho ke madhyam se humari madad ki hai

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