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खट् ... खट् ... खट् ...
कौन?
हवा का झोंका - बाहर बगीचे की सूखी पत्तियों को ढकेलता - दरवाजे को छेड़ता।
याने, वे नहीं आये और उनकी प्रतीक्षा में हर पल को आकृति देती हुई मैं - धूँ धूँकर जलती रही, धुँआ करती हुई और रह रहकर चिन्गारी सी पैदा करती उनकी यादें के साथ।
लाख कोशिशो के बावजूद कुछ करने का मन नहीं करता। समझ में नहीं आता, समय कैसे गुजारूँ? अनमने मन को बुझे बुझे से पल का साथ मिलता है, तो एक खीज-सी उठने लगती है। खीज में सिर के बाल नोंचने की
इच्छा होती है, दाँत पीसने लगते हैं, जबड़ा जकड़ने लगता है और चेहरा विकृत-सा होने लगता है। लेकिन खीज प्रायः शीघ्र ही अंतः में पहुँच जाती है और टीस में बदल जाती है। टीस अंतः को कुदेरने लगती है, आँखों में नमी पैदाकर जाती है और पलकें अंतः को निचोड़कर आँसू में बदल देती है। टीस की चिकनी-चिकनी घिनौनी काई सारे उल्लास पर छा जाती है और ऐसा आभास होता है जैसे आत्मा शरीर को त्यागकर ऊपर रोशदान पर बैठ बाहर उड़ जाने के लिये तिलमिलाने लगी हो।
सोचती हूँ कि वे आ जावें तो उबे हुए उल्लास व उमंग को पुनः उभार दूँ। सच कहती हूँ कि इन क्षणों में उनके मात्र दर्शन की प्रतीक्षा होती है ताकि जीवन में वो मादकता लौट आवे जो नारी की समस्त अभिलाषाओं को परिभाषित करने की क्षमता रखती है। हाँ, इसलिये ही हमने एक दूसरे को एक ही जिन्दगी में पिरोया था।
लड़ी टूटती है तो घुरिये बिखर जाते हैं। सोचती हूँ कि उन घुरियों को बटोर लूँ - पर वे दिखते कहाँ हैं? विश्वास घृणा के पैरों तले कुचला जा चुका है। प्यार के सुन्दर मोती तो क्रोध की ठोकर खाकर चूर-चूर हो चुके हैं। मीठे बोल कडुवाहट के विषाक्त घोल में अपना अस्तित्व ही खो चुके हैं। सहवास व स्पर्श की कामोत्तेजना जाग्रत करनेवाली कोमलता क्रूरता की कठोरता चुकी है में विलीन हो। उनकी मुस्कराहट के अनगिनत मोती में से एक भी मिल जाता तो जिन्दगी की लड़ी पुनः गुँथने की चाह पैदा हो जाती। कहते हैं कि मुस्कराहट में महक होती है, पर मैंने सोचा नहीं था कि बदबूदार तकरारें उसके पर ऐसे काट देंगी कि महक तत्काल उडना ही त्याग देगी।
हाँ, जिन्दगी का एक घुरिया अवश्य दिख रहा था। वह ठोकर खाकर एक कोने में दुबका पड़ा अपनी रोशनी फैला रहा था। उसे ही उठाकर मैं अब तक साँसें लेने के काबिल बनी हुई थी। पर आशा के इस एकमात्र घुरिये को मैं किस धागे में पिरोती। संबंधों का धागा टूटता है तो असंख्य महीन टुकड़ों जाता है में विभाजित हो।
जरा सी खड़खड़ाहट - कभी पर्दे के किंचित हिलने से धड़कनें रुक जाती हैं। रुखसार सुर्ख हो जाते हैं। अपलक आँखें उनको निहारने उत्सुक हो जाती हैं। शायद वो आ गये हैं।
खट् ... खट् ... खट् ...
वही परिचित पदध्वनि - हृदय की धड़कनों से संगीतबद्ध हो साँसों के वाद्यवृदों झंकृत करने लगती हैं। शायद वे आते-आते द्वार पर रुक गये हैं। मैं स्वागत करने लालायित हो उठती हूँ - लज्जा अपने पूर्ण श्रंगार से सजधजकर अपने में सिमटती कुछ कदम आगे रखती है। ओठों पर अरसे से बुझी खुशी मुस्कराहट के मोरपंख खोल द्वार पर टिक जाती है। नजरें झुक जाती हैं।
और सब कुछ एक पल में छिप जाता है, निराशा की धुंध में। वे नहीं आये। प्रतीक्षा पुनः खिंचकर अजगर सी फैल जाती है और उसकी कुंड़लियों में लिपटी आशा चरमराकर मिट जाती है।
आशा के टूटकर बिखरने के साथ विचारों की फटी-सी चिंधियाँ मस्तिष्क के आँगन को अपने आगोश में ले लेती हैं। प्यार से पली, स्नेह की लता से लिपटी, अपने आप में सिमटती-सकुचाती - थिरकती-नाचती जिन्दगी अचानक कँटीले कैक्टस्-सी दिखने लगती है। टीसें अनगिनत जहरीले काँटों सी उभरने लगती हैं। क्या कहा? कैक्टस् में भी फूल होते हैं। हाँ, जरूर होते हैं। पर कौन उन फूलों की वेणी बनाता है? कौन उन्हें जूड़े में लगाता है? घर के फूलदान में भी उन्हें लगाना अपशकुन माना जाता है।
राह देखते-देखते थक गई हूँ। निरूद्धेश्य-सी जिन्दगी को घसीटती कमरे में ले आती हूँ। न जाने क्यों यह शाम का समय डूबते सूरज की तरह अनमना-सा बन जाता है। एक समय बदन को पुलकित करती, सुगंध-सी बिखेरती यह क्षितिज के गुलाबी बालों को प्यार से थपथपाती शाम, अब क्यूँ आँखों की किरकिरी-सी व्याकुलता भरी लगने लगी है?
याद है ... हर शाम उनके साथ घूमने निकल जाने की ललक रहा करती थी। तब चिड़ियों की तरह झुरमुटों में चहचहाने का मन किया करता था। अब हर शाम दिन की टूटी हुई शाख सी नजर आती है - जिसके हर लम्हे पर उबासी के घाव दिखते हैं और थककर चूर हुई किस्मत की कुल्हाड़ी अनमनी-से हृदय पर प्रहार करने का उत्क्रम करने लगती है।
ठक् ... ठक् ... ठक् ...
और हर इक प्रहार से यादों की किरमिचें उछलती कूड़े की तरह बिखरती जाती हैं। और तब जिन्दगी की घड़ी अपाहिज-सी चलती जाती है ...
टिक् ... टिक् ... टिक् ...
सिर पर वेदना का गठ्ठर लिये लकड़हारा-सा मन इस बोझ को मेरे अंतः की देहरी पर धड़ाम से पटक देता है। अब, न जाने कितनी रात गये यह यादों की छीलन हृदय की अंगीठी में धुँआ देती, यूँ ही जलती रहेगी?
सुबह काजल-सी मटमैली यह जिन्दगी फिर जाग उठेगी। आसमान पर अंगड़ाईयाँ लेती सूरज की किरणें खिड़की व दरवाजों की झिरी से झाँककर देखना चाहेंगी उनको। और तब उनको न पाकर, मुरझाई-सी अपने को बादलों में छिपा लेने प्रयासरत हो जावेंगी। वो शायद मुझसे पूछेंगी, 'मैं कहाँ जाऊँ?' तब मन पूछेगा कि क्या तुम भी मेरी तरह राह भटक गई हो? क्या तुम्हारी भी मंजिल खो गई है? क्या तुम्हारी भी शक्ति और स्फूर्ति कुम्हला गई है? हर सुबह सिर्फ सोचकर रह जाती हूँ कि मैं क्या करूँ? मुझे स्वयं नहीं मालूम कि मुझे क्या हो गया है? क्या अब यूँ ही पलंग पर लेटी हुई लाश-सी पड़ी रहूँगी या फिर लाश को घसीटती-फिरती रहूँगी, इधर से उधर या फिर मरी हुई यादों को अंतः की ढहती दीवार पर लगी खूँटी पर टाँगती रहूँगी?
कभी कभार अपने को धकेलती हुई सड़क पर ले आती हूँ - कुड़ा-करकट की तरह और लौट जाती हूँ - हारकर - वैसी की वैसी कूड़ा-करकट से भरी की भरी।
कभी कभी सच में लगता है कि वे आ गये हैं। उनका हँसता हुआ चेहरा और चेहरे पर मोती-सी दमकती पसीने की बूँदें, जिनमें मैं अपने अनगिनत प्रतिबिंब देखती हूँ। हजारों पल यूँ ही गुजर जाते हैं इस एलबम के पन्नों को निहारते। प्यार, विश्वास, आस्था, अपनापन, त्याग आदि के सुन्दर चित्रों में हम दोनों का एक साथ प्रतिबिंबिंत होना जैसे उन कसमों की आधारशिला बना जाता है, जो हमने वैवाहिक वेदी पर खाई थी। लेकिन अनायास कौन उन संस्कारों को पददलित कर गया? क्या वे वेदवाक्य पुनः प्रतिध्वनित नहीं होंगे? क्या सद्भावना को पल्वलित करती अग्निशिखा हमेशा के लिये विलुप्त ही रहेगी?
इसमें दोष किसका है? वो कहेंगे कि मेरा है, और मैं कहूँगी कि उनका है। तब आहत प्यार क्या फैसला सुनावेगा? यही ना कि प्यार में समझौता नहीं होता, समर्पण होता है। प्यार में व्यापार नहीं होता, अपनेपन का विनिमय होता है। प्यार में अहं के वर्चस्व का युद्ध नहीं होता, स्नेह का आदान-प्रदान स्वेच्छा से होता है। ये बातें तो एक अनपढ़ भी जानता है। 'हम तो अनपढ़ भी नहीं है।' ये शब्द हमारे अपने थे, पर न मैं यह बोल पायी और ना ही वे। बस, भूकंप की रिक्टर स्केल को यही बढ़ा गया। अहं बौखला गया, स्वार्थ तमतमा गया, अपनेपन की जंजीर जकड़न की सी लगने लगी।
भूकंप के एक ही झटके में सुखद सपनों से सजाई दीवारों में दरारें पड़ जाती हैं - अरमानों की सकारात्मकता दर्शाते भवन धराशाही हो जाते हैं - उनका मलबा यादों की सुवासित बगिया पर पसर जाता है और भूकंप के भय से बाहर जमा भीड़ में स्मृतियाँ यो जाती हैं। भूकंप के छोटे-छोटे झटके आते रहते हैं और जब वे भी थम जाते हैं तो
स्मृतियाँ लौट पड़ती हैं - मलबे में दबी यादों की विस्मृत क्षणों को तलाशने और उन्हें पुनर्जीवित करने ..... पर भविष्य वर्तमान के मलबे तले चीखता रह जाता है - सिसकता है - जाता है अंतिम साँसों को गिनता हुआ खामोश हो। यादों की धराशाही सरायों के घुप्प अंधकार में समृतियों के टिमटिमाते दीपों की रोशनी, तब क्या कुछ खोज पाती हैं?
लेकिन यादों की कड़ियाँ कभी टूटती नहीं - वे जुड़ती जाती हैं - सुनहरे तारों की कड़ियाँ आपस में उलझती-सुलझती वर्तमान की उदासी को झकझोरती हुई। स्मृतिचित्र में उभर आती है वह तस्वीर जब वे मेरे पीछे खड़े वेणी बाँधते मुस्करा रहे होते हैं। मेरे शरीर में फुरफुरी होने लगती है। फूलों की महक से सारा तन-बदन सुवासित हो उठता है। वे कुर्सी घुमाकर मुझे अपने सामने कर लेते हैं। अपलक नजरों को अपने अंतः में झाँकते देख, एक खुशी की लहर विचारों को गुदगुदाने लगती है। मुस्काती, लजाती, मंत्रमुग्ध सी सोच मुझे अतीत की उन सुन्दर वादियों में ले जाती है, जहाँ शंका का आवेग मुझे सतर्क कर देता था कि कहीं वे कोई ऐसी-वैसी हरकत तो नहीं कर डालेंगे। पर ऐसे ख्यालों का आना भी तो आनंदित करनेवाला होता है। मैं लजाकर सिमटती जाती हूँ। उनके हर स्पर्श की मादकता मेरे अंदर बिजली की सी लहर उपजाती जाती है। प्यार के सागर से उठती खुशी की मंद लहर का बिजली की तेज-तर्राट लहरों से यूँ टकराना ही तो हृदय को प्रेम की पराकाष्ठा पर पहुँचा देता है।
स्मृतिचित्र मुझे खींच लिये चलती है जीवन की उस सुन्दर बगिया में जहाँ वे मुझे सहारा दे बाहर ले आयें हैं। तब हम बाहर टहल रहे होते हैं और मन भीतर चुहुल कर रहा होता है। दुधिया चाँद और झुरमुटों में पसरती चाँदनी का सा हल्का-सा चुम्बन और उनका प्रति चुम्बन। हमारा प्रिय स्थान है अशोक की साया का - हरी-हरी दूब से घिरा हुआ - प्यार की मखमली गोद में लुढ़कता, खिलखिलाता और जहाँ हल्का झोंका छेड़ उठता मेरे आँचल को। मैं भी आँचल को खिसकने देती हूँ - अनजानी बनी - बेसुध-सी। उन्हें भी शायद खिलवाड़ सूझ पड़ता है। अशोक वृक्ष के पत्तियों की थिरकन बदन पर उतर आती है और तब एक स्वप्न अस्तित्व-सा लेने लगता है आलिंगन में बिंध जाने का।
चुप हैं वे - आदतन कुछ बोलते नहीं। पर उनकी जगह चहक उठती है प्रकृति - प्रकृति जिसके पाश में सृष्टि सदा बिंधी कुलमुलाती नजर आती है। प्रकृति की बाँहों में कसाव बढ़ने लगता है और एक कसक-सी अँगड़ाईयाँ लेती उत्पात-सा मचाने लगती है। मैं अपनी सुध-बुध खोती रह जाती हूँ। प्रणय का यह चलचित्र चाँद को भा जाता है और चाँदनी इशारा समझ शर्माती बादलों के पीछे छिप जाने का उपक्रम करने लगती है।
मैं हौले-हौले उफनती-सी लगने लगती हूँ। रुखसार पर उनके अधरों का स्पर्श महसूस होता है। मेरे चेहरे पर नजरें गड़ाकर वे कुछ ढूँढ़ रहे होते हैं। मैं इशारे से पूछ बैठती हूँ, 'क्या ढूँढ़ रहे हो?' तक मदभरी आँखें और कंपित ओठ शायद कह रहे होते हैं कि वे अंकित चुम्बन की ललामी को खोज रहे हैं। हत्! मैंने भी जरा-सी सकुचाती शरारत कर दी थी। जानती हूँ कि इस शरारत से उनका प्यार कसमसा उठता है। तब स्वयं को समर्पित करने के सिवा बचता ही क्या है? अहा! आलिंगन कितनी माहक कल्पना है और उसका साकार होना कितना आल्हादपूर्ण।
'चलो, अब लौट चले,' वे कहते हैं। मैं आदतन हाथ फैला देती हूँ। उनके हाथों का वह हल्के से उठाना - मुझे सहारा देना - हर दो कदम पर मुस्कराना - गुदगुदाना - चूड़ियों का खनखनाना। सच, कितनी अच्छी घड़ी होती है वह - तृप्ति ही प्यार की भाषा होती है। वरना प्यार तो इतना खामोश होता है कि अपनी साँसें भी शोर करती मालूम होती हैं।
सड़क पार करते समय मेरी हथेली को थाम लिया जाता है। गुदगुदी-सी होती है, हथेली में। मदहोश कदम लड़खड़ाने लगते हैं। वे मेरे कंधे पर हाथ रख देते हैं। वरना सच कहती हूँ कि मैं गिर पड़ती। पर मैं झटककर उनका हाथ हटा देती हूँ। शायद यह जताने कि अजी, यह क्या करते हो? कोई देख लेगा, तो क्या कहेगा? 'ऊँह,' लापरवाही जताता उनका प्रत्युत्तर था। पर सच्ची बात तो यह है कि कभी कभी रास्ते में ऐसी हरकतें मुझे पसंद आती हैं - बेहद पसंद। अब मैं उनके कन्धे का सहारा लेने हाथ रख देती हूँ। सारा वजन उनके कन्धे पर डाले घसीटती-सी आगे बढ़ती हूँ। उनकी प्रश्नवाचक मुद्रा मुझ पर केन्द्रित हो जाती है। 'थक तो नहीं गई?' उन्होंने पूछा। 'जी,' मैंने उत्तर दिया और मैं हाथ बाँधे कठपुतली-सी सामने खड़ी हो जाती हूँ। उन्हें देख थकावट मुस्कराने लगती है। हवा के हल्के झोंके से पल्लू खिसकने को उतावला हो जाता है। श्री कृष्ण की रासलीला सामने उभर आती है। मैं देखती हूँ कि चहुँओर उनकी ही आँखों का नजारा है - मुझ पर केन्द्रित - निरंतर मुझे देखता - जैसे नजरें सहला रही हों - दुलार रही हों और कल्पना के नन्हें पंख फड़फड़ाकर मुझे ऊँची अटारी पर उड़ जाने का संकेत देने लगते हैं । जाने-पहचाने कितने द्दष्य आँखों के सामने घूमने लगते हैं।
अतीत के क्षणों के पंछी फिर फड़फड़ाकर सामने पलकों की टहनियों पर फुदकने लगते हैं। 'क्या सोचने लगी?' उन्होंने प्रश्न किया था। मैंने पलटकर देखना चाहा कि प्रश्न किसने किया है। 'अरे, आप कब आ गये?' मैंने अनजान बनने का स्वाँग ही तो रचा था, उस समय। 'मैं यहाँ से कहीं गया ही कब था?' यह कह वे मुस्करा उठे। मुझे खुद पर हँसी आने लगी। मैं दो कदम आने बढ़ी और फिर रुकी निरूद्देश्य-सी, खोई-खोई सी। मुझे रुका देख, वे भी चलते-चलते रुक गये। तब हम दोनों के बीच का फासला शून्य हो, उत्तेजक हो उठा था। ऐसा लगा कि मैं पलटकर उनसे लिपट जाऊँ। अपने आप को भूल जाऊँ। सच्चा प्यार ऐसा ही होता है जो जीवन की रिक्तता को, शून्यता को भर दे। सच ही कहा गया है कि प्यार जीवन को नीरस नहीं होने देता, बोझिल नहीं होने देता - वह तो आँसुओं को भी हँसी में बदल देता है - आहों को किलकारियों की गूँज में रूपांतरित कर देता है। सच, प्यार के आगोश में खिन्न-सा मन भी खिलखिला उठता है।
मैंने सोचा था कि उन्हें व उनके प्यार को देखकर मैं पूर्णरूप से आश्वस्थ हूँ कि मेरे प्यार में स्थायित्व है, गति है और गहराई भी। सच, प्यार वह आधार है जिसके मिल जाने से लताऐं अंगड़ाईयाँ लेती ऊँचाईयाँ तय करती हैं। प्यार उन पंखुड़ियों की तरह है, जिस पर आँसू भी ओस की बूँदें की तरह मोती बन जाते हैं।
मन करता है कि ठंड की कुड़मुड़ाती में धूप में पड़ी दो कुर्सियों में से एक पर वो विराजमान हो और दूसरे पर मैं और बैठकर बातें हों। बातों ही बातों में हम प्यार करें। शब्दों में अपनापन की महक हो और उनसे गुँथे वाक्यों में इस महक का विस्तार हो, जो मन की गहराईयों में फैलता जावे और हम दोनों की जिन्दगी को सुवासित करता जावे। प्यार का यूँ मिलना ही भावुकता को यथार्थता में बदल देता है। जिन्दगी सुखद स्वप्नों की मादकता लिये वास्तविकता में निरूपित हो जाती है। प्रेम को परिपक्वता ऐसे क्षण तो देते हैं।
खट् ... खट् ... खट् ...
कौन?
वही हवा का झोंका - बाहर बगीचे की सूखी पत्तियों को ढकेलता - दरवाजे को छेड़ता। तो वे नहीं आये। हूँ - वे आने भी क्यों चले। मेरा है कसूर।
वही हवा का झोंका - बाहर बगीचे की सूखी पत्तियों को ढकेलता - दरवाजे को छेड़ता। तो वे नहीं आये। हूँ - वे आने भी क्यों चले। मेरा है कसूर। याद है - मैं कहती थी, 'मैं तुम्हें देवता समझती हूँ।' पर वे ठहाका लगाकर हँस पड़ते थे, 'पगली! मैं तो मात्र पुजारी हूँ। प्रेम मंदिर में सिर्फ तुम्हें पूजता। 'यही सच था तो अब वह पुजारी कहाँ खो गया? मैं कमरे के हरइक कोने को टटोलती हूँ। फूलदान, मेज पर रखी घड़ी, वो पेंटिंग, फ्रिज पर रखी 'बोन चाइना' की गुड़िया और भी कितनी चीजें जो मुझे सालगिरह पर उनने लाकर दी थीं। वे सब हैं - अपनी जगह - सूनापन लिये। उन्हें देख मन का सूनापन और अधिक खलने लगता है। मैं कसकर आँखें मूँद लेती हूँ, अपने अंतः में झाँकने। पर वहाँ भी अंधेरा है - इकलौता - अपने ही अंधकार में छिपता - सूनापन लिये।
आँखें खुलती हैं तो प्रतीक्षारत दरवाजे विचलित कर देते हैं। पर खुली खिड़कियाँ चुहुल करती नजर आती हैं - यादों की खिड़कियाँ, जिन्हें बंद करने का प्रयास वर्तमान आहों का झोंका करता तो है, पर चटकनी खिसकती ही नहीं - दर्द में कराह उठती हैं - यादों को इस तरह दुतकारना किसे अच्छा लगता है ? मैं खिड़की की तरफ बढ़ जाती हूँ। शायद वे बाहर टहल रहें होंगे। मैं खिड़की से दूर दूर तक नजरें दौड़ाती हूँ। असंख्य नर-नारियों में उन्हें ढूँढ़ने का प्रयास करती हूँ। तभी उनके हाथ का स्पर्श मुझे चैंका देता है। तन-मन में ताजगी लौट आती है। स्पर्श की कल्पना जितनी मधुर होती है, उतनी ही उसके होने की अनुभूति - तृप्ति युक्त आनंद से लबालब भरी।
मैं फिरकनी-सी घूम जाती हूँ। वे कुछ दुबले नजर आ रहे हैं। चेहरे पर अंकित चिंतन की रेखायें जैसे कह रही हों कि वे कोई गहरी पीड़ा छिपा रहे हों। कुछ पल ही तो मुझसे दूर रहे हैं, फिर भी इस क्षणिक वियोग का दुःख क्यूँ सालने लगा है। मैं उन्हें बैठने कहती हूँ। उनके ललाट पर पसीने की बूँदें दिखती हैं - मैं आँचल से उनको पौंछ देती हूँ। वे बस खामोश बैठे रहते हैं - बिना बाँहों में भरे - बिना प्यार किये। मैं ठगी-सी देखते रह जाती हूँ। चाय का प्याला मैंने उनकी तरफ बढ़ाया तो हाथ छू गया, 'अरे, आपको तो बुखार है। मैं अभी डाक्टर को बुला लाती हूँ। 'उन्होंने मेरा हाथ थाम लिया। हाथ में कंपन था। मैं हाथ छुड़ा आगे बढ़ना ही चाहती थी तो देखा वे पल्लू पकड़े, मुझे रुकने का अनुग्रह कर रहे थे। मैं पल्लू से लिपटती पास आ गई। ठीक भी है, उन्हें डाक्टर से कहीं अधिक मेरी जरुरत थी। मैं उन्हें लेट जाने को कहती हूँ।
ढलते सूरज का एक नन्हा-सा छौना खिड़की से उछलकर उनके गाल पर आ बैठा था। मैंने प्रायः देखा है कि बीमारी में उनका चेहरा नन्हें मुन्ने का सा मासूम लगने लगता है। इच्छा हुई कि उन्हें थपकी दे अपनी गोदी में सुला लूँ। वे चेहरे पर प्रसन्नता की मुद्रा लाने की चेष्टा कर रहे थे - शायद यह जताने कि वे स्वस्थ हैं। किसी का तिल भर भी अहसान न लेना उनकी आदत में शुमार है। कभी एक गिलास पानी भी नहीं माँगा है। उनकी यह आदत मेरी खिन्नता का कारण बनी हुई है। आखिर मेरा अधिकार है उनकी सेवा करना और वे हैं कि इस अधिकार के प्रयोग का मौका ही नहीं देते। आखिर क्यों? मैं अपने आप को समझा लेती हूँ। शायद वे मुझे केवल जीवन-संगिनी के रूप में देखना चाहते हैं, न कि सेविका या परिचारिका के रूप में। इस उनकी महानता ही मान लेना ठीक लगता है। नहीं, मैं ऐसा कतई मानने तैयार नहीं हूँ। सेवा-सुश्रुषा प्यार की ही एक अभिव्यक्ति हुआ करती है। हृदय में सेवा की ललक तो बनी ही रहती है, हर स्त्री में। सेवा के साथ त्याग का जुड़ना, अपनी सुध-बुध छोड़कर उनका ख्याल रखना ही तो प्रेम का स्वर्ण सोपान होता है।
खैर, हरएक की जीवन व्यापन की एक विशिष्टता होती है - उसकी अपनी पसंद होती है। वह उस दायरे में ही अपनी बगिया सजाना अच्छा समझता है और आगन्तुकों को अपनी इस बगिया में सैर करने की चाह रखता है। मुझे याद है कि उन्हें गुलाबी रंग बेहद पसंद है। मैंने वैसी ही साड़ी पहन रखी है। मैंने बड़े चाव से श्रंगार भी किया है और उनके सिराहने आकर बैठ गई हूँ। मैंने पाया है कि बीमारी में यह भी दवा का काम करती है और सच, उनकी आँखों में हल्की-सी मुस्कान थिरकने लगी थी। एक अद्भुत पुलक से मेरा तन-मन भी सिहर उठता है। उनका सिर गोद में रख बालों को सहलाते मैं उनकी आँखों को पढ़ती हूँ। लिखा है जैसे कि मैं इस साड़ी में बहुत सुन्दर लग रही हूँ। सच, आँखें थर्मामीटर की तरह सब कुछ बता देती हैं। वे बता रहीं थी कि अगर तबीयत यों खराब न होती तो मेरी खैर न होती इस साड़ी में। मेरा चेहरा सुर्ख हो उठता है इस कल्पना से। सिर से पैर के नख तक मैं पुलकमय हो उठती हूँ। रेशमी सुवासित पल्लू खिसककर उनके वक्षस्थल पर पसर जाता है। मुझे लगता है कि पल्लू उनके समूचे बदन को स्पर्श करता हुआ, हवा के झोंकों में फरफराता उनके तन - मन को रस में भिंगो रहा है।
यह स्पर्श उन्हें पुलकित करता है और अकथनीय अल्हाद मुझे अपने गिरफ्त में ले लेता है। उनके ओठों तक कुछ शब्द आकर थिरकन में परिणित हो जाते हैं। वे कुछ कहना चाहते हैं - चेहरे पर अंकित उनके मन की हलचल देख मैं समझ जाती हूँ - यही तो प्यार की अनोखी भाषा होती है। मेरे बालों में उलझी उनकी ऊँगलियाँ भी इसी भाषा में कुछ कह रही थी। मैं संज्ञा-शून्य सी उन्हें देखती रह जाती हूँ।
सच, उनकी आँखों में प्रेम को परिभाषित करती सुखांत कहानियाँ होती हैं। पलक पर संस्मरण के छोने प्रणय की लघुकथा का रूप धरे लुकते-फिरते नजर आते हैं। मुझे उपन्यास पड़ने का शौक नहीं है। उपन्यास में सुख-दुख का मिश्रण होता है। सुखांत उपन्यास हो तो भी उसके कई पन्ने कचोटनेवाले होते हैं। हर अल्पविराम आहें भरते लगते हैं और पूर्णविराम आँसुओं की धारा की तरह जिन्दगी को दो तटों में बाँट देते है - एक ओर जिसके उदासी होती है और दूसरी ओर आत्मा को कुदेरते कटाव की परछाई होती है। इसी कारण मैंने जिन्दगी को उपन्यास बनने नहीं दिया। आज उसी बात का अफसोस है। मेरी यह बात सुनकर उन्होंने कहा था, 'वरना लघुकथाओं से बनी इस जिन्दगी के टुकड़े यूँ जल्दबाजी से जिल्द में न बाँधने पड़ते।' तब हमने कसम खायी थी कि इस जिल्द को कभी खुलने न देंगे। खोलेंगे भी तो उसमें कुछ सुनहरे पन्ने जोड़ने के ही लिये। मैंने देखा है कि कसम खाते समय मनुष्य स्वतः को ईश्वर की गोद में बैठा महसूस करता है।
मैं यादों की गोद में बैठकर भी ऐसा ही महसूस करती हूँ। प्रणय के समय तो वे भगवान बने दिखते हैं। मैं उन्हीं से लिपट जाती हूँ। फिर एक झटके में मेरी चेतना लौट आती है। मैंने ऐसा नहीं होने देना था। यह कितना अस्वाभाविक था। उनकी तबीयत का ख्याल तो रखा होता। फिर ऐसा लगता है कि नहीं, स्वाभाविक यही था - प्यार समय-असमय नहीं देखता - वह तो हर वक्त दे जाता है - टूटते बदन का मीठा-मीठा दर्द। प्यार में क्षण अनकहे भले ही रह जावें, पर अनबुझे नहीं रह पाते।
उन्हें नींद आ गई है। मैं पास बैठी देख रही हूँ कि प्यार में कभी कभी बिना स्पर्श के ही न जाने कितनी मादकता तन-मन को भिंगो जाती है। मैं चिक सरकाने खिड़की की तरफ जाती हूँ। बाहर आसमान भी चिक सरकाने लगता है। संध्या गुजर चुकी है और रात के चित्र उभर आये हैं - जमीन के कैन्वास पर छिटकी चाँदनी और स्याह रंग से पुते दरख्त के साये। आसमान के टिमटिमाते तारे मन के तारों को झनाझने लगते हैं।
रात गुजरती रही, पर नींद आँखों से दूर टहल रही। यादें प्यार की मखमली राह पर चलती जाती हैं। पर इस राह से हटकर जब नजर इधर-उधर जाती है, तो दिखाई देती हैं वे झुरमुटों जिन्हें मधुर तकरार कहा जाता है। प्यार ही प्यार में झगड़े भी प्यारे लगते हैं - न किसी का अपमान, न ही ऐसी  कचोट कि मन तिलमिला जावे - न ही ऐसी हरकत जो मन को खिन्न कर जावे। बस, वह तो एक खिलवाड़-सा लगता है - मात्र टाईम पास-सा - जिसमें न तो तिरस्कार है, न शब्दों का प्रहार, न उलाहनों का विष। उनका कहना है कि ऐसे छुटपुट झगड़े तो प्यार के नये कमनीय स्थलों को ढूँढ़ निकालने का मात्र उपक्रम है - एक नाटक - एक बहाना - जो उचककर दो दिलों की दूरी कम करने में सहायक होता है। मैं भी उनसे सहमत हूँ - तभी तो ऐसे प्रसंगों के बाद आत्मसमर्पण की भावना व शैली नवीनता लेकर ही आती है। इनकी भूमिका जीवन में निखार लाने की ही होती है।
वाकई, प्यार ही सच है और ये छुटपुट झगड़े - वाक् युद्ध - मात्र छल हैं, भ्रम हैं, झूठ हैं। वे प्यार को डराते हैं - नर्वस करते हैं। पर नर्वस प्यार भी कभी कभी कितना बहका देता है। यह बहकावा भी होता है किसी सुन्दर कल्पना का साकार रूप - मादकता से ओतप्रोत।
लेकिन कभी कभी झगड़े प्यार को इतना डरा देते हैं कि प्यार नर्वस होकर घृणा को आगे कर स्वयं दुबक जाता है - डर कर। डर जो धीरे धीरे फफूँद-सा छाने लगता है - जीवन की हर परत पर। डर जो शादी के पाँच-छः बरस बाद
प्रेम का पर्याय बना था, वही डर अब कहने लगता है कि कलह को प्रेम की संज्ञा देना मात्र भ्रम है। डर डरने से और डराता है। वह कहता है कि प्यार में आवेश हो पर स्थायित्व न हो, गति हो पर गहराई न हो तो वह जिस वेग से आरंभ होता है, उसी वेग से जरा-सा झटका लगते ही टूट जाता है। यही टूट जाने के डर से छुटपुट झगड़े बबंडर का रूप धारण कर लेते हैं। बना-बनाया जाता है सब कुछ स्वाहा हो। जतन से संजोया-सँवारा प्यार पल जाता है में छिन्न-भिन्न हो। तिरस्कार, अवहेलना, अपमान, घृणा सभी क्रमश: प्यार को बालू का घरोंदा समझ कुचल देते हैं। फिर भी प्रेम के लिये ये उतने घातक नहीं जितना अविश्वास होता है। अविश्वास के वातावरण में घृणा, द्वेष, ईष् र्या आदि के बादलों में प्रेम अद्दष्य होना जीवन को तार तार कर जाता है और जो कुछ शेष रहता है उसे तलाक रोंद डालता है। बात तलाक तक पहुँच जावे, तब गरिमा बनाये रखने आँसुओं को भी छिपाना पड़ता है।
किसी ने कहा है कि आँसुओं को रोककर नारी अपना नारित्व गँवा देती हैं। चेहरे का तनाव क्रूरता का प्रतिबिंब
भूपेन्द्र कुमार दवे
बन जाता है। रौद्र रूप शीघ्र ही वीभत्स में परिणित हो जाता है। सुन्दर पंखुड़ियौ काँटों से बिंधी लगने लगती है - सुवासित पुष्प-लता नागिन बन जाती है। कहते हैं कि स्त्री के दो ही रूप होते हैं --सीता या सूर्पनखा।
शारिरिक सौंदर्य की अपेक्षा नम्रता स्त्री को अधिक मोहक बनाती है। जबकि नारी में क्रोध दुर्भाग्य का सूचक है - एक प्रलय रूप जो सग बुछ मिटाकर ही शांत होता है। प्रलय के बाद शेष रह जाती है, पश्चाताप की तड़प, दिल को कचोटती यादें, आँसुओं की सिसकती पहचान, बोझिल जीवन की नीरवता, सारी दुनिया की तिरस्कार की आँधी और रह जाता है डूबते मन का नीरस अवसाद और रगों में रेंगते दर्द का अनवरत असहास ।
पर दुनिया तो जानती है कि स्त्री प्रेम-दुर्ग को नहीं तोड़ती बल्कि उसकी रक्षा में स्वयं टूट जाती है। स्त्रियों का इस तरह टूटना समाज का कलंक ही तो कहलाता है। ऐसे में प्रतीक्षा - प्रतीक्षा नहीं रहती, किन्तु अभिशप्त प्यास बन जाती है - अनबुझी प्यास।
पर मैं मात्र सोचती ही नहीं रह जाती - प्रतीक्षा ही नहीं करती रहती - मैं फोन भी करती हूँ। उधर से आवाज आती है: '। अभी वे जरूरी मिटिंग में व्यस्त हैं' 'अभी वे दौरे पर बाहर गये हुए हैं' कभी रिकार्डेड मैसेज मिलता है, 'अभी इस फोन की सभी लाईन व्यस्त हैं'।।
अभी थोड़ी देर पहले मैसेज मिला था, 'आपका डायल किया नंबर अभी व्यस्त है। कृपया थोड़ी देर बाद डायल करें। '
थोड़ी देर बाद डायल करने पर फिर वही मैसेज मिला। थोड़ी देर और इंतजार करती हूँ। तभी फोन की घंटी बज उठती है
ट्रिग् ... ट्रिग् ... ट्रिग्
मैं बच्चों की तरह उल्लास से फोन उठाने दौड़ पड़ती हूँ, शायद उनका फोन होगा।
'हैलो, कौन?' मैंने पूछा।
उधर से आवाज आयी, 'जी, बधाई।'
'बधाई, किस बात की?'
'शायद आप भूल गईं। आज फैसला आना था। तलाक की स्वीकृति मिल गई है। '
'खटाक्!' मैं फोन पटक देती हूँ। आशा मर चुकी होती है - किसी रोड़ रोलर के नीचे दबकर - एकदम चिपट गई है। चिपचिपा खून जिन्दगी के चमचमाते फर्श पर बिखर गया है। प्रतिक्षा चुप है - न तो सिसक पाती है - न ही रो पाती है।
खट् ... खट् ... खट् ...
ओफ्! अब तो 'कौन?' का प्रश्न ही नहीं उठता।
जानती हूँ होगा हवा का झोंका - बाहर बगीचे की सूखी पत्तियों को ढकेलता - दरवाजे को छेड़ता।

यह कहानी भूपेंद्र कुमार दवे जी द्वारा लिखी गयी है आप मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल से सम्बद्ध रहे हैं आपकी कुछ कहानियाँ व कवितायें आकाशवाणी से भी प्रसारित हो चुकी है 'बंद दरवाजे और अन्य कहानियाँ''बूंद- बूंद आँसू' आदि आपकी प्रकाशित कृतियाँ हैसंपर्क सूत्र - भूपेन्द्र कुमार दवे,  43, सहकार नगररामपुर,जबलपुरम.प्र। मोबाइल न.  09893060419.
 
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