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नहीं एक हाड मांस की पुतली
उसमे भी है प्राण बसे
वो भी है उस परमात्मा की रचना
है सजीव वो भी जाने हसना रोना
क्यों समझते हो उसे एक भोग्य बस्तु
लपलपाते हो जीभ उसकी सुकोमलता पे
एक इन्सान समझ करो उसकी इज्जत
क्यूंकि मात्र देह नहीं है औरत
उसके अन्दर भी है आत्मतत्व
बोध शोध करने हेतु मस्तिष्क
चाहतें करने का है उसे भी हक़
तुम्हारी तरह उसके पास भी तो है मन
सही गलत का फर्क करने हेतु दिमाग
कर्म करने के लिए मिले उसे भी तो दो हाथ
सपना मांगलिक
फिर क्यों छीनते हो उससे बरावरी का दर्जा
एक इंसान हो क्यों दूसरे को करते बेइज्जत
बात समझो, मात्र देह नहीं है औरत
उसके भीतर भी है तुम सम जान
मत कुचलो उसका अस्तित्व और स्वाभिमान
कमजोर नहीं वो है अदभुत एक शक्ति
लो उसकी सहनशीलता और ममता से प्रेरणा
मात्र औरत नहीं वो है तुम्हारी जन्मदात्री
दो सम्मान झुको उसके आगे हो नतमस्तक
क्यूँकी मात्र देह नहीं है औरत



यह रचना सपना मांगलिक जी द्वारा लिखी गयी है . आपका रचना कर्म कविता ,कहानी ,व्यंग ,गीत ,लेख ,संस्मरण ,समीक्षा आदि विभिन्न क्षेत्रों में फैला हुआ है . 'कल क्या होगा ,बगावत ,कमसिन बाला (काव्य ),पापा कब आओगे ,जंगल ट्रीट , गुनगुनाते अक्षर (बाल साहित्य ) आदि आपकी प्रकाशित कृतियाँ है . आपको विभिन्न प्रादेशिक व राजकीय सम्मानों से सम्मानित किया गया है .
संपर्क सूत्र - सपना मांगलिक,F-659 आगरा (उत्तर प्रदेश) 282,005
            मो. 9548509508, email-sapna8manglik@gmail.com
         

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